यू तिरोत सिंग (U Tirot Sing) - स्वतंत्रता संग्राम सेनानी

यू तिरोत सिंग (U Tirot Sing) एक भारतीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। इनका जन्म वर्ष 1802 में वर्तमान मेघालय के मैरंग में हुआ था। वे खासी पहाड़ियों के हिस्से नोंगखलाव के Syiem (प्रमुख) थे। उसका उपनाम सिम्लिह (Syiemlieh) था।


अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध :

खासी पहाड़ियों पर कब्जा कारने के लिए इन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध किया। अंग्रेजो के साथ हुए इस संघर्ष को आंग्ल-खासी युद्ध कहा जाता है।

खासियों ने 4 अप्रैल 1829 को नोंगखलाव में ब्रिटिश गैरीसन पर हमला किया। उसके लोगो ने दो ब्रिटिश अधिकारियों को मार डाला, जिसके बाद ब्रिटिश ने यू तिरोत सिंग और अन्य खासी प्रमुखों के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू कर दिया।

खासियों के पास आधुनिक हथियारों की कमी थी और उनके पास केवल तलवारें, ढालें, धनुष और बाण थे। वे ब्रिटिश प्रकार के युद्ध में अप्रशिक्षित थे, इसलिए, उन्होंने गुरिल्ला युद्ध नीति का सहारा लिया, जिस वजह से यह संघर्ष लगभग चार वर्षों तक चला।


मृत्यु :

यू तिरोत सिंग को जनवरी 1833 में अंग्रेजों ने पकड़ लिया और ढाका भेज दिया गया। 17 जुलाई, 1835 को उनका निधन ढाका में हो गया। उनकी पुण्यतिथि को मेघालय में राजकीय अवकाश के रूप में मनाया जाता है।



IPC की धारा 124 (ए) को समझते है।


भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 124ए में राजद्रोह की सजा का प्रावधान किया गया है। इस धारा को वर्ष 1860 में जेम्स फिट्जजेम्स स्टीफन (James Fitzjames Stephen) की सिफारिश पर अधिनियमित किया गया था। धारा 124ए के मुताबिक राजद्रोह एक गैर-जमानती अपराध है। इस वजह से इस धारा का इस्तेमाल तत्कालीन अंग्रेज शासन ने भारत में अपने विरोध को किया। इसके इस्तेमाल से महात्मा गांधी जैसे अनेकों क्रन्तिकारियों को जेलों में डाला गया। 


वर्ष 1947 के बाद भारत अंग्रेजो से आजाद तो हो गया, परंतु अंग्रेजो के बनाये राष्ट्रद्रोह के कानून से मोह को नहीं छोड़ पाया और यह लगातार बना रहा। वहीं, इस कानून को बनाने वाले ब्रिटेन ने वर्ष 2010 में ही अपने देश में राष्ट्रद्रोह कानून को समाप्त कर दिया।


भारत में IPC की धारा 124 की व्यवहारिकता इस लिए भी कम हो जाती है, क्यो की, भारत में वर्ष 1967 में ही UAPA Act. लागू किया जा चुका है, इसका उद्देश्य भारत की अखंडता और संप्रभुता के खिलाफ गतिविधियों से निपटने के लिए शक्तियां उपलब्ध करना है।


सर्वोच्च न्यायालय ने रोक लगाया :

11 मई, 2022 को सर्वोच्च न्यायालय एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए राष्ट्रद्रोह कानून की धारा 124 ए पर रोक लगा दी।



छत्तीसगढ़ी भाषा (Chhattisgarhi Language) से संबंधित 10 रोचक तथ्य


छत्तीसगढ़ी (Chhattisgarhi) एक इंडो-आर्यन भाषा है, जो छत्तीसगढ़, ओडिशा, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में बोली जाती है। यह हिंदी और अंग्रेजी के साथ छत्तीसगढ़ में एक आधिकारिक भाषा है। भारतीय राष्ट्रीय जनगणना द्वारा इसकी बोली के रूप में गिना जाता है। 


छत्तीसगढ़ी भाषा से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य :

  • 28 नवम्बर को छत्तीसगढ़ में "छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस" मनाया जाता है।
  • छत्तीसगढ़ी भाषा को क्षेत्रो के हिसाब से 5 भागो में बांटा गया है। केंद्रीय, पूर्वी, उत्तरी और दक्षिणी छत्तीसगढ़ी।
  • वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार लगभग 1.6 करोड़ लोग छत्तीसगढ़ी भाषा बोलते है।
  • वर्ष 1885 में प्रथम छत्तीसगढ़ी व्याकरण की रचना हीरालाल काव्योपाध्याय द्वारा की गई थी।
  • छत्तीसगढ़ी भाषा में स्त्रीलिंग - पुल्लिंग का अंतर केवल संज्ञा में देखने को मिलता है। जैसे नोनी और बाबू। क्रिया की बात करें तो स्त्रीलिंग-पुल्लिंग का कोई भेद नहीं होता है। जैसे हिंदी में "मैं खाना खा चुका हूं" को छत्तीसगढ़ी को एक लड़का भी 'मैं खा डरेंव' बोलेगा और लड़की भी। हिंदी की तरह चुका हूं/ चुकी हूं अलग से बोलने की जरूरत नहीं है।
  • छत्तीसगढ़ी भाषा में श, ष, त्र , ज्ञ, क्ष, ऋ अक्षरों का प्रयोग नहीं होता है। 

अन्य महत्वपूर्ण लेख :


Karman Line धरती और अंतरिक्ष की सीमा रेखा


जिस प्रकार से प्रत्येक देश की जल एवं थल सीमा रेखा होती, जो उसे अन्य देशो से अलग रखती है, ऐसे ही पृथ्वी और अन्तरिक्ष के मध्य भी एक आभाषी रेखा है जो धरती को अंतरिक्ष से अलग रखती है। इस रेखा के पार जाने पर ही हम कह सकते है कि कोई वस्तु अंतरिक्ष में पहुंच गयी। इस रेखा को Karman Line (कारमन रेखा) कहते है।

कर्मन रेखा की तुलना हम अंतर्राष्ट्रीय जल रेखा से कर सकते है, क्योंकि इस रेखा से परे कोई राष्ट्रीय सीमाएँ और मानव कानून लागू नहीं होते हैं। इस स्तर से ऊपर स्वतंत्र अंतरिक्ष होता है।


नाम कैसे पड़ा ?

इस रेखा का नाम हंगरी-अमेरिकी वैज्ञानिक थियोडोर वॉन कारमन (Theodore Von Kamran) के नाम पर दिया गया था। इन्होंने वर्ष 1957 में पृथ्वी और अंतरिक्ष के मध्य की सीमा रेखा को परिभाषित किया था। 


यह कितनी ऊंचाई ( Height ) पर है ?

कार्मन रेखा की सबसे व्यापक रूप से स्वीकृत ऊंचाई समुद्र तल से 100 किमी ऊपर है। लेकिन संयुक्त राज्य अमेरिका इस ऊंचाई को 80 किलोमीटर (मीजोस्फीयर - 50 - 80 किलोमीटर, और थर्मोस्फीयर - 80 किलोमीटर से ऊपर मानता है।




ज्ञानवापी मस्जिद संबंधित 10 तथ्य : Gyanvapi Mosque 10 Facts


ज्ञानवापी मस्जिद बनारस, उत्तर प्रदेश में स्थित है। इस मस्जिद से संबंधित अनेक एतिहासिक और पौराणिक साक्ष्य उपलब्ध है। इन्ही साक्ष्यों के आधार पर इससे संबंधित कुछ महत्वपूर्ण तथ्य निम्न है :


  1. विश्वनाथ मंदिर के निर्माण अकबर के नौरत्नों में से एक राजा टोडरमल ने वर्ष 1585 में दक्षिण भारत के विद्वान नारायण भट्ट की मदद से कराया था।
  2. इसका निर्माण विश्वनाथ मंदिर की जगह पर किया गया था जिसे औरंगजेब ने 1669 में ध्वस्त कर दिया था। मंदिर ध्‍वस्‍त किए जाने से पहले ज्ञानवापी परिसर और ज्ञानवापी कूप विश्वनाथ मंदिर का हिस्‍सा था। 
  3. मुगल शासक औरंगजेब के आदेश से मंदिर पर आक्रमण के बाद मंदिर के अर्चक स्वयंभू शिवलिंग को लेकर ज्ञानवापी कूप में कूदे गए थे।
  4. ज्ञानवापी कूप के नाम पर ही मस्जिद का नाम ज्ञानवापी पड़ा है।
  5. ज्ञानवापी मस्जिद का पहला ज़िक्र वर्ष 1883-84 के राजस्व दस्तावेजो में मिलता है। दस्तावेज़ों में जामा मस्जिद ज्ञानवापी के तौर पर दर्ज किया गया।
  6. विश्वनाथ मंदिर का वर्णन मत्स्य पुराण और स्कंदपुराण के काशी खंड में मिलता है। इसमें अविमुक्तेश्वर, विश्वेश्वर और ज्ञानवापी का उल्लेख है। पुराणों में ज्ञानवापी कूप विश्वेश्वर (विश्वनाथ) को एक अभिन्न अंश माना गया है जो काशी का केन्द्र माना गया है।




धनपुर / धनपुरी - Dhampur


धनपुर एक पुरातात्विक और एतिहासिक स्थल है। यह छत्तीसगढ़ में गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले में पेण्ड्रा- सिवनी मार्ग में लगभग 23 किमी दूरी पर स्थित है। 


दर्शनीय स्थल :

यहां मां आदिशक्ति मां दुर्गा का मंदिर स्थापित है जो स्थानीय लोगो के लिए आस्था का केंद्र है। मान्यता है कि, इस स्थान में पाण्डव यहां अज्ञातवास के दौरान यहां रूके थे। इस स्थान पर प्राचीन कलाकृति लोगो का आकर्षण का केन्द्र है। मुख्य रूप से बेनीबाई की प्रतिमा एवं अन्य प्राचीन मूर्तियां।


बेनीदाई/बेनीबाई :

यह विशाल चट्टान पर उकेरी गई संरचना है जो वास्तव में यह जैन धर्म से संबंधित संरचना है। किन्तु स्थानीय रूप से इसे बेनी बाई के रूप में पूजा जाता है।


बौद्ध धर्म और छत्तीसगढ़ Buddhism and Chhattisgarh

ऐतिहासिक दृष्टि से छत्तीसगढ़ में बौद्ध धर्म का अच्छा प्रभाव रहा है। छत्तीसगढ़ मेँ बौद्ध धर्म से संबंधित जानकारी क्षेत्रीय राजवंशो के द्वारा बौद्ध धर्म को संरक्षण प्रदान करने और स्थापत्य व प्रतिमाओ के रूप मे पुरातात्विक साक्ष्य प्राप्त हुये है। बौद्ध ग्रंध अवदानशतक में भी वर्णन है कि बौद्ध धर्म के सस्थापक गौतम बुद्ध अपने दक्षिण कोसल के यात्रा वृतांत मे सिरपुर आए थे। 


1. बोद्ध भिक्षुक नागार्जुन

पहली शताब्दी मेँ बोद्ध भिक्षुक नागार्जुन का सातवाहन शासकों के काल मेँ सिरपुर आगमन हुआ था। सातवाहन शासकों द्वारा नागार्जुन के विश्राम हेतु सिरपुर मेँ पाँच मंज़िला संघाराम (महल) का निर्माण करवाया था।


2. बोद्ध भिक्षुक आनंद एवं स्वास्तिक विहार

गौतम बुद्ध के शिष्य आनंद प्रभु से संबंधित यह स्थल सिरपुर में स्थित है। इसका निर्माण छत्तीसगढ़ में पांडु वंश के शासक बालार्जुन के शासन काल में किया गया था। आनंद प्रभु कुटी विहार बौद्ध भिक्षुओं का निवास स्थान था और लगभग 7वीं-8वीं शताब्दी में निर्मित यह स्थल 'आनंद प्रभु' नामक बौद्ध भिक्षु से संबंधित पूजा का स्थान था। यहाँ मुख्य कक्ष में भगवान बुद्ध की एक बड़ी प्रतिमा स्थापित है।


स्वस्तिम विहार :

यह स्थल "आनंद प्रभु" से करीब 400 मीटर की दूरी पर स्थित है। यह आनंद प्रभु कुटी विहार के समकालीन है। इस स्थल की आकृति स्वास्तिक के समान होने के कारण इसे स्वास्तिक विहार नाम पड़ा। मुख्य कक्ष में भगवान बुद्ध की एक बड़ी प्रतिमा स्थापित है। 


3. व्हेनसांग ( युवान चांगस )

प्रसिद्ध चीनी यात्री व्हेनसांग बौद्ध धर्म से प्रभावित होकर  पांडुवंशी शासक महाशिवगुप्त बालार्जुन के शासनकाल में 639 ई. में छत्तीसगढ़ आए थे।

व्हेनसांग ने सिरपुर यात्रा वृतांत का वर्णन सी यू की नामक पुस्तक में छत्तीसगढ़ का उल्लेख किया स लो के नाम से किया है। व्हेनसांग ने सिरपुर और मल्हार की यात्रा की थी। 

सी.यु.की. में उल्लेख मिलता है की भगवान बुद्ध 3 माह तक दक्षिण कोसल में रुके थे। 


4. पुरातात्विक खोज

वर्ष 2015 में छत्तीसगढ़ के बलौदाबाजार से 14 किलोमीटर दूर डमरू (Damrooo) गांव में चल रही पुरातात्विक खुदाई के दौरान भगवान बुद्ध के पैरों के चिह्न मिले हैं। पुरातत्ववेत्ताओं का अनुमान है कि बलौदाबाजार जिले का डमरू गांव पांचवीं सदी में ' हीनयान समुदाय' का प्रमुख केंद्र रहा होगा।

वर्ष 2017 में छत्तीसगढ़ में बस्तर जिले से करीब 70 किलोमीटर दूर भोंगापाल में खुदाई के दौरान छठी शताब्दी की बुद्ध प्रतिमा प्राप्त हुई।




CM Mitan Yojana - मुख्यमंत्री मितान योजना ( Chhattisgarh )

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस के अवसर पर 1 मई को वर्चुअल समारोह के जरिये  "मुख्यमंत्री मितान योजना (CM Mitan Yojana)" का शुभारंभ किया।


मुख्यमंत्री मितान योजना का उद्देश्य राज्य के नागरिकों को 13 प्रकार की सुविधाएं घर बैठे उपलब्ध कराना है। इन सुविधाओं में मूल निवास प्रमाण पत्र, जाति प्रमाणपत्र, आय प्रमाण पत्र, दस्तावेज़ के नकल के लिए अनुरोध, गैर-डिजिटाइज्ड, जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र, विवाह पंजीकरण और प्रमाणपत्र, दुकान पंजीकरण, भूमि की जानकारी, जन्म प्रमाणपत्र सुधार, मृत्यु प्रमाणपत्र सुधार, विवाह प्रमाणपत्र सुधार आदि नागरिक सेवाएं है।


प्रथम चरण में यह योजना प्रदेश के सभी 14 नगर निगमों में लागू की गई है। इस योजना के अंतर्गत सम्पर्क के लिए टोल फ्री नम्बर 14545 भी जारी किया गया है।

खैरागढ़-छुईखदान-गंडई जिला : Khairagarh Chhikhadan Gandai


खैरागढ़-छुईखदान-गंडई छत्तीसगढ़ का 33 वां जिला है, जिसकी घोषणा 16 अप्रैल, 2022 को खैरागढ़ उपचुनाव में मिली जीत के बाद सीएम भूपेश बघेल ने की। 18 अप्रैल 2022 को छत्तीसगढ़ के राज्यपाल की ओर से अधिसूचना का प्रकाशन किया गया।


मातृ जिला :

राजनांदगांव जिले से अलग करके खैरागढ़, गंडई और छुईखदान को मिलाकर नए जिले खैरागढ़-छुईखदान-गंडई की घोषणा की गई।


जिले की स्थिति :

जिला के उत्तर में कबीरधाम जिला, दक्षिण में राजनांदगांव की डोंगरगढ़ तहसील, पूर्व में बेमेतरा जिले की साजा और दुर्ग जिले की धमधा तहसील, पश्चिम में बालाघाट जिला (मध्यप्रदेश) है।





HTTP कुकीज या वेब कुकीज क्या होता है ? What is HTTP cookies, web cookies in Hindi


HTTP कुकीज (HTTP cookies, web cookies, Internet cookies, browser cookies ) एक वेब सर्वर द्वारा बनाए गए डेटा के छोटे ब्लॉक होते हैं, यह उपयोगकर्ता के कंप्यूटर या अन्य डिवाइस पर उपयोगकर्ता के वेब ब्राउज़र द्वारा रखा जाता है। कुकीज़ को वेबसाइट तक पहुँचने के लिए उपयोग किए जाने वाले उपकरण पर रखा जाता है। कुकीज का उपयोग बाद में उपयोग की जाने वाली जानकारी जैसे कि उपयोगकर्ता ने पहले फॉर्म फ़ील्ड में दर्ज किया था, जैसे नाम, पते, पासवर्ड और भुगतान कार्ड नंबर आदि सहेजने के लिए भी किया जा सकता है।


कुकीज का इस्तेमाल

1. प्रमाणीकरण (Authentication):

कुकीज़ का उपयोग आमतौर पर वेब सर्वर द्वारा यह प्रमाणित करने के लिए किया जाता है कि उपयोगकर्ता लॉग इन है और वे किस खाते से लॉग इन हैं।


2. नजर रखने के लिए ( Tracking Cookies)

ट्रैकिंग कुकीज़ इस्तेमाल उपयोकर्ता के ब्राउज़िंग इतिहास के दीर्घकालिक रिकॉर्ड को संकलित करने के तरीकों के रूप में उपयोग की जाती हैं।


इतिहास ( History )

वर्ष 1994 में जॉन जियानन्ड्रिया और मोंटुली ने साथ में प्रारंभिक नेटस्केप कुकी विनिर्देश लिखा और 13 अक्टूबर 1994 को जारी मोज़ेक नेटस्केप का संस्करण 0.9 बीटा, के साथ इसे जारी किया। कुकीज़ का प्रारंभिक उपयोग यह जांच कर रहा था कि क्या नेटस्केप वेबसाइट में आने वाले उपयोकर्ता पहले ही साइट पर आ चुके हैं या नहीं। मोंटुली ने वर्ष 1995 में कुकी प्रौद्योगिकी ( Cookie technology) के लिए एक पेटेंट के लिए आवेदन किया था, और इसे 1998 में प्रदान किया गया था।