एशियाई विकास बैंक (एडीबी) - ADB

यह एक क्षेत्रीय विकास बैंक है जिसकी स्थापना 19 दिसम्बर 1966 को 31 सदस्यों के साथ एशियाई देशों के आर्थिक विकास के सुगमीकरण के लिए की गयी थी। वर्तमान में एडीबी के पास 67 सदस्य हैं - जिसमे से 48 एशिया और पैसिफिक से हैं और 19 सदस्य बाहरी हैं।

यह बैंक यूऍन (UN) इकोनॉमिक कमीशन फॉर एशिया एंड फार ईस्ट (अब यूएनईएससीएपी- UNESCAP) और गैर क्षेत्रीय विकसित देशों के सदस्यों को सम्मिलित करता है।

एडीबी (ADB) का प्रारूप काफी हद तक वर्ल्ड बैंक के आधार पर बनाया गया था और वर्ल्ड बैंक (विश्व बैंक) के समान यहां भी वोट प्रणाली की व्यवस्था है जिसमे वोटों का वितरण सदस्यों के पूंजी अभिदान अनुपात के आधार पर किया जाता है।

शेयर
वर्तमान में, संयुक्त राज्य अमेरिका और जापान दोनों के ही पास 552,210 शेयर हैं - इन दोनों के पास शेयरों का सबसे बड़ा हिस्सा है जो कुल का 12.756 प्रतिशत है।

पक्षियों के नाम - छत्तीसगढ़ी शब्दावली

छत्तीसगढ़ी भाषा में पशु एवं पक्षियों के नाम दिए गए है। ये नाम परीक्षाओं के लिए भी उपयोगी हो सकते है। इस सूची में और नामो को हम समय-समय जोड़ते रहते है। यदि आप को उपयोगी लगे तो अपने दोस्तों के साथ जरूर शेयर करें।

हिंदी - छत्तीसगढ़ी
पक्षी - चिराई
उल्लू - घुघुवा
कौवा - कंउवा
मयूर - मंजूर
मुर्गा - कुकरा
मुर्गी - कूकरी
चूजा - चिंया
कबूतर - परेवा
गौरेया - गुड़ेड़ीया/ गौरेला / ब्राम्हण चिराई
बत्तक - बदख
बगुला - कोकड़ा
गिध्द - गिधवा
बाज - छचान/ रवना
तोता - सुवा/मिठ्ठू
चकवा - चकहा/ गोना
चमगादड़ - चंगेदरी/ गदराइल
नीलकंठ - टेहा
मैना - सलहई
तीतर - तीतुर


त्रिभाषा फॉर्मूला क्या है ?

वर्ष 1947 में भारत की आज़ादी के बाद प्रतिस्पर्धा परीक्षाओं या सिविल सेवा के परीक्षाओं में हिंदी को अहमियत देने का गैर-हिंदी भाषायी राज्यों में विरोध हुआ।
इस विरोध की वजह से तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने वर्ष 1956 में मुख्यमंत्रियों की एक बैठक बुलाई जिसमें त्रिभाषा फॉर्मूले पर सबकी रज़ामंदी ली गई।

त्रिभाषा फॉर्मूले / त्रिभाषा सूत्र को तैयार करने की शुरूआत 1960 के दशक में हुई और ये राष्ट्रीय शिक्षा नीति का हिस्सा है। इसका ज़िक्र कोठारी कमीशन की रिपोर्ट में भी है जो 1966 में बनकर तैयार हुई थी। वर्ष 1968 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इसका समर्थन किया गया था और वर्ष 1968 में ही पुन: अनुमोदित कर दिया गया था। वर्ष 1992 में संसद ने इसके कार्यान्वयन की संस्तुति कर दी थी।

त्रिभाषा
1-शास्त्रीय भाषाएं जैसे संस्कृत, अरबी, फारसी।
2-राष्ट्रीय भाषाएं
3-आधुनिक यूरोपीय भाषाएं 
इन तीनों श्रेणियों में किन्हीं तीन भाषाओं को पढ़ाने का प्रस्ताव है। इसके अलावा, हिन्दी भाषी राज्यों में दक्षिण की कोई भाषा पढ़ाई जानी चाहिए।

त्रिभाषा फॉर्मूला क्या है ?
इस फॉर्मूले के तहत स्कूलों में तीन भाषाओं की शिक्षा दी जानी थी। हिंदी भाषी राज्यों में छात्रों को जो तीन भाषाएं पढ़ाई जानी थीं वो थीं - हिंदी, अंग्रेज़ी और एक आधुनिक भारतीय भाषा (बांगला, तमिल, तेलुगू, कन्नड़, असमिय़ा, मराठी और पंजाबी और अन्य)। ग़ैर हिंदी भाषी राज्यों में मातृभाषा के अलावा, हिंदी और अंग्रेज़ी पढ़ाई जानी थी।

राजनांदगांव जिला - Rajnandgaon Jila

जिला राजनांदगांव 26 जनवरी 1973 को तात्कालिक दुर्ग जिले से अलग हो कर अस्तित्व में आया। रियासत काल में राजनांदगांव एक राज्य के रूप में विकसित था एवं यहाँ पर सोमवंशी, कलचुरी एवं मराठाओं का शासन रहा. पूर्व में यह नंदग्राम के नाम से जाना जाता था। यहाँ की रियासत कालीन महल, हवेली राज मंदिर इत्यादि स्वयं इस जगह की गौरवशाली समाज, संस्कृति, परंपरा एवं राजाओं की कहानी कहता है. साहित्य के क्षेत्र में श्री गजनानद माधव मुक्तिबोध, श्री पदुमलाल पुन्नालाल बक्षी एवं श्री बल्देव प्रसाद मिश्रा का योगदान विशिष्ठ रहा है।

जिले का पुनर्गठन
1948 में, रियासत राज्य और राजधानी शहर राजनांदगांव मध्य भारत के बाद में मध्य प्रदेश के दुर्ग जिले में विलय कर दिया गया था। 1973 में, राजनांदगांव को दुर्ग जिले से बाहर निकाला गया और नया राजनांदगांव जिला बनाया गया था। राजनांदगांव जिले का प्रशासनिक मुख्यालय बन गया। 1 जुलाई 1998 को इस जिले के कुछ हिस्से को अलग कर एक नया जिला कबीरधाम की स्थापना हुई। जिला राजनांदगांव छत्तीसगढ़ राज्य के मध्य भाग में स्थित है। जिला मुख्यालय राजनांदगांव दक्षिण-पूर्व रेलवे मार्ग स्थित है। राष्ट्रीय राज़ मार्ग 6 राजनांदगांव शहर से हो कर गुजरता है। नजदीकी हवाई अड्डा माना (रायपुर) यहाँ से करीब 80 किलोमीटर की दुरी पर है।

पर्यटन

खारा रिजर्व वन :
यह एक संरक्षित वन (जिसे आरक्षित वन भी कहा जाता है) है।

शिव मन्दिर - गंडई (टिकरी पारा) :
यह शिव मंदिर भूमिज में पूर्वाभिमुखी निर्मित है। यह मंदिर स्थापत्य कला की दृष्टि से उच्चकोटि का है। इस मंदिर का निर्माण 13-14 वीं शताब्दी में किया गया था।


शिव मंदिर - (नव उत्खनित) घटियारी :
स्थापत्य कला की दृष्टि से मात्र-अधिष्ठान तथा गर्भगृह शेष है । इस मंदिर का निर्माण 11-12 वीं शताब्दी में किया गया था ।

नर्मदा कुंड - नर्मदा 
यह प्राकृतिक जल स्त्रोत (जल कुंड) है । मराठा कालीन पंचायतन शैली का मंदिर है ।

बम्लेश्वरी मंदिर - डोंगरगढ़
पहाड़ी में स्थित बगुलामुखी (बम्लेश्वरी) मंदिर है । शारदीय एवं वासंतीय नवरात्री में भव्य मेला आयोजित किया जाता है ।

मण्दीप खोल - ठाकुरटोला
यहां प्राकृतिक गुफा एवं पानी का स्त्रोत है ।

छत्तीसगढ़ की बोलियाँ एवं वर्गीकरण


छत्तीसगढ़ राज्य एक जनजाति (आदिवासी) बहुल क्षेत्र है। छत्तीसगढ़ राज्य में 93 के करीब बोलियों का प्रचलन है। राज्य में छत्तीसगढ़ी बोली का प्रयोग सर्वाधिक किया जाता है, इसके बाद हल्बी बोली का प्रयोग होता है। 

छत्तीसगढ़ की बोलियों की उनके भाषा परिवार के आधार पर तीन भागों में, आर्य, मुण्डा और द्रविड़ में बांटा गया है।

मुण्डा भाषा परिवार :
हो, तुरी, गदबा, खड़िया, कोरवा, विदहो, नगेसिया, मझवार, खैरवारी, कोरकू, मांझी, निहाल, पण्डो(पंर्डो),बिरहोर, सौता।
द्रविड़ भाषा परिवार :
दोरला, दंडामी, भुंजिया, अबुझमाड़िया, धुरवी/धुरवाकुडुख, ओराव(उराव), पर्ज़ी ( परजी/परजा ), गोंड़ी, मुड़िया।
आर्य भाषा परिवार :
मागधी, उड़िया, भतरी, हल्बी, सदरी।

छत्तीसगढ़ी का वर्गीकरण
छत्तीसगढ़ में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा छत्तीसगढ़ी के अनेक क्षेत्रीय स्वरूप प्रचलित हो गए है।

केंद्रीय छत्तीसगढ़ी : 
यह बोली मानक हिंदी भाषा से प्रभावित है। क्यो की इस पर स्थानीय बोलियों का प्रभाव कम पड़ा है। इसे कुल 18 नामो से भी जाना जाता है। इस समूह में छत्तीसगढ़ी को सर्वोपरी माना जाता है।
कवरधाई, कांकेरी, खैरागढ़ी, बिलसपुरी, रतनपुरी, रायपुरी, धमतरी, पारधी, बहेलिया, बैगनी तथा सतनामी।

पश्चिमी छत्तीसगढ़ी : 
छत्तीसगढ़ी के इस प्रकार में बुंदेली तथा मराठी का प्रभाव दिखता है। इस समूह में खल्टाही सर्वप्रमुख है।
कमरी, खल्टाही, मरारी, पनकी।

उत्तरी छत्तीसगढ़ी : 
इस समूह में बघेली, भोजपुरी, कुडुख का प्रभाव दिखता है। इसमें सरगुजिया प्रमुख है।
पण्डो, नगेशिया, सादरी, कोरवा, जशपुरी, सरगुजिया।

पूर्वी छत्तीसगढ़ी : 
इस समूह में उड़िया भाषा का प्रभाव है। इसमें लारिया प्रमुख है।
कलिंजर, कलंगा, बिंझवार, लारिया, चर्मशिल्पी।

दक्षिणी छत्तीसगढ़ी : 
इस समूह में मराठी, उड़िया, गोंड़ी का प्रभाव है। इसमें प्रमुख हल्बी है।
जोगी, बस्तरी, अदकुरी, चंदारी, धाकड़, मगरी, मिरगानी, हल्बी।

मजदूर दिवस का इतिहास - History Of Labour's Day

मजदूर दिवस का इतिहास
1. अंतरराष्‍ट्रीय स्तर पर मजदूर दिवस मनाने की शुरुआत 1 मई, 1886 को हुई थी।
2. अमेरिका के मजदूर संघों ने मिलकर तय किया कि वे 8 घंटे से ज्‍यादा काम नहीं करेंगे। इस मांग के लिए संगठनों ने हड़ताल की।
3. हड़ताल के दौरान शिकागो की हेमार्केट में बम ब्लास्ट हुआ जिससे निपटने के लिए पुलिस ने मजदूरों पर गोली चलाई। इस घटना में कई मजदूरों की मौत हो गई और कई लोग घायल हो गए।
4. इसके बाद 1889 में अंतरराष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन में ऐलान किया गया कि हेमार्केट नरसंहार में मारे गए निर्दोष लोगों की याद में 1 मई को अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस के रूप में मनाया जाएगा। साथ ही इस दिन सभी श्रमिकों की छुट्टी रहेगी।

भारत में :
5. भारत में मजदूर दिवस की शुरुआत लेबर किसान पार्टी ऑफ हिंदुस्‍तान ने 1 मई 1923 को चेन्ने में की थी। उस समय इसे मद्रास दिवस के रूप में मनाया जाता था।
6. संयुक्त राष्ट्र के अंतर्गत आने वाली अंतरराष्ट्रीय मजदूर संस्था दुनियाभर में लेबर क्लास के लोगों का जीवन स्तर सुधारने की दिशा में काम करती है।
7. 1 मई के द‍िन यह संस्था दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में रैली और मार्च निकालती है ताकि मजदूर उत्पीड़न, न्यूनतम मजदूरी कानून और प्रवासी मजदूरों को लेकर जागरुकता फैलाई जा सके।

बारसूर (Barsoor) - दंतेवाड़ा

बारसूर, छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में स्थित एक गांव है। जो जिला मुख्यालय से 34 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। बारसूर नाग राजाओं एवं काकतीय शासकों की राजधानी रहा है।

बारसूर को तालाबो एवं मंदिरो का शहर कहा जाता है। बारसूर में 11वी एवं 12वीं शताब्दी में 147 मंदिर एवं तालाब थे।

>> छिंदक नागवंश का इतिहास।

यहाँ प्रसिद्ध मंदिरों में मामा-भांजा मंदिर ( मूलतः शिव मंदिर ), चंद्रादित्य, गणेश मंदिर, बत्तीसा/बत्तीसी मंदिर है। यहां के मंदिरों का निर्माण धारावर्ष के काल मे उनके सामन्त चन्द्रादित्य ने कराया था।

मंदिरो का विवरण
मामा-भंजा मंदिर दो गर्भगृह युक्त मंदिर है इनके मंडप आपस में जुड़े हुये हैं।यहाँ के भग्न मंदिरों में मैथुनरत प्रतिमाओं का अंकन भी मिलता है। इतिहासकार एवं विख्यात शिक्षाविद डॉ.के.के.झा के अनुसार यह नगर प्राचीन काल में वेवष्वत पुर के नाम से जाना जाता था।

चन्द्रादित्य मंदिर का निर्माण नाग राजा चन्द्रादित्य ने करवाया था एवं उन्हीं के नाम पर इस मंदिर को जाना जाता है।  यह एक शिव मंदिर है।

बत्तीस स्तंभों पर खड़े बत्तीसा मंदिर का निर्माण बलुआ पत्थर से हुआ है। इसका निर्माण गंगमहादेवी ने सोमेष्वर देव के शासन काल में किया। इस मंदिर में षिव एवं नंदी की  प्रतिमायें हैं। एक हजार साल पुराने इस मंदिर को बड़े ही वैज्ञानिक तरीके से पत्थरों को व्यवस्थित कर बनाया गया है।

>>बत्तीसा मंदिर के बारे में पूर्ण पढ़े।

गणेश मंदिर : यहां भगवान गणेश की दो विशाल बलुआ पत्थर से बनी प्रतिमायें स्थित है। जो कला का उत्कृष्ट उदाहरण है।

दुनिया का एकमात्र ऐसा मंदिर जहां विराजमान है भगवान गणेश की दो विशालकाय मूर्ति विराजित है। एक की ऊंचाई सात फ़ीट की है तो दूसरी की पांच फ़ीट है। ये दोनों मूर्ति एक ही चट्टान पर बिना किसी जोड़ के बनाई है।

पौराणिक मान्यता के अनुसार इस मंदिर का निर्माण राजा बाणासुर ने करवाया था। राजा की पुत्री और उसकी सहेली दोनों भगवान गणेश की खूब पूजा करती थी। लेकिन इस इलाके में भगवान गणेश की कोई मंदिर नहीं होने के कारण राजा ने अपनी पुत्री के कहने पर इस मंदिर का निर्माण कराया।

करली महादेव, समलूर - दंतेवाड़ा


करली महादेव मंदिर, दंतेवाड़ा जिले के गीदम ब्लॉक के समलूर में स्थित है। यह मंदिर 11वीं शताब्दी का है। केंद्रीय पुरातत्व विभाग ने इसे संरक्षित स्मारक घोषित किया है।

इतिहास:
क्षेत्र के पुरातत्व के जानकार युवा ओम सोनी के मुताबिक छिंदक नागवंशी शासक सोमेश्वर देव का शासन काल (1069 से 1109) के दौरान इस मंदिर का निर्माण उनकी पत्नी महारानी सोमल महादेवी ने कराया था।

उत्कल शैली में निर्मित इस मंदिर की बनावट बारसूर के मामा-भांजा मंदिर और नारायणपाल के विष्णु मंदिर से मिलती-जुलती है।
नारायणपाल और मामा-भांजा मंदिर की तर्ज पर इस मंदिर में भी गर्भगृह व अर्धमंडप है। इस मंदिर के शिवलिंग की खास बात यह है कि इसका शिवलिंग पश्चिम मुखी है, जबकि बस्तर में ज्यादातर शिवलिंग पूर्वाभिमुख है।

Source : दैनिक भास्कर

तीजन बाई - Teejan Bai

तीजनबाई (जन्म- २४ अप्रैल १९५६) का जन्म ग्राम गनियरी में हुआ। छत्तीसगढ़ राज्य के पंडवानी लोक गीत-नाट्य की पहली महिला कलाकार हैं। देश-विदेश में अपनी कला का प्रदर्शन करने वाली तीजनबाई जी को बिलासपुर विश्वविद्यालय द्वारा डी लिट की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया है।

उन्होंने अपना पहला मंच प्रदर्शन 13 वर्ष की आयु में किया। उस समय में महिला पंडवानी गायिकाएँ केवल बैठकर गा सकती थीं जिसे वेदमती शैली कहा जाता है। पुरुष खड़े होकर कापालिक शैली में गाते थे। तीजनबाई वे पहली महिला थीं जो जिन्होंने कापालिक शैली में पंडवानी का प्रदर्शन किया। रंगकर्मी हबीब तनवीर ने उन्हें सुना और तबसे तीजनबाई का जीवन बदल गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी से लेकर अनेक अतिविशिष्ट लोगों के सामने देश-विदेश में उन्होंने अपनी कला का प्रदर्शन किया।

>>पंडवानी लोक गायन

पुरस्कार:
वर्ष 1988 में भारत सरकार द्वारा पद्मश्री और 2003 में कला के क्षेत्र में पद्म भूषण से तथा 2019 में पद्म विभूषण से अलंकृत की गयीं। उन्हें 1995 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार तथा 2007 में नृत्य शिरोमणि से भी सम्मानित किया जा चुका है।

>>छत्तीसगढ़ के लोक कलाकार

कौन थे जोगेंद्र नाथ मंडल ?

जन्म : 29 जनवरी 1904
बंगाल, ब्रिटिश भारत
मृत्यु : 5 अक्टूबर 1968 (उम्र 64)
बंगाव, पश्चिमी बंगाल, भारत

जोगेन्द्र नाथ मंडल जन्म बिरिसल जिले में हुआ था, उस समय बंगाल प्रेसीडेंसी, ब्रिटिश भारत, 1904 में बांग्लादेश का जन्म हुआ था। वे आधुनिक पाकिस्तान के प्रमुख संस्थापको में से एक थे, और देश के पहले कानून मंत्री ( 15 अगस्त 1947 – 8 अक्टूबर 1950 ) थे और यह राष्ट्रमंडल और कश्मीर मामलों के दूसरे मंत्री भी थे।

जोगेंद्र ने सन 1924 में इंटर और सन 1929 में बी. ए. पास कर पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई पहले ढाका और बाद में कलकत्ता विश्व विद्यालय से पूरी की थी । सन 1937 में उन्हें जिला काउन्सिल के लिए मनोनीत किया गया । इसी वर्ष उन्हें बंगाल लेजिस्लेटिव काउन्सिल का सदस्य चुना गया । सन 1939,40 तक वे कांग्रेस के साथ जुड़े रहे।

अनुसूचित जातियों (दलितों) के नेता के रूप में, जोगेंद्रनाथ ने मुस्लिम लीग के साथ पाकिस्तान के लिए अपनी मांग के साथ आम कारण बना दिया था, उम्मीद करते थे कि अनुसूचित जातियों को इसके लाभ मिलेगा और पाकिस्तान के पहले कैबिनेट में शामिल हो गए थे। कानून और श्रम पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमन्त्री लियाकत अली खान को अपना इस्तीफा देने के बाद पाकिस्तान के विभाजन के कुछ सालों बाद वह भारत में आकर चले गए, पाकिस्तानी प्रशासन के कथित हिंदू-विरोधी पूर्वाग्रह का हवाला देते हुए।

भारत में राजनीतिक कैरियर (1937-1947)

मंडल ने 1937 के भारतीय प्रांतीय विधानसभा चुनाव में एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में अपना राजनीतिक कैरियर शुरू किया। उन्होंने बखरागंज उत्तर पूर्व ग्रामीण निर्वाचन क्षेत्र को बंगाल विधान सभा में एक सीट पर चुनाव लड़ा और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की जिला समिति के अध्यक्ष सरकल कुमार दत्ता को पराजित किया। (कांग्रेस) और स्वदेशी नेता अश्विनी कुमार दत्ता के भतीजे थे।

सुभाष चंद्र बोस और शरतचंद्र बोस दोनों ने इस समय मंडल को काफी प्रभावित किया था। वर्ष1940 में मंडल मुस्लिम लीग (एमएल) के साथ जुड़ गए, जो एकमात्र अन्य महत्वपूर्ण राष्ट्रीय पार्टी थी, और एमएल के मुख्यमंत्री, हुसैन शहीद सुहरावर्दी के मंत्रिमंडल में एक मंत्री बने। वे मुस्लिम लीग के एक प्रमुख सदस्य थे।

जब 1946 में दंगे फैल गए, तो उन्होंने पूर्वी बंगाल के चारों ओर यात्रा की ताकि दलितों को मुसलमानों के खिलाफ हिंसा में भाग न लेने का आग्रह किया। उन्होंने तर्क दिया कि एमएल के साथ अपने विवाद में कांग्रेस के जाति हिंदुओं द्वारा प्यादे के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।

पाकिस्तान में राजनीतिक कैरियर (1947-1950)
15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश भारत के विभाजन के बाद, मंडल पाकिस्तान के संविधान सभा के सदस्य और अस्थायी अध्यक्ष बने, और प्रथम कानून और श्रम मंत्री के रूप में सेवा करने पर सहमत हो गए - और1947 से 1950 तक वह पाकिस्तान की तत्कालीन राजधानी कराची के बंदरगाह शहर में रहते थे।

भारत लौटें (1950)
पाकिस्तानी प्रशासन के विरोधी हिंदू पूर्वाग्रह का हवाला दे कर, 1950 में, पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को अपना इस्तीफा दे दिया। उन्होंने अपने इस्तीफे पत्र में सामाजिक अन्याय और गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों के प्रति पक्षपातपूर्ण व्यवहार से संबंधित घटनाओं का उल्लेख किया।

जब पाकिस्तान बना तो लाखो दलित पाकिस्तान चले गये  जिन्हें विश्वास था मुसलमान उनका साथ देंगे, उन्हें अपनाएंगे । जिन्ना को जोगेंद्र नाथ मंडल पर भरोसा था । वो मुहम्मद अली जिन्ना के काफी करीबी थे । दरअसल जोगेंद्र ने ही अपनी ताकत से असम के सयलहेट को पाकिस्तान में मिला दिया था । 3 जून 1947 की घोषणा के बाद असम के सयलहेट को जनमत संग्रह से यह तय करना था कि वो पाकिस्तान का हिस्सा बनेगा या भारत का। उस इलाकें में हिंदू मुस्लिम की संख्या बराबर थी। जिन्ना ने इलाके में मंडल को भेजा, मंडल ने वहां दलितों का मत पाकिस्तान के पक्ष में झुका दिया जिसके बाद सयलहेट पाकिस्तान का हिस्सा बना आज वो बांग्लादेश में हैं।

पाकिस्तान निर्माण के कुछ वक्त बाद गैर मुस्लिमो को निशाना बनाया जाने लगा। हिन्दुओ के साथ लूटमार, बलात्कार की घटनाएँ सामने आने लगी। मंडल ने इस विषय पर सरकार को कई खत लिखे लेकिन सरकार ने उनकी एक न सुनी। जोगेंद्र नाथ मंडल को बाहर करने के लिये उनकी देशभक्ति पर संदेह किया जाने लगा। मंडल को इस बात का एहसास हुआ जिस पाकिस्तान को उन्होंने अपना घर समझा था वो उनके रहने लायक नहीं है। मंडल बहुत आहात हुए, उन्हें विश्वास था पाकिस्तान में दलितों के साथ अन्याय नहीं होगा। करीबन दो सालों में ही दलित मुस्लिम एकता का मंडल का ख्बाब टूट गया। जिन्ना की मौत के बाद मंडल 8 अक्टूबर, 1950 को लियाकत अलीखां के मंत्री मंडल से त्याग पत्र देकर भारत आ गये।

जोगेंद्र नाथ मंडल ने अपने खत में मुस्लिम लीग से जुड़ने और अपने इस्तीफे की वजह को स्पष्ट किया, जिसके कुछ अंश यहाँ है । मंडल ने अपने खत में लिखा, 'बंगाल में मुस्लिम और दलितों की एक जैसी हालात थी । दोनों ही पिछड़े, मछुआरे, अशिक्षित थे । मुझे आश्वस्त किया गया था लीग के साथ मेरे सहयोग से ऐसे कदम उठाये जायेंगे जिससे बंगाल की बड़ी आबादी का भला होगा । हम मिलकर ऐसी आधारशिला रखेंगे जिससे साम्प्रदायिक शांति और सौहादर्य बढ़ेगा । इन्ही कारणों से मैंने मुस्लिम लीग का साथ दिया । 1946 में पाकिस्तान के निर्माण के लिये मुस्लिम लीग ने 'डायरेक्ट एक्शन डे' मनाया । जिसके बाद बंगाल में भीषण दंगे हुए । कलकत्ता के नोआखली नरसंहार में पिछड़ी जाति समेत कई हिन्दुओ की हत्याएं हुई, सैकड़ों ने इस्लाम कबूल लिया । हिंदू महिलाओं का बलात्कार, अपहरण किया गया । इसके बाद मैंने दंगा प्रभावित इलाकों का दौरा किया । मैने हिन्दुओ के भयानक दुःख देखे जिनसे अभिभूत हूँ लेकिन फिर भी मैंने मुस्लिम लीग के साथ सहयोग की नीति को जारी रखा ।

14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान बनने के बाद मुझे मंत्रीमंडल में शामिल किया गया । मैंने ख्वाजा नजीममुद्दीन से बात कर ईस्ट बंगाल की कैबिनेट में दो पिछड़ी जाति के लोगो को शामिल करने का अनुरोध किया । उन्होंने मुझसे ऐसा करने का वादा किया । लेकिन इसे टाल दिया गया जिससे मै बहुत हताश हुआ ।

मंडल ने अपने खत में पाकिस्तान में दलितों पर हुए अत्याचार की कई घटनाओं जिक्र किया उन्होंने लिखा, 'गोपालगंज के पास दीघरकुल (Digharkul ) में मुस्लिम की झूटी शिकायत पर स्थानीय नमोशूद्राय लोगो के साथ क्रूर अत्याचार किया गया । पुलिस के साथ मिलकर मुसलमानों ने मिलकर नमोशूद्राय समाज के लोगो को पीटा, घरों में छापे मारे । एक गर्भवती महिला की इतनी बेरहमी से पिटाई की गयी कि उसका मौके पर ही गर्भपात हो गया निर्दोष हिन्दुओ विशेष रूप से पिछड़े समुदाय के लोगो पर सेना और पुलिस ने भी हिंसा को बढ़ावा दिया । सयलहेट जिले के हबीबगढ़ में निर्दोष पुरुषो और महिलाओं को पीटा गया । सेना ने न केबल लोगो को पीटा बल्कि हिंदू पुरुषो को उनकी महिलाओं सैन्य शिविरों में भेजने के मजबूर किया ताकि वो सेना की कामुक इच्छाओं को पूरा कर सके । मैं इस मामले को आपके संज्ञान में लाया था, मुझे इस मामले में रिपोर्ट के लिये आश्वस्त किया गया लेकिन रिपोर्ट नहीं आई ।

खुलना (Khulna) जिले कलशैरा (Kalshira) में सशस्त्र पुलिस, सेना और स्थानीय लोगो ने निर्दयता से पुरे गाँव पर हमला किया। कई महिलाओं का पुलिस, सेना और स्थानीय लोगो द्वारा बलात्कार किया गया । मैने 28 फरवरी 1950 को कलशैरा और आसपास के गांवों का दौरा किया। जब मैं कलशैरा में आया तो देखा यहाँ जगह उजाड़ और खंडहर में बदल गयी। यहाँ करीबन 350 घरों को ध्वस्त कर दिया गया। मैंने तथ्यों के साथ आपको सूचना दी।

ढाका में नौ दिनों के प्रवास के दौरान में दंगा प्रभावित इलाकों का दौरा किया। ढाका नारायणगंज और ढाका चंटगाँव के बीच ट्रेनों और पटरियों पर निर्दोष हिन्दुओ की हत्याओं ने मुझे गहरा झटका दिया। मैंने ईस्ट बंगाल के मुख्यमंत्री से मुलाकर कर दंगा प्रसार को रोकने के लिये जरूरी कदमों को उठाने का आग्रह किया। 20 फरवरी 1950 को मैं बरिसाल (Barisal) पहुंचा। यहाँ की घटनाओं के बारे में जानकार में चकित था। यहाँ बड़ी संख्या में हिन्दुओ को जला दिया गया। उनकी बड़ी संख्या को खत्म कर दिया गया। मैंने जिले में लगभग सभी दंगा प्रभावित इलाकों का दौरा किया। मधापाशा (Madhabpasha) में जमींदार के घर में 200 लोगो की मौत हुई और 40 घायल थे । एक जगह है मुलादी (Muladi ), प्रत्यक्षदर्शी ने यहाँ भयानक नरक देखा । यहाँ 300 लोगो का कत्लेआम हुआ । वहां गाँव में शवो के कंकाल भी देखे नदी किनारे गिद्द और कुत्ते लाशो को खा रहे थे। यहाँ सभी पुरुषो की हत्याओं के बाद लड़कियों को आपस में बाँट लिया गया । राजापुर में 60 लोग मारे गये। बाबूगंज (Babuganj) में हिन्दुओ की सभी दुकानों को लूट आग लगा दी गयी ईस्ट बंगाल के दंगे में अनुमान के मुताबिक 10000 लोगो की हत्याएं हुई।