राज्‍य के नीति के निदेशक तत्‍व

संविधान के भाग 4 में ‍अनुच्छेद 36-51 तक "राज्‍य के नीति के निदेशक तत्‍व" को शामिल किया गया है। संविधान का यह भाग आयरलैण्‍ड के संविधान से प्रभावित है। इसमें ऐसे अधिकार है जिन्‍हे तत्‍काल देना संभव नहीं था, उन अधिकारों को बी.एन.राव की सलाह पर नीति-निदेशक तत्‍वों की श्रेणी में रख दिया गया ताकि जब सरकारें सक्षम हो जाएंगी तब धीरे-धीरे इन उपबंधों को लागू करेंगी। 

42 वें संविधान संशोधन 1976 में माध्‍यम से नीति-निदेशक तत्‍वों में अनुच्‍छेद 39क, 43क, तथा 48क को अन्‍त:स्‍थपित किया गया ।



प्रमुख अनुच्छेद

अनुच्‍छेद-36: परिभाषा – नीति-निदेशक तत्‍वों के संदर्भ में ‘राज्‍य‘ की परिभाषा है। इसमें भी राज्‍य का वही अर्थ है जो भाग 3 में है।

अनुच्‍छेद-37: इस भाग में दिये गए तत्‍वों का न्‍यायालय द्वारा प्रवर्तनीय न होते हुए भी देश के शासन में मूलभूत माना गया है तथा विधि बनाने में इन सिद्धांतों को लागू करना राज्‍य का कर्तव्‍य होगा।

अनुच्‍छेद-38: राज्‍य लोक-कल्‍याण की अभिवृद्धि के लिये सामाजिक व्‍यवस्‍था बनाएगा।

अनुच्‍छेद-38(1): राज्‍य लोक-कल्‍याण की अभिवृद्धि के लिये सामाजिक व्‍यवस्‍था बनाएगा ताकि सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्‍याय हो सके।

अनुच्‍छेद-38(2): आय, प्रतिष्‍ठा, सुविधाओं तथा अवसरों की असमानताओं को समाप्‍त करने का प्रयास करना।

अनुच्‍छेद-39:  राज्‍य द्वारा अनुसरणीय कुछ नीति-निदेशक तत्‍व

पुरूषों व स्‍त्रियों को आजीविका के पर्याप्‍त साधन प्राप्‍त करने का अधिकार।

समाज में भौतिक संसाधनों के स्‍वामित्‍व का उचित वितरण।

अर्थव्‍यवस्‍था में धन तथा उत्‍पादन के साधनों के अहितकारी केन्‍द्रीकरण का निषेध।

पुरूषों व स्त्रियों के लिये समान कार्य के लिये समान वेतन।

पुरूषों व स्‍त्री श्रमिकों तथा बच्‍चों को मजबूरी में आयु या शक्ति की दृष्टि से प्रतिकूल रोज़गार में जाने से बचाना।

बच्‍चों को स्‍वतंत्र और गरिमा के साथ विकास का अवसर प्रदान करना और शोषण से बचना।

अनुच्‍छेद-39क: समान न्‍याय और नि:शुल्‍क विधिक सहायता    

राज्‍य यह सुनिश्चित करेगा कि विधि तंत्र इस प्रकार काम करे कि समान अवसर के आधार पर न्‍याय सुलभ हो तथा अर्थिक या किसी भी अन्‍य आधार पर नागरिक न्‍याय प्राप्‍त करने से वंचित न रह जाऍं। यह विधिक सहायता नि:शुल्‍क होगी।

अनुच्‍छेद-40: ग्राम पंचायतों का गठन

राज्‍य ग्राम पंचायतों का गठन करने के लिये कदम उठाएगा और उनको ऐसी शक्तियॉ और प्राधिकार प्रदान करेगा जो उन्‍हे स्‍वायत्‍ता शासन की इकाइयों के रूप में कार्य करने योग्‍य बनाने के लिये आवश्‍यक हों।

अनुच्‍छेद 41: कुछ दशाओं में काम, शिक्षा और लोक सहायता पाने का अधिकार।

अनुच्‍छेद 42: काम की न्‍याय संगत और मानवोचित दशाओं का तथा प्रसूति सहायता का उपबंध।

अनुच्‍छेद 43: कर्मकारों के लिये निर्बाह मजदूरी , शिष्ट जीवन स्तर व अवकाश की व्यवस्था करना , और कुटीर उद्धोगों को प्रोत्साहित करना।

  • क: उद्योगों के प्रबंधन में कर्मकारों के भाग लेने के लिये उपयुक्‍त विधान बनाना।
  • ख: सहकारी समिमियों का उन्‍नयन, सहकारी समितियों के स्‍वैच्छिक गठन, स्‍वायत्‍त प्रचालन , लोकतंत्रिक नियंत्रण तथा पेशेवर प्रबंधन को प्रोत्‍साहित करना ।

अनुच्‍छेद 44: नागरिकों के लिये एक समान सिविल संहिता लागू करने का प्रयास करना।

नोट:- भारत में ‘गोवा’ एक अकेला राज्‍य है जहॉं समान नागरिक संहिता लागू है।


अनुच्‍छेद 45: शिशुओं की देखभाल तथा 6 वर्ष से कम उम्र के बच्‍चों को शिक्षा देने का प्रयास करना।

अनुच्‍छेद 46: अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्‍य दुर्बल वर्गो के शिक्षा और अर्थ संबंधी हितों की अभिवृद्धि करना और हर तरह के शोषण व सामाजिक अन्‍याय से उनकी रक्षा करना।

अनुच्‍छेद 47: लोगों के पोषहार स्‍तर और जीवन स्‍तर को उॅचा करने तथा लोक स्‍वास्‍थ्‍य के सुधार करने को प्राथमिक कर्तव्‍य मानना तथा मादक पेयों व हानिकारक नशीले पदार्थों के सेवन का प्रतिषेध करने का प्रयास करना।


अनुच्‍छेद 48: कृषि और पशुपालन का संगठन

कृषि तथा पशुपालन का संगठन आधुनिक-वैज्ञानिक प्रणालियों के अनुसार करना तथा गाय-बछडों व अन्‍य दुधारू या वाहक पशुओं की नस्‍लों का परिरक्षण और सुधार करना व उनके वध का प्रतिषेध करने के लिये कदम उठाना।


अनुच्‍छेद 48क: पर्यावरण के संरक्षण व संवर्द्धन तथा वन व वन्‍य जीवों की रक्षा का प्रयास करना।

अनुच्‍छेद 49: राष्‍ट्रीय महत्‍व के स्‍मारकों, स्‍थानों और वस्‍तुओं का संरक्षण करना।

अनुच्‍छेद 50: कार्यपालिका से न्‍यायपालिका का पृथक्करण

अनुच्‍छेद 51: अन्‍तर्राष्‍ट्रीय शांति एवं सुरक्षा की अभिवृद्धि।


छत्तीसगढ़ के प्रमुख पुरस्कार एवं सम्मान



प्रवीरचंद्र भंजदेव सम्मान

खेल (तीरंदाजी), खेल एवं युवा कल्याण विभाग द्वारा


मिनीमाता सम्मान

महिला उत्थान, महिला एवं बाल विकास द्वारा


चंदूलाल चंद्राकर स्मृति

पत्रकारिता ( प्रिंट मीडिया ), जनसंपर्क विभाग द्वारा


चंदूलाल चंद्राकर स्मृति ( इलेक्ट्रॉनिक मीडिया )

पत्रकारिता ( इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ), जनसंपर्क विभाग द्वारा


मधुखेर स्मृति पत्रकारिता पुरुस्कार

पत्रकारिता ( प्रिंट इंग्लिश मीडिया ), जनसंपर्क विभाग द्वारा


पंडित माधव राव सप्रे राष्ट्रीय रचनात्मकता सम्मान

हिंदी लेखन में उत्कृष्ट रचना हेतु


हाजी हसन अली अवार्ड

उर्दू भाषा के विकास हेतु


राजा चक्रधर सिंह सम्मान

संगीत एवं कला, संस्कृति विभाग


शहीद वीरनारायण सिंह सम्मान

आदिवासी उत्थान व सामाजिक एवं आर्थिक विकास के लिए, आदिम जाति कल्याण विभाग द्वारा


शहीद गुण्डाधुर सम्मान

खेल के क्षेत्र में प्रदान किया जाता है।


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भारत के प्रतिष्ठित पुरस्कार/सम्मान –Prestigious Awards / Honors of India


साहित्य अकादमी पुरस्कार : यह भारत की प्रमुख भाषाओं में साहित्य के मामले में दिया जाने वाला सबसे सम्मानित पुरस्कार है। इसे वर्ष 1954 में स्थापित किया गया था। 1,00,000 रुपये का चेक, "सत्यजीज रे" द्वारा डिजाइन की गई साहित्य अकादमी पट्टिका प्रदान की जाती है।  


परम वीर चक्र : युद्ध में अप्रतिम सैन्य प्रदर्शन के लिए दिया जाने वाला पुरस्कार। इसे 0 मेंंh 26 जनवरी के रोज स्थापित किया गया था।अलग-अलग राज्यों के लिए तयशुदा धनराशिएक कांस्य पदक जिसके बीच में राज्य प्रतीक और उसके चारों तरफ चार इंद्र के वज्र बने होते हैं।एक सनद जिस पर राष्ट्रपति की मुहर लगी होती है और राष्ट्रपति द्वारा दिया जाता है।


भाषा सम्मान : इस पुरस्कार से सम्मानित करने का काम साहित्य अकादमी करती है। इसके तहत 24 स्थापित भाषाओं के अलावा क्लासिकल और मध्यकालीन साहित्य में बेहतर करने वालों को सम्मानित किया जाता है। इसे वर्ष 1996 में स्थापित किया गया था।1,00,000 रुपये, स्मरण पटि्टका प्रदान किया जाता है।


युवा पुरस्कार : यह पुरस्कार साहित्य अकादमी द्वारा नवलेखन में दिया जाता है। साहित्य में 35 की उम्र से कम के उभरते हुए साहित्कारों को इस पुरस्कार से नवाजा जाता है। 50,000 रुपये, एक तांबे की पट्टिका प्रदान किया जाता है।


पद्म पुरस्कार (पद्म विभूषण, पद्म भूषण, पद्म श्री) : इस पुरस्कार को भारत रत्न के बाद सबसे सम्मानित पुरस्कार माना जाता है। यह पुरस्कार अलग-अलग विधाओं में बेहतरीन काम करने वाले नागरिकों को दिया जाता है। इस पुरस्कार को वर्ष 1954 में स्थापित किया गया था।इस पुरस्कार में सोने, चांदी या फिर कांस्य पदक दिए जाते हैं।राष्ट्रपति की मुहर वाली सनद जिसे राष्ट्रपति के द्वारा प्रदान किया जाता है।


भारत रत्न : इसे भारत का सबसे सम्मानित नागरिक पुरस्कार माना जाता है। किसी भी विधा में बेहतरीन कार्य करने वालों को इस पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है।एक प्लेटिनम पट्टिका जिस पर सत्यमेव जयते खुदा होता है। एक सनद जिस पर राष्ट्रपति की मुहर होती है और राष्ट्रपति के द्वारा  प्रदान किया जाता है।



अशोक चक्र : यह भारत में शांति के दौरान सैन्य सेवा में अप्रतिम धैर्य व साहस के लिए दिया जाने वाला सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार है। इसे वर्ष 1952 में स्थापित किया गया था।अलग-अलग राज्यों के तयशुदा धनराशिकांस्य पदक जिसके बीचोबीच अशोक चक्र खुदा होता है। एक सनद जिस पर राष्ट्रपति की मुहर होती है और राष्ट्रपति के द्वारा  प्रदान किया जाता है।


गांधी शांति पुरस्कार : सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्र में गांधीवादी तौरतरीकों से काम करने वाली संस्थाओं और शख्सियतों को दिया जाने वाला पुरस्कार। इसे भारत सरकार देती है। 


जल/थल/वायु पद : कयह पुरस्कार सेना में युद्ध और शांति के दौरान अप्रतिम साहस के प्रदर्शन के लिए दिया जाता है। इस पुरस्कार में एक मेडल दिया जाता है जिसमें दो एंकर होते हैं और एक हिमालय का चील बना होता है। 


राजीव गांधी खेल रत्न : यह भारत में खेल के मामले में दिए जाने वाले सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों में से एक है। बीते चार वर्षों में बेहतरीन खेल के प्रदर्शन के लिए इस पुरस्कार को दिया जाता है। इसे वर्ष 1991 में स्थापित किया गया था।75,000 रुपये कैशएक सनद जिस पर राष्ट्रपति की मुहर होती है और राष्ट्रपति ही प्रदान करते हैं।एक पदक जिस पर राजीव गांधी खेल रत्न हिंदी और अंग्रेजी में लिखा होता है। साथ ही इस पर राज्य प्रतीक भी बना होता है।


राष्ट्रीय बहादुरी पुरस्कार : यह पुरस्कार 6 वर्ष से 18 वर्ष के बीच के ऐसे बच्चों को दिया जाता है जिन्होंने विषम परिस्थितियों में अदम्य साहस का परिचय दिया होता है। इस पुरस्कार को पांच कैटेगरी में बांटा गया है और इनमें से सबसे प्रतिष्ठित भारत पुरस्कार है।कैटेगरी के हिसाब से कैशकैटेगरी के हिसाब से पदकएक सनद जिस पर राष्ट्रपति की मुहर होती है और राष्ट्रपति ही प्रदान करते हैं। इंदिरा गांधी स्कॉलरशिप के तहत आगे की पढ़ाई के लिए वित्तीय मदद की जाती है।


ध्यानचंद पुरस्कारभारत सरकार द्वारा लाइफ टाइम अचीवमेंट के लिए दिया जाने वाला सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार। देश के दिग्गज हॉकी खिलाड़ी के नाम पर स्थापित इस पुरस्कार की शुरुआत वर्ष 2002 में हुई थी। 50,000 रुपये कैशमेजर ध्यानचंद की कांसे से बनी एक मूर्तिएक मेडल जिस पर मेजर ध्यानचंद का अक्स खुदा होता है। एक प्रशस्ति पत्र प्रदान किया जाता है।


अर्जुन पुरस्कार : राष्ट्रीय स्तर व देशी स्तर पर खेले जाने वाले खेलों में बेहतरीन प्रदर्शन के लिए दिया जाने वाला पुरस्कार। यह पुरस्कार वर्ष 1961 में स्थापित किया गया था और इसके तहत विशेष रूप से सक्षम खिलाड़ियों को भी पुरस्कृत किया जाता है।5,00,000 रुपये कैशकांसे से बनी अर्जुन की प्रतीकात्मक मूर्तिप्रशस्ति पत्र प्रदान किया जाता है।


द्रोणाचार्य पुरस्कार : यह पुरस्कार खेल में बेहतरीन कोचिंग के लिए दिया जाता है। हिन्दू धर्म की मिथकीय कहानियों में द्रोणाचार्य अर्जुन के गुरु हैं जो अर्जुन को दुनिया का बेहतरीन धनुर्धर बनाते हैं। इस पुरस्कार की शुरुआत वर्ष 1985 से हुई है।गुरु द्रोणाचार्य की कांस्य प्रतिमा7,00,000 रुपये कैश प्रशस्ति पत्र प्रदान किया जाता है।



इंदिरा गांधी शांति पुरस्कार : इस पुरस्कार से भारत द्वारा पूरी दुनिया की बेहतरीन संस्थाओं और शख्सियतों को नवाजा जाता है। जिन्होंने पूरी दुनिया में शांति और नए आर्थिक सुधारों में अहम योगदान किए हैं। इस पुरस्कार की स्थापना वर्ष 1986 में हुई थी।25,00,000 रुपये और प्रमाणपत्र प्रदान किया जाता है।

भारत की न्यायपालिका – The Judiciary of India


भारतीय संविधान के भाग 5 में अनुच्छेद 124 से 147 तक संघ की न्यायपालिका के बारे में उल्लेख हैं। और भाग 6 में अनुच्छेद 214 से 237 तक राज्यों के उच्च न्यायालय के बारे में उल्लेख है। इसके अलावा अध्याय 6 में अधिनस्थ न्यायालयों के बारे में उल्लेख है।


न्यायपालिका संरचना :

सर्वोच्च न्यायालय > उच्च न्यायालय > जिला न्यायालय > अधिनस्थ न्यायालय



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आधुनिक भारतीय विद्वानो की सूची

प्रफुल चंद्र राय

प्रसिद्ध शिक्षाविद् और रसायनज्ञ. प्रफुल चंद्र राय को भारत की पहली फार्मास्यूटिकल कंपनी, बंगाल रसायन एवं फार्मास्यूटिकल्स के संस्थापक के रूप में जाना जाता है।


सलीम अली (1896 - 1987)

सलीम अली अपने समय के महान प्रकृतिवादी रहे हैं. पक्षीविज्ञान को विकसित करने में इनका अहम योगदान रहा है. इनके इसी योगदान के लिए इन्हें 'Birdman of India' के नाम से भी जाना जाता है।


श्रीनिवास रामानुजन् (1887 - 1920)

श्रीनिवास रामानुजन् एक महान भारतीय गणितज्ञ थे। इन्हें आधुनिक काल के महानतम गणित विचारकों में गिना जाता है. इन्हें गणित में कोई विशेष प्रशिक्षण नहीं मिला, फिर भी इन्होंने विश्लेषण और संख्या सिद्धांत के क्षेत्रों में गहन योगदान दिए।


चन्द्रशेखर वेंकट रामन (1888 - 1970)

चन्द्रशेखर वेंकट रामन भारतीय भौतिक-शास्त्री थे. प्रकाश के प्रकीर्णन पर बेहतरीन कार्य के लिये वर्ष 1930 में उन्हें भौतिकी का प्रतिष्ठित नोबेल पुरस्कार दिया गया. उनका आविष्कार उनके ही नाम पर रामन प्रभाव के नाम से जाना जाता है।


होमी जहांगीर भाभा (1909 - 1966)

होमी जहांगीर भाभा भारत के एक प्रमुख वैज्ञानिक और स्वप्नदृष्टा थे. इन्होंने भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम की कल्पना की थी. उन्होने मुट्ठी भर वैज्ञानिकों की मदद से मार्च 1944 में नाभिकीय ऊर्जा पर अनुसंधान की शुरुआत की।


जगदीश चन्द्र बसु (1858 - 1937)

डॉ. जगदीश चन्द्र बसु भारत के प्रसिद्ध वैज्ञानिक थे. इन्हें भौतिकी, जीवविज्ञान, वनस्पति विज्ञान और पुरातत्व का गहरा ज्ञान था. वे ऐसे पहले वैज्ञानिक थे जिन्होंने रेडियो और सूक्ष्म तरंगों की प्रकाशिकी पर काम किया।


सत्येन्द्रनाथ बोस (1894 - 1974)

सत्येन्द्रनाथ बोस भारतीय गणितज्ञ और भौतिक शास्त्री हैं. भौतिक शास्त्र में दो प्रकार के अणु माने जाते हैं - बोसान और फर्मियान. इनमे से बोसान सत्येन्द्र नाथ बोस के नाम पर ही हैं।


अब्दुल कलाम 

अबुल पकिर जैनुलाअबदीन अब्दुल कलाम, जिन्हें डॉक्टर ए पी जे अब्दुल कलाम के नाम से भी जाना जाता है, भारतीय गणतंत्र के ग्यारहवें निर्वाचित रहे राष्ट्रपति हैं. वे भारत के पूर्व राष्ट्रपति, जानेमाने वैज्ञानिक और अभियंता के रूप में विख्यात हैं।


भारत के प्रमुख समाज सुधारक

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भरतीय स्थापत्य कला : मन्दिर निर्माण की शैलियां



भरतीय में पूर्व मध्यकालीन शिल्पशास्त्रों में मंदिर स्थापत्य की तीन शैलियाँ बताई गई हैं, नागर शैली, द्रविड़ शैली और वेसर शैली।


नागर शैली - (Nagar)
नागर शैली का प्रचलन हिमालय और विन्ध्य पहाड़ों के बीच की धरती में पाया जाता है। इस शैली का विस्तार उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में बीजापुर तक और पश्चिम में पंजाब से लेकर पूरब में बंगाल तक था.
इस शैली के सबसे पुराने उदाहरण गुप्तकालीन मंदिरों में, विशेषकर, देवगढ़ के दशावतार मंदिर और भितरगाँव के ईंट-निर्मित मंदिर हैं। भुवनेश्वर में स्थित लिंगराज मंदिर इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण है. 

नागर शैली की दो बड़ी विशेषताएँ हैं :
इसकी विशिष्ट योजना और विमान। इसकी मुख्य भूमि आयताकार होती है जिसमें बीच के दोनों ओर क्रमिक विमान होते हैं जिनके चलते इसका पूर्ण आकार तिकोना हो जाता है। यदि दोनों पार्श्वों में एक-एक विमान होता है तो वह त्रिरथ कहलाता है
दो-दो विमानों वाले मध्य भाग को सप्तरथ और चार-चार विमानों वाले भाग को नवरथ कहते हैं. ये विमान मध्य भाग्य से लेकर के मंदिर के अंतिम ऊँचाई तक बनाए जाते हैं।
मंदिर के सबसे ऊपर शिखर होता है। मंदिर के शिखर को रेखा शिखर भी कहते हैं।
नागर शैली के मंदिर में दो भवन होते हैं, एक गर्भगृह और दूसरा मंडप। गर्भगृह ऊँचा होता है और मंडप छोटा होता है। गर्भगृह के ऊपर एक घंटाकार संरचना होती है जिससे मंदिर की ऊँचाई बढ़ जाती है। नागर शैली के मंदिरों में चार कक्ष होते हैं, गर्भगृह, जगमोहन, नाट्यमंदिर और भोगमंदिर।
प्रारम्भिक नागर शैली के मंदिरों में स्तम्भ नहीं होते थे. 8वीं शताब्दी आते-आते नागर शैली में कहीं-कहीं विविधता आई। 


द्रविड़ शैली - (Dravid)
द्रविड़ शैली कृष्णा और कावेरी नदियों के बीच की भूमि में अपनाई गई। द्रविड़ शैली या द्रविड़ स्थापत्य शैली का सम्बन्ध दक्षिण और दक्कन के मंदिरों से है, परंतु उत्तर भारत और मध्य भारत में भी इस शैली के मंदिर पाए गए हैं, जैसे - लाड़खान का पार्वती मंदिर तथा ऐहोल के कौन्ठगुडि और मेगुती मंदिर।

द्रविड़ शैली की प्रमुख विशेषता इसका पिरामिडीय विमान है। इस विमान में मंजिल पर मंजिल होते हैं जो बड़े से ऊपर की ओर छोटे होते चले जाते हैं और अंत में गुम्बदाकार आकृति होती है जिसका तकनीकी नाम स्तूपी अथवा स्तूपिका होता है. समय के साथ द्रविड़ मंदिरों में विमानों के ऊपर मूर्तियों आदि की संख्या बढ़ती चली गयी. द्रविड़ मंदिर में एक आयताकार गर्भगृह होता है जिसके चारों ओर प्रदक्षिणा का मार्ग होता है. द्रविड़ मंदिरों में समय के साथ कई विशेषताएँ जुड़ती चली गईं, जैसे - स्तम्भ पर खड़े बड़े कक्ष एवं गलियारे तथा विशालकाय गोपुर (द्वार)।

द्रविड़ शैली की विशेषताएं :- 
1. इस शैली में मुख्य मंदिर के चार से अधिक पार्श्व होते हैं।
2. मंदिर का शिखर और विमान पिरामिडीय आकृति के होते हैं।

द्रविडीय स्थापत्य में स्तम्भ और प्लास्टर का प्रचुर प्रयोग होता है। यदि इस शैली में कोई शिव मंदिर है तो उसके लिए अलग से नंदी मंडप भी होता है। इसी प्रकार ऐसे विष्णु मंदिरों में एक गरुड़ मंडप भी होता है. उत्तर भारतीय मंदिरों के विपरीत दक्षिण भारतीय मंदिरों में चारदिवारी भी होती है. कांची में स्थित कैलासनाथ मंदिर द्रविड़ स्थापत्य का एक प्रमुख उदाहरण है। यह मंदिर राजसिंह और उसके बेटे महेंद्र तृतीय के द्वारा बनाया गया है।


वेसर शैली - (Vesar)
वेसर शैली विन्ध्य पहाड़ों और कृष्णा नदी के बीच के प्रदेश से सम्बन्ध रखती है। इस शैली का विकाश पूर्व मध्यकाल में हुआ। 
यह एक मिश्रित शैली है जिसमें नागर और द्रविड़ दोनों शैलियों के लक्षण पाए जाते हैं।
वेसर शैली के उदाहरणों में दक्कन भाग में कल्याणी के परवर्ती चालुक्यों द्वारा तथा होयसालों के द्वारा बनाए गए मंदिर प्रमुख हैं. 

वेसर शैली में बौद्ध चैत्यों के समान अर्धचंद्राकार संरचना भी देखी जाती है, जैसे – ऐहोल के दुर्गामंदिर में. मध्य भारत और दक्कन में स्थान-स्थान पर वेसर शैली में कुछ अंतर भी पाए जाते हैं. उदाहरणस्वरूप, पापनाथ मंदिर और पट्टडकल मंदिर।

भारत में राजपूतों का उदय



उत्तर भारत में हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद शासन का विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया तेज हो गयी। 7–8 शताब्दी में राजपूतों का उदय हुआ। उनका उत्तर भारत की राजनीति में बारहवीं सदी तक प्रभाव कायम रहा। इनके काल को ‘राजपूत काल’ के नाम से जाना जाता है। 


‘राजपूत’ शब्द संस्कृत के राजपुत्र का ही अपभ्रंश है। संभवतः प्राचीन काल में इस शब्द का प्रयोग किसी जाति के रूप में न होकर राजपरिवार के सदस्यों के लिए होता था।


इस काल में उत्तर भारत में राजपूतों  के प्रमुख वंशों – चौहान, परमार, गुर्जर, प्रतिहार, पाल, चंदेल, गहड़वाल आदि ने अपने राज्य स्थापित किये।


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कश्मीर का इतिहास (प्रमुख राजवंश) – Kashmir Dynasty



कश्मीर के प्राचीन राजवंशों के बारे में "राजतरंगिणी" से जानकारी मिलती है। राजतरंगिणी में कश्मीर का प्राचीन इतिहास महाभारत-युद्ध (3138 ई.पू.) से 312 वर्ष पूर्व से माना जाता है। राजतरंगिणी में गोनन्द’ या ‘गोनर्द’ से राजाओं की सूची प्रारम्भ की है। गोनंद प्रथम मगध-नरेश जरासंध का रिश्तेदार था और युधिष्ठिर का समकालीन था। वह कृष्ण के बड़े भाई बलराम द्वारा मारा गया था।

3 ई.पू. में सम्राट अशोक ने कश्‍मीर में बौद्ध धर्म का प्रसार किया।  बाद में कनिष्‍क ने इसकी जड़ें और गहरी कीं। छठी शताब्‍दी के आरंभ में कश्‍मीर पर हूणों का अधिकार हो गया। वर्ष 530 के बाद इस पर उज्‍जैन साम्राज्‍य का नियंत्रण हो गया। विक्रमादित्‍य राजवंश के पतन के पश्‍चात कश्‍मीर पर स्‍थानीय शासक राज करने लगे। वहां हिंदू और बौद्ध संस्‍‍कृतियों का मिश्रित रूप वि‍कसित हुआ। कश्‍मीर के हिंदू राज्‍यों मं ललितादित्‍य (वर्ष 724 - 760 ) सबसे प्रसिद्ध राजा हुए जिनका राज्‍य पूर्व में बंगाल तक, दक्षिण में कोंकण तक पश्चिम में तुर्किस्‍तान और उत्‍तर-पूर्व में तिब्‍बत तक फैला था। ललितादित्‍य ने अनेक भव्‍य भवनों का निर्माण किया। 

कश्‍मीर में इस्‍लाम का आगमान 13वीं और 14वीं शताब्‍दी में हुआ मुस्लिम शासकों का जैन-उल-अब्दीन (1420-70) सबसे प्रसिद्ध शासक हुए। बाद में चक शासकों ने जैन-उल-अब्दीन के पुत्र हैदरशाह की सेना को खदेड़ दिया और वर्ष 1586 तक कश्‍मीर पर राज किया वर्ष 1586 में अकबर ने कश्‍मीर को जीत लिया। वर्ष 1752 में तत्‍कालीन कमजोर मुगल शासक के हाथ से निकलकर आफगानिस्‍तान के अहमद शाह अब्‍दाली के हाथों में चला गया। 67 साल तक पठानों ने कश्‍मीर घाटी पर शासन किया।


प्रमुख राज वंश:

कार्कोट वंश
उत्पल वंश
लोहार वंश

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सिनौली – Sinauli


सिनौली उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में नई दिल्ली से 70 किलोमीटर दूर गंगा और यमुना नदियों के दोआब में स्थित एक पुरातात्विक स्थल है। यह एशिया का अब तक का सबसे बड़ा दफन स्थल है। इस जगह की खोज 2005 में हुई थी। वर्ष 2005 में एक ग्रामीण प्रभाष शर्मा को अपने खेत में प्राचीन वस्तुएं मिली थीं। इसके बाद ही एएसआइ ने खोदाई कर यहां से 106 मानव कंकाल निकाले थे। 

डॉ. संजय मंजुल के नेतृत्व में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के पुरातत्वविदों ने 2018 में सिनौली की खुदाई की। उन्होंने वहां 116 दफनियों की खोज की।


रथ:

इसने भारतवर्ष में खोजा गया पहला प्राचीन रथ प्रदान किया। यह रथ अब 2100 ईसा पूर्व और 1900 ईसा पूर्व के बीच का है।

यह एक ठोस पहिया रथ है, लेकिन इसमें तांबे से बना त्रिकोणीय आकार का रेडियल सुदृढीकरण होता है (एक अलग तरह का बोला जाता है), जिससे यह तेजी से आगे बढ़ने के दौरान पहियों के त्वरित टूटने से बचने के लिए, दुनिया के अन्य हिस्सों में असम्बद्ध स्पोक व्हील रथों से बेहतर होता है।

इस उन्नत रथ की तुलना में मेसोपोटामिया की पहाड़ियों की तुलना में 3,000 ईसा पूर्व और 2,500 बीसीई ठोस पहिया रथों को दुनिया के अन्य संस्कृतियों से पता चला।