छत्तीसगढ़ – राम वन गमन पर्यटन परिपथ ( Ram Van Gaman Paryatan Paripath )

Chhattisgarh Ram Path

छत्तीसगढ़ में "राम वन गमन पथ" की घोषणा मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने अक्तूबर, 2019 में की थी। इस पथ में 75 स्थल है, जहां श्रीराम ने छत्तीसगढ़ में वनगमन के दौरान भ्रमण किया जिसमें से 51 स्थल ऐसे हैं, जहां प्रभु राम ने भ्रमण के दौरान कुछ समय व्यतीत किए थे। 


शुभारंभ : 

छत्तीसगढ़ में राम वन गमन पर्यटन परिपथ परियोजना के प्रथम चरण का शुभारंभ 7 अक्टूबर, 2021 को मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने माता कौशल्या की नगरी चंदखुरी में आधिकारिक तौर पर किया। चंदखुरी में माता कौशल्या मंदिर परिसर के जीर्णोद्धार एवं सौंदर्यीकरण कार्य का भी लोकार्पण तथा भगवान श्रीराम की 51 फीट ऊँची प्रतिमा का लाईट के माध्यम से अनावरण किया गया।


 प्रथम चरण में 9 स्थलों का विकास

योजना के तहत प्रथम चरण में 9 स्थल - सीतामढ़ी-हरचौका (कोरिया), रामगढ़ (सरगुजा), शिवरीनारायण-खरौद (जांजगीर-चांपा), तुरतुरिया (बलौदाबाजार), चंदखुरी (रायपुर), सिहावा-सप्तऋषि आश्रम (धमतरी), रामाराम (सुकमा) का चयन किया गया है। राम वन गमन पर्यटन परिपथ के चिन्हित 9 स्थलों में से 4 स्थल रामगढ़, तुरतुरिया, सिहावा-सत्पऋषि आश्रम एवं तीरथगढ़ वन क्षेत्र में स्थित है।


इन्हे देखें :

रामपाल

दंतेश्वरी माता मंदिर - Danteshwari Mata Mandir



दंतेश्वरी माता मंदिर दंतेवाड़ा जिले में जगदलपुर शहर से लगभग 84 किलोमीटर दूर डंकिनी-शंखिनी के संगम पर स्थित है। यह बस्तर क्षेत्र की सबसे सम्मानित देवी को समर्पित मंदिर, 52 शक्ति पिथों में से एक माना जाता है। माना जाता है कि देवी सती की दांत यहां गिरा था, इसलिए दंतेवाड़ा नाम का नाम लिया गया। दंतेश्वरी माता बस्तर राज परिवार की यह कुल देवी है।


बस्तर दशहरा :

बस्तर दशहरा के 9 वे दिन जोगी उठाई मावली पर घाव की किया जाता है। मावली पर घाव  : अर्थ है देवी की स्थापना। मावली देवी को दंतेश्वरी का ही एक रूप मानते हैं। इस कार्यक्रम के तहत दंतेवाड़ा से श्रद्धापूर्वक दंतेश्वरी की डोली में लाई गई मावली मूर्ति का स्वागत किया जाता है। पूर्ण पढ़ें


मंदिर का इतिहास :

निर्मांण काकतीय शासक अन्न्मदेव ने कराया था। मंदिर का जीर्णोद्धार पहली बार वारंगल से आए पांडव अर्जुन कुल के राजाओं ने करवाया था। वर्ष 1932-33 में दंतेश्वरी मंदिर का दूसरी बार जीर्णोद्धार तत्कालीन बस्तर महारानी प्रफुल्ल कुमारी देवी ने कराया था। 


मंदिर निर्माण के संबंध में मान्यता :

मान्यतानुसार, काकतीय राजा अन्न्म देव देवी के दर्शन करने यहां आए तब देवी दंतेश्वरी ने उन्हें दर्शन देकर वरदान दिया था कि जहां तक वह जाएगा वहां तक देवी उसके साथ चलेगी और उसका राज्य होगा। इसके साथ ही देवी ने राजा से पीछे मुड़कर न देखने की शर्त भी रखी।

राजा कई दिनों तक बस्तर क्षेत्र में चलता रहा और देवी उसके पीछे जाती रही। जब शंकनी-डंकनी नदी के संगम के पास पहुंचे तो नदी पार करते समय रेत को वजह से राजा को देवी के पायल की आवाज सुनाई नहीं दी। तब राजा पीछे मुड़कर देखा और देवी वहीं ठहर गई। इसके बाद राजा ने वहां मंदिर निर्माण कराया।


मान्यता :

माता सती का एक दांत यहां गिरा था और दंतेश्वरी शक्ति पिठ की स्थापना हुई थी। यहां स्थित नदी के किनारे अष्ट भैरव का आवास माना जाता है, वर्ष 1883 तक यहां नर बलि होती थी।


इन्हे देखें:

मारिया विद्रोह 

बस्तर दशहरा

खो-खो बावली ( Kho Kho Bawali )

खो-खो बावली ( Kho Kho Bawali ), छत्तीसगढ़ राज्य के बिलासपुर जिले में स्थित है। यह रतनपुर से करीब 4 किलोमीटर की दूरी पर स्थित लखनी माता मंदिर के कुछ ही दुरी में स्थित जुनाशहर में खो-खो बावली स्थित है। यह एक कुआँ सुरंग है, जिसमे तीन रास्ते बनाए गए हैं, जिसमे से एक बादल महल, दूसरा बिलासपुर तथा तीसरा बिलासपुर के श्याम टाकीज तक जाती हैं।


माना जाता है की राजा इन रास्तों का इस्तेमाल आपात काल में किया करते थे। बरसात के दिनों में इस सुरंग में पानी भरा होता है।

नोबेल पुरस्कार 2021 – Nobel Prize ( विजेताओं की सूची )

नोबेल पुरस्कार, नोबेल फाउंडेशन द्वारा स्वीडन के वैज्ञानिक अल्फ्रेड नोबेल की याद में वर्ष 1901 से दी जाती है। वर्तमान में वर्तमान में नोबेल पुरस्कार 6 क्षेत्रों में प्रदान किए जाते है, परंतु शुरुआत में यह 5 क्षेत्रों में प्रदान किए जाते थे। अर्थशास्त्र के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार की शुरुआत 1968 से की गई। नोबेल पुरस्कार के रूप में प्रशस्ति-पत्र के साथ 10 लाख डालर की राशि प्रदान की जाती है।

नोट : साहित्य का नोबेल दी स्वीडिश एकेडमी के द्वारा प्रदान की जाती है। इसकी भी अपनी नोबेल कमिटी फॉर लिटरेचर है।


नोबेल पुरस्कार के 6 क्षेत्र : शांति, साहित्य, भौतिकी, रसायन, चिकित्सा विज्ञान और अर्थशास्त्र के क्षेत्र में विश्व का सर्वोच्च पुरस्कार है। 


रसायन ( Chemistry ):

बेंजामिन लिस्ट और डेविड डब्ल्यू.सी मैकमिलन को दिया गया है. दोनों को यह पुरस्कार एसिमेट्रिक ऑर्गेनकैटालिसस के क्षेत्र में रिसर्च के लिए प्रदान किया गया है।


भौतिकी ( Physics ):

भौतिकी नोबेल पुरस्कार सुकुरो मनाबे, क्लॉस हेसलमैन और जॉर्जियो परिसी को जलवायु संबंधी खोज में उल्लेखनीय योगदान के लिए नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया है।


चिकित्सा ( Medical ):

अमेरिकन वैज्ञानिक हार्वे जे ऑल्टर और माइकल हॉफटन व ब्रिटिश वैज्ञानिक चार्ल्स एम राइस को संयुक्त रूप से प्रदान किया गया है। उन्हें यह सम्मान हेपेटाइटिस सी वायरस की खोज के लिए मिला है।


शांति ( Peace ):

2021 का नोबेल शांति पुरस्कार फिलीपीन की पत्रकार मारिया रसा  और रूसी पत्रकार दमित्री मुरातोव को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए दिया गया है। विजेताओं की घोषणा शुक्रवार को नॉर्वेजियन नोबेल समिति के द्वारा की गई।


अर्थशास्त्र ( Economic ):

2021 का अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार अमेरिका के डेविड कार्ड, जोशुआ डी. एंग्रिस्ट और गुइडो इम्बेन्स को अनपेक्षित प्रयोगों, या तथाकथित 'प्राकृतिक प्रयोगों' से निष्कर्ष निकालने के लिए प्रदान किया गया।


साहित्य (Literature):

दी स्वीडिश एकेडमी के द्वारा वर्ष 2021 का साहित्य का नोबेल पुरस्कार उपन्यासकार अब्दुलराजक गुरनाह को दिया गया। अब्दुलराजक गुरनाह ने अपनी लेखनी के जरिए उपनिवेशवाद के प्रभावों, संस्कृतियों को लेकर काफी कुछ लिखा है।

अभी तक उन्होंने कुल 10 उपन्यास लिखे है, उनके अब्दुलराजक गुरनाह द्वारा लिखित उपन्यास ( Novel / books by abdulrazak gurnah )

  1. Memory of Departure (1987)
  2. Pilgrims Way (1988)
  3. Dottie (1990)
  4. Paradise (1994)
  5. Admiring Silence (1996)
  6. By the Sea (2001)
  7. Desertion (2005)
  8. The Last Gift (2011)
  9. Gravel Heart (2017)
  10. Afterlives (2020)



Updating....


इन्हे देखें :

नोबेल और ऑस्कर दोनो पुरस्कार जीतने वाले व्यक्ति



बाबू छोटेलाल श्रीवास्तव Babu Chotelal Shrivastava



जन्म : 28 फरवरी, 1889 

मृत्यु : 18 जुलाई, 1974


बाबू छोटेलाल श्रीवास्तव छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता सेनानी थे। जिनका जन्म 28 फरवरी, 1889 को वर्तमान धमतरी जिले के कंडेल ग्राम में हुआ था। इन्होंने पंडित सुंदरलाल शर्मा और नारायण मेघावले के साथ भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया। इन्होंने वर्ष 1915 में शिवस्तव पुस्तकालय की स्थापना की थी। धमतरी में इनका घर स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े लोगो के लिए एक प्रमुख केंद्र था। वर्ष 1918 में "Dhamtari Tehsil Political Council" की स्थापना की गई, बाबू छोटेलाल श्रीवास्तव इसके प्रमुख संस्थापक सदस्यों में से एक थे।


स्वंत्रता आंदोलन एवं राजनीति:

बाबू छोटेलाल श्रीवास्तव ने किसानों का नेतृत्व करते हुए ब्रिटिश राज के अत्याचार के खिलाफ प्रदर्शन किया। वर्ष 1920 में कंडेल नहर सत्याग्रह ( जल सत्याग्रह ) में बाबू छोटेलाल श्रीवास्तव का विशेष योगदान रहा। वर्ष 1921 में, उन्होंने स्वदेशी आंदोलन के लिए खादी उत्पादन केंद्र की स्थापना की। वर्ष 1922 में श्याम लाल सोम के नेतृत्व में सिहावा में एक जंगल सत्याग्रह हुआ, जिसमें बाबू छोटेलाल श्रीवास्तव ने पूरा समर्थन किया। वर्ष 1930 में रुद्री जंगल सत्याग्रह में बाबू साहब ने सक्रिय भूमिका निभाई। फिर उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। वर्ष 1933 में, गांधी, छत्तीसगढ़ की अपनी दूसरी यात्रा पर, इमली गए। वहां उन्होंने बाबू छोटे लाल के नेतृत्व की तारीफ की। 

वर्ष 1937 में श्रीवास्तव धमतरी नगर पालिका निगम के अध्यक्ष चुने गए। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में बाबू साहब की भी सक्रिय भूमिका निभाई थी। 


मृत्यु : 

बाबू छोटेलाल श्रीवास्तव की मृत्यु 18 जुलाई 1976 को थी।


हरिहर वैष्णव – Harihar Vaishnav



हरिहर वैष्णव का जन्म 19 जनवरी 1955 को श्यामदास वैष्णव और जयमणि वैष्णव के घर हुआ। वे एक साहित्यकार थे। उन्होंने बस्तर की लोक कथाओं को बरसों की मेहनत से संग्रहित किया। 


साहित्य एवं कार्य :

हरिहर वैष्णव जनजातियों में प्रचलित कहानियों, गीतों को लिपिबद्ध किया है। हिंदी के साथ ही बस्तर की स्थानीय बोलियों, हल्बी, भतरी में भी उन्होंने साहित्य लिखने की शुरुआत की थी। श्री वैष्णव की 24 किताबें  से ज्यादा प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्होंने स्कॉटलैंड की एनीमेशन संस्था वेस्ट हाईलैंड एनीमेशन के साथ हल्बी के पहले एनीमेशन फिल्मों का निर्माण भी किया था।


हरिहर वैष्णव की प्रमुख कृतियां :

मोहभंग (कहानी-संग्रह), लछमी जगार (बस्तर का लोक महाकाव्य), बस्तर का लोक साहित्य (लोक साहित्य), चलो, चलें बस्तर (बाल साहित्य), बस्तर के तीज-त्यौहार (बाल साहित्य), राजा और बेल कन्या (लोक साहित्य), बस्तर की गीति कथाएँ (लोक साहित्य), धनकुल (बस्तर का लोक महाकाव्य), बस्तर के धनकुल गीत (शोध विनिबन्ध), बाली जगार, आठे जगार, तीजा जगार, बस्तर की लोक कथाएँ, बस्तर की आदिवासी एवं लोक कलाएँ (भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली से), सुमिन बाई बिसेन द्वारा प्रस्तुत छत्तीसगढ़ी लोक-गाथा धनकुल (छत्तीसगढ़ राज्य हिन्दी ग्रंथ अकादमी, रायपुर से)। हरिहर जी ने बस्तर केंद्रित विभिन्न पत्रिकाओं का संपादन भी भी किया है जिनमें प्रमुख हैं – बस्तर की मौखिक कथाएँ (लाला जगदलपुरी के साथ), घूमर (हल्बी साहित्य पत्रिका), प्रस्तुति और ककसाड़ (लघु पत्रिका)।


पुरस्कार एवं सम्मान :

  • वर्ष 2009 में छत्तीसगढ़ हिंदी साहित्य परिषद का उमेश शर्मा सम्मान 
  • वर्ष 2009 में दुष्यंत कुमार स्मारक संग्रहालय का आंचलिक साहित्यकार सम्मान 
  • वर्ष 2015 में छत्तीसगढ़ राज्य अलंकरण पंडित सुंदरलाल शर्मा साहित्य सम्मान 
  • वर्ष 2015 में वेरियर एल्विन प्रतिष्ठा अलंकरण और साहित्य अकादमी के भाषा सम्मान 

मृत्यु :
23 सितंबर, 2021 को 66 वर्ष की आयु में हरिहर वैष्णव की मृत्यु हो गई। 

चौरा चौरी कांड ( असहयोग आंदोलन का समापन ) – Chauri Chaura incident


असहयोग आंदोलन के दौरान उत्तर प्रदेश के चौरी चौरा कस्बे में 4 फरवरी, 1922 को आंदोलनकारियों ने बैठक की और जुलूस निकालने के लिये पास के मुंडेरा बाज़ार को चुना गया। पुलिसकर्मियों ने उन्हें जुलूस निकालने से रोकने का प्रयास किया। इसी दौरान पुलिस और स्वयंसेवकों के बीच झड़प हो गई। पुलिस ने भीड़ पर गोली चला दी, जिसमें कुछ लोग मारे और कई घायल हो गए। इस घटना की वजह से गुस्साई भीड़ ने एक पुलिस स्टेशन में आग लगा दी, जिसमें 23 पुलिसकर्मी मारे गए। सुभाष चंद्र कुशवाहा ने चौरी चौरा पर 'चौरी-चौरा: विद्रोह, स्वाधीनता आंदोलन' नाम की पुस्तक लिखी है जो वर्ष 2014 में प्रकाशित हुई थी।


आंदोलनकारियों पर कार्यवाई :

चौरी चौरा कांड के बाद पुलिस ने 228 लोगों के ख़िलाफ़ गोरखपुर के सेशन कोर्ट में आरोप पत्र दाख़िल किया था, जिनमें से दो लोगो की जेल में ही मौत हो गई थी और एक व्यक्ति सरकारी गवाह बन गया, 225 लोगों पर मुक़दमा चला।

सेशन कोर्ट जज एचई होत्म्स ने 9 जनवरी, 1923 को 172 लोगों को फ़ांसी की सज़ा सुनाई थी जिसके ख़िलाफ़ इलाहाबाद हाई कोर्ट में अपील की गई। हाई कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश एडवर्ड ग्रीमवुड मीयर्स और सर थियोडोर पिगॉट की बेंच ने इस मामले में 30 अप्रैल 1923 को फ़ैसला दिया, जिसमे 14 लोगों को उम्रक़ैद और 19 को फ़ांसी की सज़ा सुनाई थी।


महात्मा गांधी की प्रतिक्रिया:

गांधीजी ने पुलिसकर्मियों की हत्या की निंदा की और आस-पास के गाँवों में स्वयंसेवक समूहों को भंग कर दिया तथा सहानुभूति जताने के लिये एक ‘चौरी चौरा सहायता कोष’ स्थापना की।

गांधीजी ने 12 फरवरी, 1922 को यह आंदोलन औपचारिक रूप से वापस ले लिया। 16 फरवरी, 1922 को गांधीजी ने अपने लेख 'चौरी चौरा का अपराध' में लिखा कि अगर ये आंदोलन वापस नहीं लिया जाता तो दूसरी जगहों पर भी ऐसी घटनाएँ होतीं।


महात्मा गांधी जी पर कार्यवाई :

10 मार्च, 1922 को गांधी जी को अंग्रेजो ने देशद्रोह के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया। 18 मार्च, 1922 को ही उन्हें 6 वर्ष के कारावास की सजा सुनाई गई थी। गांधी जी की तबियत खराब रहने लगी और उन्हें गांधी जी को फरवरी, 1924 को रिहा कर दिया गया।


स्मारक :

वर्ष 1971 में गोरखपुर ज़िले के लोगों ने चौरी-चौरा शहीद स्मारक समिति का गठन किया। इस समिति ने 1973 में चौरी-चौरा में 12.2 मीटर ऊंचा एक मीनार बनाई। चौरी-चौरा की घटना की याद में वर्ष 1993 में स्मारक तैयार हुआ था, जिसका सौंदर्यीकरण करवाए जाने के बाद साल 2021 जनवरी में लोकार्पण हुआ है।


स्मरण :

साल 2021 को चौरी-चौरा घटना के शताब्दी वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है।


मिलेट मिशन – Millet Mission


मिलेट मिशन की शुरुआत छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के द्वारा 10 सितंबर, 2021 को की गई। मिशन के तहत छत्तीसगढ़ में किसानों को लघु धान्य फसलों की सही कीमत दिलाने, आदान (exchange) सहायता देने, खरीदी की व्यवस्था, प्रोसेसिंग और विशेषज्ञों के परामर्श का लाभ दिलाने की पहल की जाएगी।

वर्ष 2023 को इंटरनेशनल ईयर ऑफ मिलेट के रूप में मनाया जाएगा और मिलेट मिशन के जरिये साल 2023 तक छत्तीसगढ़ देश में मिलेट हब के रूप में पहचान बनाने में सफल होगा।


मिलेट / millet क्या है ?

छोटे अनाज को मिलेट कहा जाता है। इन फसलों को सूखे क्षेत्रों, वर्षा आधारित क्षेत्रों, तटीय क्षेत्रों, या पहाड़ी क्षेत्रों में आसानी से उगाया जा सकता हैं।


मिलेटस की मुख्‍य किस्‍में इस प्रकार हैं-  

  1. ज्‍वार  (Sorghum)
  2. बाजरा (Pearl millet)
  3. रागी (Finger millet)
  4. झंगोरा (Barnyard millet)
  5. बैरी (Proso / Common millet)
  6. कंगनी ( Foxtail / Italian millet)
  7. कुटकी (Little millet)  
  8. कोदो Kodo (Kodo millet)
  9. चेना (Proso millet)


इस मिशन के अंर्तगत कोदो, कुटकी एवं रागी की उत्पादकता बढ़ाने के लिए इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ मिलेट रिसर्च हैदराबाद और राज्य के 14 जिलों के साथ आज एमओयू किया गया।


नोट : छत्तीसगढ़ के 20 जिलों में कोदो-कुटकी, रागी का उत्पादन होता है। प्रथम चरण में इनमें से 14 जिलों के साथ ये एमओयू किया गया है।


14 जिलों के नाम :

कांकेर, कोण्डागांव, बस्तर, दंतेवाड़ा, बीजापुर, सुकमा, नारायणपुर, राजनांदगांव, कवर्धा, गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही, बलरामपुर, कोरिया, सूरजपुर और जशपुर।



राजबेड़ा नारायणपुर – Rajbeda Narayanpur



छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले में स्थित एक धार्मिक स्थल है। राजबेड़ा में भगवान गणेश एवं मां दुर्गा की एक प्राचीन प्रतिमा स्थित है, जो ग्रामीणों के आस्था का केंद्र है। यह जिले के दो ग्राम पंचायत छिनारी और तोयनार के पास स्थित है। 


मान्यता :

ग्रामीणों की मान्यता है की यह प्रतिमाएं यहां करीब 100 वर्ष पूर्व प्रगट हुई थी, जिसे ग्रामीणों ने यात्रा के दौरान देखा।

पोरुनई पुरातात्विक खुदाई Archaeological Excavations (Thamirabarani civilisation )


थामीरापारानी / पोरुनाई सभ्यता (Thamirabarani / Porunai civilisation) भारत के तमिलनाडु राज्य के थामीरापारानी नदी के किनारे 'पोरुनई' पुरातात्विक खुदाई (Archaeological Excavations) में मिले है। यहां 3,200 वर्षों से अधिक पुराने उन्नत मानव सभ्यता के वैज्ञानिक प्रमाण प्राप्त हुआ है।


रेडियो कार्बन डेटिंग :

मियामी स्थित बीटा विश्लेषणात्मक परीक्षण प्रयोगशाला द्वारा यहां से प्राप्त कलश में पाए गए चावल के दानों और भूसी की कार्बन डेटिंग जांच से पता चला है कि वे 1155 ईसा पूर्व के हैं। बीटा विश्लेषणात्मक परीक्षण प्रयोगशाला ने यह रिपोर्ट 27 अगस्त, 2021 को जारी किया।


अन्य स्थल :

तूतीकोरिन जिले में अधिचनल्लूर और कोरकाई से खुदाई में विशेषज्ञों द्वारा पुष्टि की गई है कि वे क्रमशः 9वीं शताब्दी ईसा पूर्व और 8 ईसा पूर्व के हैं, जो वहां एक परिपक्व सभ्यता की पुष्टि करते हैं। जिसे थामीरापारानी के नाम से जाना जाता है।


Source : NDTV