सरगुजा जिला - Surguja Jila


सरगुजा छत्तीसगढ़ का एक जिला है। जिसका गठन स्थापना 1 जनवरी 1948 को हुआ था। इस जिले का मुख्यालय अम्बिकापुर है। यह जिला छत्तीसगढ राज्य के उत्तर-पुर्व भाग स्थित है। यह एक में आदिवासी बहुल जिला है। इस जिले के उत्तर में उत्तरप्रदेश राज्य की सीमा है, जबकी पूर्व में झारखंड राज्य है। जिले के दक्षिणी क्षेत्र में छत्तीसगढ का रायगढ, कोरबा एवं जशपुर जिला है, जबकी इसके पश्चिम में कोरिया जिला है।

इतिहास एवं नामकरण : 
इस क्षेत्र का उल्लेख महाकाव्य रामायण में भी है।  महाकाव्य के सम्बंधित में कई स्थानों के नाम है जैसे रामगढ़, सीता-बेंगरा और लक्ष्मणगढ़। 
सरगुजा किसी एक स्थान विशेष का नाम नहीं है बल्कि जिले के समूचे भू-भाग को ही सरगुजा कहा जाता है। प्राचिन मान्यताओ के अनुसार पूर्व काल में सरगुजा को निचे दिये गये नाम से जाना जाता था:

सुरगुजा - सुर + गजा - अर्थात देवताओं एवं हाथियों वाली धरती।
स्वर्गजा - स्वर्ग + जा - स्वर्ग के समान भू-प्रदेश
सुरगुंजा - सुर + गुंजा - आदिवासियों के लोकगीतों का मधुर गुंजन।
वर्तमान में इस जिले को सरगुजा नाम से ही जाना जाता है। जिसका अंग्रेजी भाषा में उच्चारण आज भी SURGUJA ही हो रहा है।

>>सरगुजा जिले के पुरातात्विक स्थल

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि : इतिहास पाषाण मंदिरों की मौजूदगी और उत् कीर्णनों के विभिन्न साक्ष्य के अस्तित्व का पता चलता रहता है पुरातन इस क्षेत्र से पहले ईसा (ईसा पूर्व).
4 ई.पू. मौर्य वंश के आने से पहले, यह क्षेत्र नंदा वंश के राज्य में था। तीसरे ईसा पूर्व से पहले इस क्षेत्र के छोटे भागों में विभाजित था। बाद में, एक राजपूत राजा राक्षल वंस से, पलामू राज्य झारखंड से हमला किया, और इस क्षेत्र का नियंत्रण ले लिया। 1820 में, अमर सिंह महाराजा के रूप में ताज पहनाया गया था। 1882 में रघुनाथ शरण सिंह देव सरगुजा राज्य को अपने नियंत्रण में ले लिया था जो की "महाराजा" के रूप में लॉर्ड दफफरीउ द्वारा सम्मानित किए गए थे । भारत के समकालीन जीत के बाद वह एडवर्ड मध्य विद्यालय, डाकघर, टेलीग्राफ कार्यालय, सरगुजा के अंबिकापुर राजधानी में मेडिकल स्टोर, जेल और अदालतों की स्थापना की।

सरगुजा जिले की स्थापना 1 जनवरी 1948 को हुआ था जो 1 नवम्बर 1956 को मध्यप्रदेश में शामिल कर दिया गया। उसके बाद 25 मई 1998 को इस जिले का प्रथम प्रशासनिक विभाजन करके कोरिया जिला बनाया गया। १ नवम्बर २००० में  जब छत्तीसगढ राज्य मध्यप्रदेश से अलग हुआ तब सरगुजा जिले को छत्तीसगढ राज्य मे शामिल कर दिया गया। वर्तमान मे सरगुजा जिला पुनः दो और भागो मे विभक्त हो गया है जिसमे नये जिले के रूप मे जिला सुरजपुर और जिला बलरामपुर का निर्माण हुआ है।

नदियाँ:
जिले के मुख्य नदियों कनहर/कन्हार, मोरन, रिहंद और महान हैं।

प्रमुख पर्यटन स्थल:

सेदम जल प्रपात
अम्बिकापुर से 45 कि.मी की दूरी पर अम्बिकापुर- रायगढ मार्ग में सेदम नाम के गांव से दक्षिण दिशा में 2 कि॰मी॰ की दूरी पर पहाडियों के बीच स्थित है। इस झरना के गिरने वाले स्थान पर एक जल कुंड निर्मित है। यहां पर एक शिव मंदिर भी है। शिवरात्री पर सेदम गांव में मेला लगता है। इस झरना को राम झरना के नाम से भी जाना जाता है। यहां पर्यटक वर्ष भर जाते हैं।

मैनपाट (पूर्ण पढ़ें)
मैनपाट अम्बिकापुर से 75 किलोमीटर दुरी पर है इसे छत्तीसगढ का शिमला कहा जाता है। मैंनपाट विन्ध पर्वत माला पर स्थित है जिसकी समुद्र सतह से ऊंचाई 3781 फीट है इसकी लम्बाई 28 किलोमीटर और चौडाई 10 से 13 किलोमीटर है।
प्राकृतिक सम्पदा से भरपुर यह एक सुन्दर स्थान है। यहां सरभंजा जल प्रपात, टाईगर प्वांइट तथा मछली प्वांइट प्रमुख दर्शनीय स्थल हैं। मैनपाट से ही रिहन्द एवं मांड नदी का उदगम हुआ है।
इसे छत्तीसगढ का तिब्बत भी कहा जाता हैं। यहां तिब्बती लोगों का जीवन एवं बौध मंदिर आकर्षण का केन्द्र है।

देवगढ
अम्बिकापुर से लखंनपुर 28 किलोमीटर की दूरी पर है एवं लखंनपुर से 10 किलोमीटर की दूरी पर देवगढ स्थित है। देवगढ प्राचीन काल में ऋषि यमदग्नि की साधना स्थलि रही है। इस शिवलिंग के मध्यभाग पर शक्ति स्वरुप पार्वती जी नारी रूप में अंकित है। इस शिवलिंग को शास्त्रो में अर्द्ध नारीश्वर की उपाधि दी गई है। इसे गौरी शंकर मंदिर भी कहते है। देवगढ में रेणुका नदी के किनारे एकाद्श रुद्ध मंदिरों के भग्नावशेष बिखरे पडे है। देवगढ में गोल्फी मठ की संरचना शैव संप्रदाय से संबंधित मानी जाती है। इसके दर्शनीय स्थल, मंदिरो के भग्नावशेष, गौरी शंकर मंदिर, आयताकार भूगत शैली शिव मंदिर, गोल्फी मठ, पुरातात्विक कलात्मक मूर्तियां एवं प्राकृतिक सौंदर्य है।यहाँ प्रत्येक वर्ष श्रावण के महीने में शिव लिंग में जलाभिषेक की जाती है। इसके आलावा शिवरात्रि में भी जलाभिषेक की जाती है।

>>सरगुजा जिले के पुरात्विक स्थल

कैलाश गुफा
अम्बिकापुर नगर से पूर्व दिशा में 60 किलोमीटर पर स्थित सामरबार नामक स्थान है, जहां पर प्राकृतिक वन सुषमा के बीच कैलाश गुफा स्थित है। इसे परम पूज्य संत रामेश्वर गहिरा गुरू जी नें पहाडी चटटानो को तराशंकर निर्मित करवाया है। महाशिवरात्रि पर विशाल मेंला लगता है। इसके दर्शनीय स्थल गुफा निर्मित शिव पार्वती मंदिर, बाघ माडा, बधद्र्त बीर, यज्ञ मंड्प, जल प्रपात, गुरूकुल संस्कृत विद्यालय, गहिरा गुरू आश्रम है।

लक्ष्मणगढ
अम्बिकापुर से 40 किलोमीटर की दूरी पर लक्ष्मणगढ स्थित है। यह स्थान अम्बिकापुर – बिलासपुर मार्ग पर महेशपुर से 03 किलोमीटर की दूरी पर है। ऐसा माना जाता है कि इसका नाम वनवास काल में श्री लक्ष्मण जी के ठहरने के कारण पडा। य़ह स्थान रामगढ के निकट ही स्थित है। यहां के दर्शनीय स्थल शिवलिंग (लगभग 2 फिट), कमल पुष्प, गजराज सेवित लक्ष्मी जी, प्रस्तर खंड शिलापाट पर कृष्ण जन्म और प्रस्तर खंडो पर उत्कीर्ण अनेक कलाकृतिय़ां है।

ठिनठिनी
पत्थर अम्बिकापुर नगर से 12 किमी. की दुरी पर दरिमा हवाई अड्डा हैं। दरिमा हवाई अड्डा के पास बडे – बडे पत्थरो का समुह है। इन पत्थरो को किसी ठोस चीज से ठोकने पर आवाजे आती है। सर्वाधिक आश्चर्य की बात यह है कि ये आवाजे विभिन्न धातुओ की आती है। इनमे से किसी – किसी पत्थर खुले बर्तन को ठोकने के समान आवाज आती है। इस पत्थरो मे बैठकर या लेटकर बजाने से भी इसके आवाज मे कोइ अंतर नही पडता है। एक ही पत्थर के दो टुकडे अलग-अलग आवाज पैदा करते है। इस विलक्षणता के कारण इस पत्थरो को अंचल के लोग ठिनठिनी पत्थर कहते है।

>>सरगुजा जिले के पुरातात्विक स्थल


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