10/04/2022

रामायण के 5 संस्करण जिनके बारे में आप शायद नहीं जानते

रामायण भारत का प्राचीन ऐतिहासिक संस्कृत महाकाव्य है। रामायण हिंदू धर्म ( सनातन धर्म ) की दो महत्वपूर्ण प्रसिद्ध कथाओं में से एक है। पारंपरिक रूप से महर्षि वाल्मीकि के द्वारा लिखित रामायण महाकाव्य में कोसल राज्य के अयोध्या शहर में एक राजकुमार राम के जीवन का वर्णन किया गया है। इस महाकाव्य में हनुमान जैसे महायोद्धा और रावण जैसे राक्षस का वर्णन किया गया है। परंतु, क्या सम्पूर्ण विश्व में रामायण को ऐसे ही जाना जाता है ?


भारत, दक्षिण पूर्व एशिया के विभिन्न धर्मों और अन्य समाजों में इस महाकाव्य के अन्य संस्करण उपलब्ध है। जिनमें रामायण की कहानी को अलग-अलग तरीको से वर्णन किया गया है, जो महर्षि वाल्मीकि के द्वारा रचित रामायण से काफी भिन्न है। इस पोस्ट में ऐसे ही 4 संस्करणों के बारे में बात करने वाले है :


1. दशरथ जातक (Dasaratha Jakata) 

यह एक बौद्ध संस्करण है जिसमें सीता हरण और रावण का उल्लेख नहीं है। इसमें दशरथ को अयोध्या नहीं बनारस के राजा के रूप में दर्शाया गया है। राजा दशरथ राम और सीता को तीसरी पत्नी कैकेयी से बचाने के लिए हिमालय भेज देते हैं। बारह साल बाद, राम और सीता बनारस लौटते हैं। 

इस कथा में गौतम बुद्ध को राम के रूप में वर्णित किया गया है, और उनकी पिछली जिंदगी के बारे में बताया गया है।


2.पौमचारिया (Paumachariya) :

जैन धर्म में राम की कहानी को तीन समूहों में वर्गीकृत किया जा सकता है; संघदास का संस्करण, विमलसुरी का संस्करण और गुणभद्र का संस्करण।

पौमचारिया जैन मुनि विमालसुरी (Vimalsuri) के द्वारा लिखा गया है। रामायण के इस संस्करण में रावण का वध लक्षमण के द्वारा किया जाता है। 

इसमें राम को जैन मूल्यों का पालन करते हुए दिखाने के लिए उन्हें अहिंसा का अनुयायी दिखाया गया है। पौमचारिया में, राम ने वनवास में रहते हुए तीन बार शादी की।

रावण को उदार ह्रदय वाला जैन धर्म का अनुयायी बताया गया है।

संघदास वाले संस्करण में, सीता को रावण की रानी मंदोदरी की बेटी कहा गया है। इसमे यह भविष्यवाणी की गई थी कि मंदोदरी की पहली संतान परिवार का सर्वनाश कर देगी। इसलिए, रावण ने बच्चे के जन्म के समय उसका त्याग कर दिया।


3. गोंड़ रामायणी (Gond Ramayani) :

यह रामायण का एक मौखिक संस्करण है। जिसे भारत के आदिवासी समाज के द्वारा रचा गया है। इसमे 7 कहानियां है। इस संस्करण में महाभारत के किरदारों जैसे कि भीम का भी वर्णन होता है। एक अन्य कहानी में रावण की पुत्री रानी पुफया से लक्ष्मण के विवाह के बारे में है।

कहानियों में से एक में लक्ष्मण एक दुल्हन की तलाश में मुख्य भूमिका निभाते हैं। कथा का यह संस्करण लक्षमण पर केंद्रित है। इस संस्करण के सातवें और अंतिम कहानी में राम द्वारा सीता को वन में निर्वासित कर दिया जाता है जहाँ उनके पुत्र लव एवं कुश का जन्म होता है। इस कहानी में परिवार के पुनर्मिलन होता है, और अपने महल में लौटने के साथ एक सुखद अंत हुआ।


4. रामकियन (Ramakien)

रामकियन, रामायण का थाई संस्करण है। इसे थाईलैंड का राष्ट्रीय महाकाव्य माना जाता है, जिसे अभी भी देश के स्कूलों में पढ़ाया जाता है। यह बौद्ध रामायण से प्रभावित है।

रामकियन और वाल्मीकि के संस्करण में कुछ समानताएं हैं, यह कहानी हनुमान पर अधिक जोर देती है। इस संस्करण में हनुमान को वाल्मीकि रामायण के जैसे ब्रह्मचारी नहीं दिखाया गया है।


5. काकाविन रामायण (Kakavin Ramayana) :

महत्वपूर्ण अंतर यह है कि सीता को कैसे चित्रित किया जाता है। जबकि भारतीय रामायण उसे एक कोमल, सुंदर, शालीन, वफादार और धैर्यवान महिला के रूप में चित्रित करती है, काकाविन रामायण उसे साहसी, मजबूत नारी के रूप में चित्रित किया गया है, और रावण की लंका में राम की प्रतीक्षा करते हुए नहीं, बल्कि असुरों से लड़ते हुए चित्रित किया गया है। 

यह 7 वीं शताब्दी में भारतीय कवि भट्टिक द्वारा लिखित संस्कृत "कविता भट्टिकव्य" से प्रभावित है।


- प्रवीण सिंह



मेटावर्स क्या होता है ? what is Metaverse



मेटावर्स एक भविष्यवादी, विज्ञान कथा है। इसमें इंटरनेट पर एक एकल, सार्वभौमिक और विशाल आभासी दुनिया का एक काल्पनिक पुनरावृत्ति की जाती है जिसे आभासी वास्तविकता (VR) और संवर्धित वास्तविकता (AR) हेडसेट के उपयोग द्वारा सुगम बनाया गया है। आसान भाषा में, एक मेटावर्स सामाजिक कनेक्शन पर केंद्रित 3डी आभासी दुनिया का एक नेटवर्क है। वर्तमान में मेटावर्स Web 3.0 से प्रभावित है।

"मेटावर्स" शब्द बात करें तो, इसकी उत्पत्ति वर्ष 1992 के विज्ञान कथा उपन्यास स्नो क्रैश में हुई है, जो "मेटा" और "ब्रह्मांड" के एक पोर्टमैंटू के रूप में है।


क्या मेटावर्स विकसित हो रहा है ?

ऑनलाइन वीडियो गेम में मेटावर्स तकनीक के को पहले ही विकसित किया जा चुका है। वर्ष 2003 के वर्चुअल वर्ल्ड प्लेटफॉर्म "सेकेंड लाइफ" को पहले मेटावर्स के रूप में जाना जाता है। परंतु इससे पहले  28 जून, 1995 को "एक्टिव वर्ल्ड" नाम का एक गेम भी आया था जिसमे मेटावर्स के फीचर्स थे।

वर्ष 2017 में, Microsoft ने VR कंपनी AltspaceVR का अधिग्रहण किया, और तब से आभासी वास्तविकता में  आभासी अवतारों के माध्यम से बैठकों को Microsoft  Teams में लागू किया गया।

मेटावर्स को और ज्यादा लोकप्रिय बनाने के पीछे सोशल नेटवर्क कंपनी फेसबुक (Facebook) है। वर्ष 2019 में,  फेसबुक ने फेसबुक होराइजन (Facebook Horizon) नामक एक सोशल वीआर वर्ल्ड लॉन्च किया। वर्ष 2021 में, फेसबुक का नाम बदलकर "मेटा प्लेटफॉर्म्स" कर दिया गया और इसके अध्यक्ष मार्क जुकरबर्ग ने मेटावर्स विकसित करने के लिए कंपनी की प्रतिबद्धता की घोषणा कर दी।



रतनपुर का बीस दुवरिया / बीस दुवारिया मंदिर - Rayapur Bees Duariya


छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के रतनपुर शहर के बैरागवन व मोतीपुर में बीसदुवरिया / बीस दुवारिया / बीसदुअरिया मंदिर स्थित है। 

हाथी किले की अंतिम द्वार मोतीपुर की बीस दुआरिया तालाब के किनारे बीस दुअरिया मंदिर स्थित है। महामाया मंदिर के पीछे बैरागवन में तालाब के किनारे कलचुरी राजा राजसिंह का समारक है, जिसे बीस दुअरिया मंदिर कहते हैं। यह मंदिर मूर्ति विहीन है तथा बीस द्वारों से युक्त है। बैरगवन के पास ही खिचरी केदारनाथ का प्राचीन मंदिर भी स्थित है।


मंदिर का नामकरण : 

इस मंदिर के नामकरण के पीछे दो कारण बताए जाते है। पहला, इस मंदिर में बीस द्वारों से प्रवेश किया जा सकता है। बीस द्वार होने की वजह से इसका नाम बीस दुवरिया / बीस दुवारिया पड़ा। दूसरा कारण यह है कि राजा - लक्ष्मण साय की बीस रानियाँ राजा की मृत्यु के पश्चात् तालाब में डुबकर सती हो गई जिससे बीस डुबरिया नाम पड़ा। और रानियों के सतीत्व की वजह से इसे सती मंदिर भी कहा जाता है।



10/03/2022

राजस्थान की अनुसूचित जनजातियां एवं उनसे संबंधित तथ्य


राजस्थान में जनजाति समुदाय के समग्र विकास हेतु राज्य सरकार द्वारा वर्ष 1975 में जनजाति क्षेत्रीय विकास विभाग की स्थापना की गयी। राजस्थान में कुल 12 अनुसूचित जनजाति समुह निवास करते है। 

राजस्थान अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (संशोधन) अधिनियम 1976 के अनुसार अनुसूचित जनजातियों की सूची :-
क्र.सं.अनुसूचित जनजातियाँ
1.  भील, भील गरासिया, ढोली भील, डूंगरी भील, डूंगरी गरासिया, मेवासी भील, रावल भील, तड़वी भील, भगालिया, भिलाला, पावरा, वसावा, वसावें
2.भील मीना
3.डामोर, डामरिया
4.धानका, तडबी, वालवी, तेतारिया
5.गरासिया (राजपूत गरासिया को छोडकर)
6.काथोडी, कातकरी, ढोर काथोडी, ढोर कातकरी, सोन काथोडी, सोन कातकरी
7.कोकना, कोकनी, कूकना
8.कोली ढोर, टोकरे कोली, कोलचा, कोलघा
9.मीना
10.नायकडा, नायका, चोलीवाला नायका, कापडिया नायका, मोटा नायका, नाना नायका
11.पटेलिया
12.सेहरिआ, सेहारिआ, सहारिया


अनुसूचित क्षेत्र:
राजस्थान के दक्षिण पूर्ण में सघन जनजाति वाले 8 जिलों की 31 तहसीलों को मिलाकर अनुसूचित क्षेत्र निर्मित किया गया है वर्ष 2011 की जनगणनानुसार इस क्षेत्र की जनसंखया 64.64 लाख है जिसमें जनजाति जनसंखया 45.52 लाख है। जो इस क्षेत्र की जनसंखया का 70.42 प्रतिशत हैं।

अनुसूचित क्षेत्र में शामिल जिलों के नाम :
  1. बांसवाडा
  2. पाली
  3. चित्तौड़गढ़
  4. राजमन्द
  5. सिरोही
  6. उदयपुर
  7. प्रतापगढ़
  8. डूंगरगढ़
सबसे अधिक (72.3 प्रतिशत) जनजाति वाला जिला  बांसवाड़ा है, इसके बाद क्रमशः डूंगरपुर और उदयपुर जिलों में 65.1 प्रतिशत और 47.9 प्रतिशत है। परंतु सबसे ज्यादा जनजाति वाला तहसील कोटडा (95 प्रतिशत) है।
सबसे कम जनजातीय आबादी वाले जिले नागौर (0.2 प्रतिशत) और बीकानेर (0.4 प्रतिशत) है।


जनसंख्या 2011 :
  • राजस्थान में अनुसूचित जनजाति राज्य की कुल जनसंख्या 56,507,188 है, जो राज्य की कुल जनसंख्या का 12.6 प्रतिशत है। अनुसूचित जनजाति की जनसंख्या के मामले में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 12वें स्थान पर है।
  • राजस्थान में ज्यादातर अनुसूचित जनजाति ग्रामीण हैं। कुल जनसंख्या का 94.6 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करते हैं जबकि राज्य की कुल जनसंख्या का 76.6 प्रतिशत गांवों में रहते हैं।
  • मीना सबसे अधिक आबादी वाली जनजाति है, जिसकी आबादी 3,799,971 है, जो कुल एसटी आबादी का 53.5 प्रतिशत है, जिसके बाद दूसरे स्थान पर भील (2,805,948) है। मीणा साबसे ज्यादा शिक्षित और संपन्न जनजाति है।
  • कोली ढोर सबसे छोटी जनजाति है जिसकी आबादी 100 से कम है और इसके बाद दूसरे स्थान पर कोकना (405), तीसरे स्थान पर पटेलिया (1,045) और चौथे स्थान पर कथोडी (2,922) आदि आते हैं।




10/02/2022

ताजमहल अब विदेशी पर्यटकों की पसंदीदा जगह नहीं है। -NOW TAJ MAHAL IS NOT FAVORITE SPOT FOR FOREIGNERS TOURISTS

आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (Archaeological Survey of India) ने "India Tourism Statistics 2022" नाम से एक रिपोर्ट जारी की है, इस रिपोर्ट में कहा गया है "कोविड- 19 महामारी से संबंधित प्रतिबंध के कारण भारत में विदेशी पर्यटन आगमन (एफटीए) की संख्या वर्ष 2020 में 2.74 मिलियन की तुलना में 445 प्रतिशत की नकारात्मक वृद्धि दर्ज करते हुए, 2021 के दौरान घटकर 1.52 मिलियन रह गई।"

इस रिपोर्ट में उन स्थानों की एक लिस्ट जारी की गई जहां इस साल सबसे ज्यादा पर्यटक (घरेलू और विदेशी) घूमने आए हैं।


घरेलू पर्यटको की संख्यानुसार पर्यटक स्थल :

  1. ताज महल - 3294611
  2. लाल किला - 1323501
  3. कुतुबमीनार - 1157664
  4. स्मारक समूह, मामल्लापुरम - 1142150
  5. आगरा का किला - 1027462
  6. गोलकुंडा किला - 946972
  7. सूर्य मंदिर, कोणार्क - 672891
  8. ऊपरी किला, अगुआड़ा - 656756
  9. चित्तौरगढ़ - 590389
  10. शनिवारवाडा - 516448


विदेशी पर्यटको की संख्यानुसार पर्यटक स्थल :

  1. स्मारक समूह, मामल्लापुरम - 144984
  2. ताज महल - 38922
  3. सालुवानकुप्पम - 25579
  4. आगरा का किला - 13598
  5. गिंगी का किला, गिंगी - 10483
  6. वट्टाकोट्टई फोर्ट - 9174
  7. कुतुबमीनार - 8456
  8. फोर्ट म्यूजियम, तिरूमायम - 8422
  9. लाल किला - 5579
  10. रॉक कट जैन मंदिर, सिट्टानसल - 5432

JPEG और PNG में क्या अंतर है ?

 


JPEG (Joint Photographic Experts Group) और PNG (Portable Network Graphics) दोनों प्रकार के फॉरमेट का इस्तेमाल तस्वीरों के लिए किया जाता है, इन दोनों का ही इस्तेमाल व्यापक रूप से किया जाता है परंतु दोनों में कई अंतर है।


उनकी विभिन्न संपीड़न (Compression) प्रक्रियाओं के कारण, JPEG में PNG की तुलना में कम डेटा होता है - और इसलिए, JPEG आकार में छोटे होते हैं। जेपीईजी के विपरीत, PMG पारदर्शी पृष्ठभूमि (Transparent backgrounds) का समर्थन करते हैं, जिससे PNG को ग्राफिक डिजाइन के लिए प्राथमिकता दी जाती है। PNG को ग्राफिक्स इंटरचेंज फॉर्मेट (GIF) के लिए एक बेहतर, गैर-पेटेंट प्रतिस्थापन के रूप में विकसित किया गया था।

JPEG संपीड़न (Compression) के दौरान कुछ डाटा हमेसा के लिए मिट जाता है परंतु PNG में ऐसा नहीं होता है।



9/26/2022

झारखण्ड के प्रमुख जलप्रपात - Major waterfalls of Jharkhand


प्रकृति प्रेमियों के लिए झारखंड राज्य भारत के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक है। इस पोस्ट में हम झारखंड के कुछ जलप्रपातों के बारे में बात करने वाले है :


बूढ़ाघाघ जलप्रपात (BudhaGhagh Fall) :

यह जलप्रपात झारखंड के लातेहार जिला के महुआडांड से 15 किमी दुरी पर पलामू टाइगर रिजर्व में उत्तरी कोयल नदी की सहायक नदी बूढ़ा नदी पर स्थित है। इसे लोधाघाघ एवं लोध जलप्रपात भी कहा जाता है। बूढ़ाघाघ जलप्रपात की ऊंचाई 450 फीट है, यह झारखण्ड का सबसे ऊँचा जलप्रपात है। 


घाघरी जलप्रपात (Ghaghri Fall) :

घाघरी नदी पर दो जलप्रपात स्थित है जिंन्हे ऊपरी घाघरी जलप्रपात और निचला घाघरी जलप्रपात कहते है।

ऊपरी घाघरी जलप्रपात, नेतरहाट से 4 किमी की दूरी पर नेतरहाट बांध के नीचे स्थित है। यह एक छोटा जलप्रपात है।

निचला घाघरी जलप्रपात लातेहार जिले में नेतरहाट से 10 किमी की दूरी पर औरंगा नदी की सहायक नदी घाघरी पर अवस्थत है। इस जलप्रपात की ऊंचाई 322 फिट है।


हुण्डरू जलप्रपात (Hundru Fall) :

यह जलप्रपात रांची से 36 किमी पूर्व अनगड़ा प्रखण्ड में स्वर्ण रेखा नदी पर स्थित है। इस जलप्रपात की ऊंचाई 320 फीट है। यह झारखण्ड राज्य का तीसरा सबसे ऊँचा जलप्रपात है। इस जलप्रपात के संबंध में विशेष बात यह है कि भूवैज्ञानिको के अनुसार इस प्रपात का निर्माण राँची स्कार्प के निर्माण के समय माना जाता है। इसे भ्रंश रेखा पर निर्मित प्रपात भी कहा जा सकता है।

इस जलप्रपात के निकट ही स्वर्णरेखा नदी पर सिकिदरी पन बिजली परियोजना स्थित है।


सदनी घाघ जलप्रपात (Sadani Ghagh Fall) :

यह जलप्रपात गुमला जिले में शंख नदी पर में स्थित है। इस प्रपात की ऊंचाई लगभग 61 मीटर यानी करीब 200 फीट है। यह झारखंड के तीसरा साबसे ऊंचा जलप्रपात है। यह स्थल पर्यटकों के मध्य बहुत प्रसिद्ध है।


गुरु सिंधु जलप्रपात (Guru Singhu Fall) :

गुरु सिंधु जलप्रपात गढ़वा जिले के चिनिया प्रखंड से 15 किलोमीटर दूर चपकली गांव के समीप झारखण्ड व छत्तीसगढ़ की सीमा को विभाजित करने वाली कनहर नदी पर स्थित  है। इस जलप्रपात की ऊंचाई लगभग 200 फीट है।


मोतीझरा जलप्रपात (Motijharna fall)

यह जलप्रपात राज्य के साहेबगंज जिले के तालझारी प्रखण्ड में मोतीझरा गांव में स्थित है। गांव के ही नाम पर जलप्रपात का नाम "मोतीझरा जलप्रपात" है। यह महाराजपुर के दक्षिण-पश्चिम में राजमहल पहाड़ियों पर है। इस जलप्रपात की ऊंचाई 150 फीट है। यह जलप्रपात अजय नदी पर स्थित है। इस जलप्रपात की बंदे मोतियों के समान दिखाई देती हैं, इसलिए इसे मोतीझरा जलप्रपात कहा जाता है।


जोन्हा जलप्रपात (Jonha Fall): 

यह जलप्रपात राँची से 32 कि.मी. दक्षिण-पूर्व में रादू नदी पर जोन्हा गांव में स्थित है। इस प्रपात को गौतमधारा के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि यहाँ एक गौतम बुद्ध को समर्पित मंदिर का भी निर्माण किया गया है। जोन्हा जलप्रपात के बारे में विशेष बात यह है कि यह प्रपात भी हुडरू प्रपात की तरह स्कार्प एवं भ्रंश रेखा पर निर्मित है। इस प्रपात की ऊंचाई 150 फीट (50 मीटर) ऊँचा जल प्रपात का निर्माण हुआ है। इसके पास ही सीताधारा नाम का एक छोटा-सा प्रपात स्थित है।


इंद्रा जलप्रपात ( Indra Fall)

इंद्रा जलप्रपात झारखंड राज्य के लातेहार जिले के तुबेद गांव के पास स्थित है। यह जलप्रपात घने जंगलों, पहाड़ों और नदियों से घिरा हुआ है। इंद्रा जलप्रपात की ऊंचाई लगभग 30 फिट है। । झुका हुआ गुफा और तुबेद डैम्स भी देख सकते हैं, जो झरने के नजदीक हैं। इसके निकटवर्ती पर्यटन स्थलो में तुबेद गुफा , ततहा पानी अदि प्रमुख है।

गौतमघाघ : पलामू जिला के महुआटांड के पास स्थित है। इसकी ऊँचाई 36 मीटर है। यह 120 फीट ऊँचा प्रपात है।

बूढ़ाघाघ : राँची के जमीरा पात से उतरने वाली बूढ़ी नदी पर स्थित है। यह राँची जिले में स्थित है। इसे लोधा घाघ भी कहा जाता है। यह महुआडांड़ से 14 किमी. पर लातेहार जिले में 450 फीट ऊँचा है तथा झारखण्ड का सबसे ऊँचा प्रपात है।

रजरप्पा प्रपात : रांची से लगभग 65 किमी की दूरी पर स्थित है। यह रामगढ़ के पास भैरवी और दामोदर नदी के संगम पर स्थित है। इस जलप्रपात की ऊंचाई लगभग 12 फिट है। इस जलप्रपात का निर्माण भैरवी नदी पर दामोदर नदी में गिरते समय होती है।

मुनीडीह प्रपात : धनबाद-बोकारो रोड में मुनीडीह खदान (धनबाद) के पास जंगल में भटिंडा जलप्रपात दामोदर नदी के तट पर अवस्थित है। यहां का जलप्रपात काफी गहरा है। पानी के कारण यहां फिसलन भी बहुत रहती है।

मिरचहया प्रपात : यह लातेहार जिले के गुरु ब्लाक से 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह बेतला बाघ परियोजना क्षेत्र में आता है। इसका निर्माण उत्तरी कोयल नदी के एक सहायक नदी से हुआ है। ऐसा माना जाता है कि यहाँ कभी काले ग्रेनाइट का लावा बहता था जो आज एक गुंबद की तरह काले चट्टान के रूप में खड़ा है। यह गारु नेतरहाट सड़क के बाई तरफ लगभग 50 मीटर की दूरी पर है।

सुखलदरी / सुखलधरी जलप्रपात : गढ़वा जिले के नगर ऊँटारी से 35 किलोमीटर दक्षिण में कन्हर नदी पर स्थित है। इस जलप्रपात की ऊंचाई लगभग 100 फीट है।

बलचौरा जलप्रपात : गढ़वा जिले के घुरकी प्रखंड में स्थित सुखलदरी से 10 किलोमीटर की दूरी पर कनहर नदी पर स्थित है। बरसात के दिनों में इस प्रपात की आवाज तीन-चार कि.मी. तक सुनाई देती है। 

दशम जलप्रपात : दशम जलप्रपात तमारा गांव के पास रांची-टाटा रोड पर रांची शहर से 34 किमी दूर कचनी नदी पर स्थित है। इस जलप्रपात की ऊंचाई लगभग 144 फीट है। यह जलप्रपात 10 पानी की धाराएं बनाती हुई गिरती जिस वजह से इसे दशम जलप्रपात कहते है।

डूमारो जलप्रपात : हजारीबाग जिले के बड़कागांव प्रखंड मुख्यालय से 6 किलोमीटर दूर डूमारो नदी में स्थित है। डूमारो गुफा के बगल में लगभग 100 मीटर ऊंचा पर्वत से पानी गिरता है। जिस स्थल पर पानी गिरता है, वहां छोटी सी झील बन गयी है। उस झील से लगभग 100 मीटर पहाड़ से नीचे पानी गिरता है। जो चट्टानों व पहाड़ों को काटते हुए डूमारो नदी में जा गिरता है। डूमारो नदी का उद्गम स्थल डूमारो जलप्रपात ही है। डूमारो दामोदर नदी की सहायक नदी है।

बंदरचुवां / बंदरचुआं जलप्रपात : हजारीबाग जिले में  बंदरचुवा जलप्रपात महुदी पर्वत पर स्थित है। यह एक मौसमी जलप्रपात है, बरसात के दिनों में काफी ऊंचाई से पानी गिरता है।

टिपटिप वर्षा : बड़कागांव उरीमारी रोड स्थित मल्डीजंगल के पास यह टिप टिप वर्षा स्थल है। यहां गर्मी हो या बरसात पानी हमेशा टिप टिप बारिश की तरह टपकते रहता है। जिस वजह से इसे टिपटिप वर्षा कहा जाता है।

सुग्गाबांध जल प्रपात : सुग्गाबांध झरना बरसांड के नजदीक झारखण्ड के लातेहार जिले में स्थित है। यह पलामू टाइगर रिजर्व के करीब है और बेतला से लगभग 60 किलोमीटर दूर स्थित है।

कांति जलप्रपात : यह जलप्रपात लातेहार जिले में लातेहार से लगभग 47 किलोमीटर की दूरी पर रांची- मेदिनीनगर रोड से 7 किलोमीटर की दूरी पर सेन्हा ग्राम में स्थित है। इस जल प्रपात की ऊँचाई लगभग 200 फीट है।

जयन्तगढ़ प्रपात : यह चाईबासा से 58 कि. मी. दक्षिण बैतरनी नदी पर स्थित जयन्तगढ़ का गाँव है। जयन्तगढ़ से करीब 6 कि. मी. पश्चिम, बैतरनी पर एक धार्मिक स्थान है जिसे रामतीर्थ कहते हैं। यह विश्वास किया जाता है। कि श्रीराम जब लंका जा रहे थे तो वे इस स्थान पर ठहरे थे। इसमें एक गहरी प्राकृतिक जल भंडार है जो एक छोटे से जल प्रपात द्वारा भरा जाता है। ऐसे लोगों का विश्वास है, स्थानीय लोगों का विश्वास है। कि यहाँ राम, लक्ष्मण एवं सीताजी के पद चिह्न हैं।

देमू झरना : पलामू जिला में एक स्थान है जिसका नाम है सप्तवाहिनी । इस स्थान पर पोड़ी नदी 4 या 5 मीटर की ऊँचाई से गिरती है, तथा एक झरने का निर्माण करती है। यहाँ पर दुर्गा एवं महावीर जी की अनेकों मूर्तियाँ है। यह स्थान बहुत ही धार्मिक एवं पर्यटकों का आकर्षण का केन्द्र है। 

घाघरा जलप्रपात : हजारीबाग जिले के केरेडारी प्रखंड में उन्टारी गाँव के निकट स्थित है। इसकी ऊंचाई लगभग 70 फिट है।

हरियोकर फाल : यह चतरा से उत्तर-पूर्व 35 कि. मी. की दूरी पर स्थित है। यहाँ पर दो जल प्रपात हैं जो पहाड़ी तली पर एक बड़े जल-भंडार का निर्माण करते हैं।

पंचघाघ प्रपात : वास्तव में यह पांच झरनों का एक समूह है, जिसे देहाती भाषा में पंच घाघ कहा जाता है। यहां पर बनाई नदी विभाजित होकर पांच झरनों में बंट जाती है। यह खूँटी से 14 कि.मी. की दूरी पर स्थित पाँच बहनों की कथा से जुड़ा प्रपात है।

उसरी प्रपात : यह प्रपात गिरिडीह जिले के उसरी नदी में धनबाद से 52 कि.मी. दूर मुख्य सड़क से 2 कि.मी अंदर खण्डोली पहाड़ी की ढलान पर स्थित है। उसरी जो बारकर नदी की एक सहायक नदी है। उसरी फॉल तीन अलग धाराओं में बँटा हुआ है। 

सेरका जलप्रपात : गुमला जिले के बिशुनपुर प्रखंड में बिशुनपुर से करीब 2 किलोमीटर की दूरी पर सेरका नदी पर स्थित है। 

पारस पानी : यह लातेहार जिला में नागर नामक स्थान के 25 कि. मी. दूरी पर स्थित है। इस गाँव के किनारे पर स्थित जलप्रपात कनहार नदी पर एक सुन्दर प्रपात है जिसे भू-खाल दरी नाम दिया गया है।

मोतीझरा प्रपात : यह राजमहल पहाड़ी पर महाराजपुर रेलवे स्टेशन से 3 कि.मी. दक्षिण-पश्चिम में राजमहल पहाड़ियों पर 150 फीट ऊँचा प्रपात है जो अजय नदी पर निर्मित होता है।

ओरसापट लोदी झरना: यह नेतरहाट से 10 कि. मी. की दूरी पर स्थित है। समुद्र तल से इसकी ऊँचाई 1330 मीटर है। ओरसापट में एक विशाल जल प्रपात है जिसका नाम लोदी जल प्रपात है जो 155 मीटर की ऊँचाई से गिरता है। | यह राज्य का सबसे बड़ा जल प्रपात है तथा कभी भी सूखता नहीं है।

प्रेमाघाघ प्रपात : गुमला से 48 कि.मी. दक्षिण रायडीह प्रखंड में यह प्रपात स्थित है।

घरघरिया जलप्रपात : लोहरदगा से 20 कि.मी. दूर पाट क्षेत्र की तलहटी पर यह प्रपात है।

धारागिरि जलप्रपात : यह जलप्रपात सिंहभूम के घाटशिला अनुमंडल क्षेत्र में घाटशिला से 18 कि.मी. पर स्थित है। इसके पास में ही बुरूडीह डैम है। यह क्षेत्र घने वन से घिरा हुआ है।

केलाघाघ जलप्रपात : यह प्रपात सिमडेगा से 3 कि.मी. दक्षिण-पश्चिम में दो पहाडियों के बीच से निकलता है।

थाकोरा जलप्रपात : प. सिंहभूम के मंझारी प्रखंड में विदरी गाँव से 6 कि.मी. दूर यह स्थित है।

हेपाद जलप्रपात : यह प्रपात विशुनपुर से 30 कि.मी. दूर घाघरा नदी का स्रोत स्थल है।

पैरनाघाघ जलप्रपात : यह तपकारा से 5 कि.मी. दूर स्थित है।

नागफेनी जलप्रपात : गुमला से 14 कि.मी. दूर नागफेनी नामक स्थान में यह प्रपात स्थानीय नदी पर बनता है।

सुनुआ जलप्रपात : राँची जिले के अनगड़ा प्रखंड में जहाँ और भी कई प्रसिद्ध प्रपात हैं। अनगड़ा से 12 कि.मी. दूर सुनुआ  प्रपात भी है।

बोकारो जलप्रपात : हजारीबाग राँची रोड पर हजारीबाग से 8 कि.मी. पहले भोरांगी गाँव है जहाँ यह प्रपात स्थित हैं।

लुपुंगुटु जलप्रपात : चाईबासा से 2 कि.मी. पर लुपुंगुटु गाँव है जहाँ यह काफी प्रसिद्ध प्रपात है।

पेरघाघ जलप्रपात : इस नाम से दो छोटे प्रपात हैं- एक गुमला के बसिया प्रखंड में तो दूसरा सिमडेगा के कोचेडेगा नाम स्थान में।

सुगाकाटा घाघ जलप्रपात : सिमडेगा से 23 कि.मी. दूर शंख नदी में हरदीबेड़ा और पुरनापानी गाँव के पास यह प्रपात है।

हेसातु और गूंगाझंझ प्रपात : दोनों जलप्रपात गढ़वा जिले में स्थित हैं।

गोआ जलप्रपात : यह चतरा से 6 कि.मी. पश्चिम जलेद गाँव में स्थित है।

तमासिन जलप्रपात : यह चतरा जिले में कान्हाचट्टी प्रखंड से करीब 32  किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

मालुदाह जलप्रपात : यह चतरा जिले में जिला मुख्यालय से  8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इसकी ऊंचाई लगभग 50 फिट है।

बरियो जलप्रपात : यह प्रपात चतारा जिला मुख्यालय से करीब 12 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

डुमेर सुमेर जलप्रपात : चतारा जिला मुख्यालय से करीब 12 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।




9/25/2022

अड़भार (Adbhar) के बारे में रोचक तथ्य


अड़भार सक्ती जिला के मालखरौदा तहसील में सक्ती से करीब 11 कि.मी. की दूसरी पर स्थित एक प्राचीन गांव है। यहां विराजित अष्टभुजी माता का मंदिर आस्था का केंद्र है। यहां प्रतिवर्ष नवरात्रि के अवसर पर ज्योति कलश जलाया जाता हैं।


अड़भार स्थित मंदिर के बारे में :

प्राचीन इतिहास में अड़भार का उल्लेख अष्टद्वार के रूप में मिलता है। यहां से पांचवी छठवी शताब्दी के अवशेष प्राप्त हुए है। यह एक वेधशाला भी था।

अष्टभुजी माता का मंदिर और इस नगर के चारों ओर बने आठ विशाल दरवाजों की वजह से इसका प्राचीन नाम अष्टद्वार पड़ा और धीरे धीरे अपभ्रंश होकर इसका नाम अड़भार हो गया। मंदिर में मां अष्टभुजी की ग्रेनाइट पत्थर की आदमकद मूर्ति इमली के पेड़ के नीचे विराजित है। आठ भुजाओं वाली मां दक्षिणमुखी भी है। सम्पूर्ण भारत में कलकत्ता की दक्षिणमुखी काली माता और अड़भार की दक्षिणमुखी अष्टभुजी देवी के अलावा और कहीं की भी देवी दक्षिणमुखी नहीं है। 

अष्टभुजा मूर्ति के ठीक दाहिनी ओर गुन गुरू की प्रतिमा योग मुद्रा में बैठी हुई प्रतीत होती है।

मूर्तियां एवं कलाकृति : अड़भार से अनेक गुप्तकालीन कलाकृति प्राप्त हुई है, जैसे कि महिषासुर मर्दिनी, अष्टभुजी शिव, पार्श्वनाथ, गंगा - यमुना , मिथुन आदि पतिमाएँ।

ताम्रपत्र : पाण्डु वंश के तीवरदेव के उत्तराधिकारी महान्नराज(न्नदेव) का ताम्रपत्र अड़भार से प्राप्त हुआ है।


छत्तीसगढ़ के प्रमुख देवी मंदिर - Devi Temples in Chhattisgarh

छत्तीसगढ़ राज्य सांस्कृतिक रूप से एक सम्पन्न राज्य है। यहां लोग सभी हिन्दू त्योहारों को बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। छत्तीसगढ़ ज्यादातर त्यौहारों को पारंपरिक रूप से ही मनाया जाता है। पारंपरिक रूप से हरसोउल्लास के साथ मनाये जाने वाले प्रमुख त्योहारों में से एक है नवरात्रि (नवरात) है। छत्तीसगढ़ में देवी के अलग-अलग नामो से उनके अवतारों की पूजा की जेति है, जैसे कि देवी दाई, डोकरी दाई आदि। छत्तीसगढ़ी भाषा में माता को "दाई" कहा जाता है।

यदि आप छत्तीसगढ़ के निवासी हो या आप छत्तीसगढ़ में घूमने आए हो तो आप को छत्तीसगढ़ के नवरात्रि मनाने की परंपरा का दर्शन जरूर करना चाहिए। छत्तीसगढ़ के कुछ पारंपरिक और ऐतिहासिक देवी (माता) मंदिरों की सूची निम्न है जहाँ आप को दर्शन के लिए जाना चाहिए :


बम्लेश्वरी मंदिर (Bambleshwari temple):

यह मंदिर छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले के डोंगरगढ़ में स्थित है। मान्यतानुसार कामावतीपुरी के राजा वीरसेन ने डोंगरगढ़ की पहाड़ी में महेश्वरी देवी का मंदिर का निर्माण कराया था। यहां बगुलामुखी (बम्लेश्वरी) मंदिर है। डोंगरगढ़ में शारदीय एवं वासंतीय नवरात्री में भव्य मेला आयोजित किया जाता है। पूर्ण पढ़ें


खल्लारी माता (Khallari Mata) :

महासमुन्द जिले में जिला मुख्यालय से 25 किमी दक्षिण की ओर खल्लारी गांव की पहाड़ी के शीर्ष पर खल्लारी माता का मंदिर स्थित है। प्रतिवर्ष क्वांर एवं चैत्र नवरात्र के दौरान बड़ी संख्या में भक्तों की भीड़ दर्शन के लिये आती है। प्रतिवर्ष चैत्र मास की पूर्णिमा के अवसर पर वार्षिक मेले का आयोजन किया जाता है। पूर्ण पढ़ें


चंडी मंदिर (Chandi Mandir) :

चंडी माता मंदिर, महासमुन्द से 40 किमी दक्षिण की ओर विकासखण्ड बागबाहरा में घुंचापाली गांव स्थित है। जहां पर चंडी देवी की प्राकृतिक महा प्रतिमा विराजमान है। यहां प्रतिवर्ष चैत्र एवं क्वांर मास के नवरात्र में मेला लगता है। यहां रोज शाम श्रद्धालुओं के साथ आधा दर्जन भालू भी माता की आरती में शामिल होने पहुंचते है। ये भालू श्रद्धालुओं और गांव वालों के साथ 


दंतेश्वरी माता मंदिर (Danteshwari Mata Mandir) :

दंतेश्वरी माता मंदिर दंतेवाड़ा जिले में जगदलपुर शहर से लगभग 84 किलोमीटर दूर डंकिनी-शंखिनी के संगम पर स्थित है। इसे 52 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। माना जाता है कि देवी सती की दांत यहां गिरा था, इसलिए दंतेवाड़ा नाम का नाम लिया गया। इस मंदिर का निर्माण काकतीय वंश के शासकों के द्वारा किया गया था। दंतेश्वरी माता बस्तर राज परिवार की यह कुल देवी है। पूर्ण पढ़ें


मड़वारानी मंदिर (Madawarani Temple) :

मड़वारानी मंदिर, छत्तीसगढ ऱाज्य के कोरबा जिले में कोरबा-चाम्पा रोड पर कोरबा से करीब 18 किलोमीटर की दूरी पर एक छोटे पर्वत पर स्थित है। मड़वा का अर्थ मंडप होता है। स्थानीय मान्यतानुसार माँ मड़वारानी यहां स्वयं प्रगट हुई थी। पूर्ण पढ़ें


कोसगाई माता मंदिर ( Kosagai Mata Temple ) :

यह मंदिर फुटका पहाड़ के पहाड़ी इलाकों पर कोरबा-कटघोरा रोड से 25 किलोमीटर की दूरी पर कोसगईगढ़ नाम के एक गांव के पहाड़ी पर स्थित है। यह एक ऐतिहासिक मंदिर है। यहां मंदिर का निर्माण 16 वीं शताब्दी में बहारेन्द्र साय के शासनकाल में हुआ था।


महामाया मंदिर ( Mahamaya Temple):

महामाया मंदिर बिलापुर जिले के रतनपुर में स्थित एक प्राचीन मंदिर है। महामाया मंदिर का निर्माण कलचुरी राजा रत्नदेव प्रथम ने 12-13 सदीं में कराया था। मान्यतानुसार यहां रतनपुर में देवी सती का दाहिना स्कंद गिरा था। यह स्थल बिलासपुर से करीब 37 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।


चंद्रहासिनी माता मंदिर ( Chandrahasini Mata Temple ):

यह मंदिर सक्ती जिला के डभरा तहसील में चंद्रपुर में स्थित है। यह काफी प्रशिद्ध धार्मिक स्थल है। यहां संबलपुर के राजा चंद्रहास द्वारा मंदिर निर्माण और देवी स्थापना का उल्लेख है। देवी की आकृति चंद्रहास अर्थात चन्द्रमा के सामान मुख होने के कारण उन्हें "चंद्रहासिनी देवी" कहा जाता है। चंद्रहासिनी मंदिर से थोड़ी दूरी पर नाथलदाई का मंदिर स्थित है, जो की रायगढ़ जिले की सीमा अंतर्गत आता है। मान्यतानुसार, मां चंद्रहासिनी के दर्शन के बाद माता नाथलदाई के दर्शन भी जरूरी है।


उमा देवी मंदिर ( Uma Devi Temple ) :

कांकेर-नारायणपुर मुख्य मार्ग नरहरपुर ब्लॉक में रिसेवाड़ा गांव में स्थित है। इसका निर्माण 12 वीं शताब्दी में सोमवंश के शासन काल के दौरान किया गया था। यह मंदिर देवी पार्वती को समर्पित है। पूर्ण पढ़ें 


माता अंगारमोती (Maa Angarmoti) :

माता अंगारमोती की प्रतिमा धमतरी जिले में दो स्थानों पर स्थापित है। गंगरेल में माता का पैर स्थापित है, वहीं रुद्रीरोड सीताकुंड में माता का धड़ विराजमान है। धड़ तालाब में मछुआरों के जाल में फंसा मिला, मछुआरों ने इसे मामूली पत्थर समझकर वापस तालाब में ही वपर डाल दिया। फिर गांव के ही एक व्यक्ति को माता का स्वप्र आया फिर तालाब से निकालकर पास के ही झाड़ के नीचे स्थापित किया जाए। 


माता शबरी का मंदिर (Shabari Temple) :

यदि हम माताओं को याद कर रहें है तो हम उन्हें कैसे भूल सकते है जिंन्हे स्वयं भगवान राम ने माता पुकारा था। माता शबरी को समर्पित यह प्राचीन मंदिर खरौद में स्थित है। माता शबरी को समर्पित यह एकलौता प्राचीन मंदिर है।


माता कौशल्या मंदिर (Mata Kaushalya Temple) :

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 27 किलोमीटर की दूरी पर चंद्रखुरी गांव में भगवान राम की माता कौशल्या जी का जन्म स्थान माना जाता है। गांव के जलसेन तालाब के बीचोंबीच माता कौशल्या का मंदिर बना हुआ है। मान्यतानुसार मंदिर का निर्माण सोमवंशी राजाओं ने करवाया था। माता कौशल्या को समर्पित यह इकलौता मंदिर है। पूर्ण पढ़ें


अष्टभुजा माता (Ashtbhuja Mata) :

अष्टभुजा माता मंदिर सक्ती जिले के मालखरौदा तहसील के अड़भार में स्थित है। यह एक ऐतिहासिक एवं प्राचीन मंदिर है। यह भारत के चुनिंदा दक्षिणमुखी काली मंदिरों में से एक है। पूर्ण पढ़ें




9/24/2022

प्रथम छत्तीसगढ़िया ओलंपिक - First Chhattisgarhiya Olympics


छत्तीसगढ़ सरकार के द्वारा छत्तीसगढ़ में पारंपरिक रूप से खेले जाने वाले स्थानीय खेलो को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से अपनी तरह का अनोखा ओलंपिक खेलों का आयोजन किया जा रहा है। इन खेलों का नाम "छत्तीसगढ़िया ओलंपिक" है। छत्तीसगढ़िया ओलंपिक के लिए 6 सितंबर को हुई कैबिनेट की बैठक में इन खेलों का खाका तैयार किया गया था। 

छत्तीसगढ़िया ओलंपिक का शुभारंभ 6 अक्टूबर, 2022 को किया जाएगा। ये खेल तीन महीनों तक चलेंगे। इसका समापन 6 जनवरी, 2023 को रायपुर में होगा। छत्तीसगढ़िया ओलंपिक की कार्ययोजना "खेल एवं युवा कल्याण विभाग" के द्वारा बनाई गई है, एवं इसके आयोजन की जिम्मेदारी पंचायत एवं ग्रामीण विकास और नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग को सौंपी गई है। 


कौन कौन से खेल शामिल है ?

छत्तीसगढ़िया ओलंपिक में 14 तरह के पारंपरिक खेलों को शामिल किया गया है।

दलीय श्रेणी :

  1. गिल्ली-डंडा
  2. पिट्टूल
  3. संखली
  4. लंगड़ी दौड़
  5. कबड्डी
  6. खो-खो
  7. रस्साकसी
  8. बांटी (कंचा) 

एकल श्रेणी :

  1. बिल्लस
  2. फुगड़ी
  3. गेड़ी दौड़
  4. भंवरा
  5. 100 मीटर दौड़
  6. लंबी कूद

आयोजन कितने स्तरों में होगा ?
आयोजन 6 स्तरों में होगा। 
  1. गांव स्तर, राजीव युवा मितान क्लब का होगा ( 6 अक्टूबर से 11 अक्टूबर )
  2. जोन स्तर, जिसमें 8 राजीव युवा मितान क्लब को मिलाकर एक क्लब बनाया जाएगा ( 15 से 20 अक्टूबर )
  3. विकासखंड/नगरीय क्लस्टर स्तर ( 27 अक्टूबर से 10 नवंबर )
  4. जिला स्तर (17 से 26 नवंबर)
  5. संभाग स्तर (5 दिसंबर से 14 दिसंबर)
  6. राज्य स्तर (28 दिसंबर से 6 जनवरी, 2023)

कौन हिस्सा ले सकता है ?
छत्तीसगढ़िया ओलंपिक में महिला एवं पुरूष दोनों वर्ग के लोगो को तीन वर्गों में बांटा गया है। पहले वर्ग में 18 साल तक, दूसरे में 18 से 40 और तीसरे वर्ग में 40 से अधिक उम्र के लोग शामिल हो सकेंगे।