डँडारी/डंडारी नृत्य - Dandari Dance


डँडारी/डंडारी नृत्य नृत्य धुरवा जनजाति के द्वारा किया जाता है। डँडारी नृत्य मे नर्तको के साथ वादक दल भी होता है। वादक दल मे 7 से 8 व्यक्ति सिर्फ़ ढोल ही बजाते है, और केवल एक व्यक्ति तिरली वादन करता है।

बाँसुरी को ही तिरली कहा जाता है। तिरली के स्वरो को साधने लिये बहुत अनुभव की जरूरत होती है। तिरली वादक पीढियो से ये तिरली बजाने की कला एक दुसरे को सिखाते आ रहे है। तिरली से निकलती स्वर लहरिया ही नृत्य की विशिष्ट पहचान होती है।

डँडारी/डंडारी नृत्य में बांस की खपचियों से एक दुसरे से टकराकर ढोलक एवं तिरली के साथ जुगलबंदी कर नृत्य किया जाता है। यह डांडिया नृत्य से अलग है, डांडिया में जहां गोल गोल साबूत छोटी छोटी लकड़ियों से नृत्य किया जाता है। बांस की खपच्चियों को नर्तक स्थानीय धुरवा बोली में तिमि वेदरीए के नाम से जानते हैं।

वीर मेला - राजा राव पठार

वीर मेला छत्तीसगढ़ राज्य के बालोद जिला में धमतरी जगदलपुर नेशनल हाईवे पर स्थित धमतरी से 15 किलोमीटर दूर स्थित एक पठार पर छत्तीसगढ़ के प्रथम स्वतंत्र शहीद वीर नारायण सिंह की याद में मनाया जाता है।
यह एक आदिवासी महोत्सव है, जो शीतकालीन ऋतु मे मनाया जाने वाला 3 दिवसीय महोत्सव है। इस महोत्सव में 10 दिसंबर को शहीद वीर नारायण सिंह को श्रद्धांजलि दी जाती है और शोभा यात्रा निकली जाती है।

आंग्ल-मराठा युद्ध Anglo-Maratha War

मराठा साम्राज्य की स्थापना वर्ष 1674 में छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा की गयी थी। जिन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत मुगलों के खिलाफ एक विद्रोही के रूप में की थी। औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुगल साम्राज्य का तेजी से विघटन हुआ और मराठों ने अधिक से अधिक प्रदेशों पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया। जब ब्रिटिश भारत में स्थापित शक्ति के रूप में उभरे उस समय तक मराठे मध्य भारत के अनेक हिस्सों में अपनी सत्ता स्थापित कर चुके थे। प्रारंभ में, ब्रिटिश और मराठों के अच्छे संबंध रहे।


अंग्रजो और मराठो के मध्य विवाद का कारण अंग्रजो का भारत में क्षेत्र विस्तार करना था। जब ब्रिटिश और मराठों मध्य संघर्षों का क्रम शुरू हुआ तब तक मराठे पाँच सत्तारूढ़ परिवारों के समूह में बंट चुके थे- पुणे के पेशवा, ग्वालियर के सिंधिया, इंदौर के होल्कर, बड़ौदा के गायकवाड और नागपुर के भोंसले।

ईस्ट इंडिया कंपनी और मराठों के बीच तीन प्रमुख युद्ध लड़े गाये।
प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध 1775-82
रघुनाथ राव ने पेशवा बनने के लिए ब्रिटिश मदद मांगी क्योंकि उन्हें नाना फड्नविस की अध्यक्षता वाली मराठों की परिषद की ओर से विरोध का सामना करना पड़ रहा था। मार्च 1775 में रघुनाथ राव की सेना गुजरात में पराजित हो गयी और मद्रास तथा बंबई से एक संयुक्त ब्रिटिश सेना उनके बचाव के लिये आयी। वर्ष 1776 में पुरन्दर की एक अनिर्णायक संधि में रघुनाथ राव के लिए समर्थन की वापसी के बदले में कंपनी को कई रियायतों की पेशकश की गयी। लेकिन बंगाल में कंपनी के अधिकारियों ने संधि की पुष्टि नहीं की और वर्ष 1777 पुनः युद्ध शुरू हो गया। इस बीच अपनी हार का बदला लेने और अंग्रेज शक्ति को कुचलने के लिए नाना फड्नविस, सिंधिया और होल्कर ने फिर से एकजुट होने के उद्देश्य से वर्ष 1779 में वाडेगांव में एक गठबंधन की स्थापना की।
वर्ष 1781 रघुनाथ राव और भोंसले परिवार अंग्रेजों के खिलाफ निजाम और हैदर अली के साथ मिलकर एक विशाल गठबंधन कायम कर चुके थे। परंतु प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध वर्ष 1782 मे साल्बाई की संधि की वजह से समाप्त हो गया। इस संधि ने माधव राव नारायण को असली पेशवा के रूप में मान्यता दी। दूसरी ओर, अंगेर्जों ने साल्सेट और बेसिन पर नियंत्रण हासिल कर लिया।

द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध 1803-05
दूसरा आंग्ल-मराठा युद्ध मराठों को 'सहायक संधि' प्रणाली के अंतर्गत लाये जाने के ब्रिटिश प्रस्ताव के मुद्दे पर शुरू हुआ। समस्या की शुरुआत वर्ष 1802 में पेशवा बाजीराव द्वितीय द्वारा ‘बेसिन की संधि’ पर हस्ताक्षर करने और ‘सहायक संधि’ के ब्रिटिश प्रस्ताव को स्वीकार कर लेने से शुरू हुई। इस संधि के अनुसार, पेशवा को सब्सिडी के रूप में एक बड़ी राशि का भुगतान करना था। इसके अलावा, वह ब्रिटिश सहमति के बिना किसी अन्य शक्ति के साथ किसी भी गठबंधन में प्रवेश नहीं कर सकता था।
‘बेसिन की संधि’ को अन्य मराठा प्रमुखों द्वारा अस्वीकार कर दिया जिससे दूसरे आंग्ल-मराठा युद्ध (1803-05) की शुरुआत हुई। इस युद्ध के परिणामस्वरुप मराठों की अनेक शाखाओं पर परतंत्रता की संधियां थोप दी गयीं। इसके अलावा, दिल्ली और आगरा सहित सिंधिया द्वारा नियंत्रित अनेक क्षेत्र अंग्रेजों द्वारा ले लिये गये। अंग्रेजो को यह अधिकार भी मिल गया की मराठा घरानो के मध्य विवाद की अन्तिम मध्यस्थता भी अंग्रेज ही करेंगे।

तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध 1817-19
अंग्रेजों और मराठों के मध्य संघर्ष के तीसरे और अंतिम चरण की शुरुआत में वर्ष 1813 में गवर्नर जनरल लॉर्ड हेस्टिंग्स के द्वाराा भारत में "सर्वोपरिता" की नई नीति की शुरुआत से हुई। जिसके अनुसार भारत भूमि पर कम्पनी के हितों को सर्वोच्च वरीयता दी जानी थी और इन हितों के संरक्षण के लिए कंपनी किसी भी भारतीय शक्ति का विलय करने अथवा विलय की धमकी देने का वैधानिक अधिकार रखती थी। इस समय पेशवा बाजीराव द्वितीय ने मराठा प्रमुखों के समर्थन से अपनी स्वतंत्रता हासिल करने के लिए एक अंतिम प्रयास किया। तीसरे आंग्ल-मराठा युद्ध के परिणाम मराठों के लिए घातक साबित हुए।
अंग्रेजों ने पेशवा के क्षेत्रों पर पूरा नियंत्रण स्थापित कर लिया तथा पेशवा के पद को समाप्त कर दिया। भोंसले और होल्कर ने अधीनता की संधि स्वीकार कर ली और उनके इलाके के महत्वपूर्ण भाग कंपनी को सौंप दिये गये। इसके अलावा अंग्रजो ने पिंडारियों के नाम से जानी जाने वाली मराठों की अनियमित सेना को पुर्णतः कुचल दिया गया।

इन्हे देखें:
आंग्ल-मराठा संधियाँ 
ब्रिटिश संरक्षण में मराठा शासन
आंग्ल मराठा युद्ध

पावन खिंड का युद्ध Battle of Pavan Khind

पावन खिंड / घोड़ खिंडी (खिन्ड - खाई) का युद्ध मराठा नरवीर बाजीप्रभू देशपांडे जी के नेतृत्व में 300 सैनिको और सिद्दी मसूद/जौहर (आदिलशही फौज) के नेतृत्व में 10000 सैनिको के मध्य 13 जुलाई, 1660 को हुआ था। यह युध्द महाराष्ट्र के विशालगढ़ के पास घोड़ खिंडी नाम के खाई में लड़ा गया था, इस युद्ध के बाद इस खाई को पावनखिंड के नाम से जाना जने लगा।


कारण:
28 दिसंबर, 1659 को कोल्हापुर युद्ध में आदिलशाही सेना को शिवाजी से हार का सामना करना पड़ा। जिससे आहत बीजापुर के सुल्तान ने सिद्धि जौहर और फजल खां के नेतृत्व में सेना भेजी। 15 हजार कि विशाल सेना के साथ सिद्धि जौहर ने 2 मार्च 1660 को छत्रपति शिवाजी महाराज को पन्हाला किले में घेर लिया। किला काफी विशाल होने कि वजह से 4 महिनो मे भी आदिलशाही फौज को कामयबी नहीं मिलने कि वजह से उन्होने पवनगढ़ किले पर कब्जा करने का सोचा जिसके लिये पास कि पहाड़ी पर कब्जा कर आदिलशाही फौज ने पवनगढ़ किले पर गोलाबारी सुरु कर दी। 
अगर पवनगढ़ किले पर कब्जा हो जाता तो आदिलशाही फौज के लिये पन्हाला किले पर कब्जा करना आसान हो जाता इस लिये शिवाजी ने 13 जुलाई 1660 कि रत्रि को पन्हाला किले से निकल कर करीब 700 सैनिको के साथ विशालगढ़ जाने का निश्चय किया जिसके लिये रास्ते में पवनगढ़ मे कब्जा कर बैठे आदिलशाही फौज फौज पर हमला कर दिया। आदिलशाही फौज पर यह हमला अचानक हुआ जिस वजह से अफरा तफरी मच गई। इस अफरा तफरी का फायदा उठा कर शिवाजी विशालगढ़ कि तरफ निकल गये, जो करीब 60 किलोमीटर दूर था। दुश्मनो को इसका पता चल और शिवाजी के पिछे 10000 की सेना भेज दी।
शिवाजी का विशालगढ़ पहुचना अवश्यक था, इस लिये बाजीप्रभू ने विनति कर 300 सैनिको के साथ घोड़ खिंडी पर रुक गाये और शिवाजी को विशालगढ़ पहुच कर तोप से गोला दागने को कहा। 

युद्ध:
बाजीप्रभू और उनके 300 सैनिक घोड़ खिंडी मे 10000 आदिलशाही सेना का इंंतजार करने लगी।
विपक्षी सेना की पहली टुकड़ी दर्रे के नीचे आ खड़ी हुई। मराठाओं की तादात बहुत कम थी। मराठा सैनिको ने पुरी ताकत से नीचे से उपर आती सिद्दी जौहर की सेना पर भीषण हमला किया। 
बाजीप्रभू और उनके 300 सैनिक तब तक लड़ते रहे जब तक विशालगढ़ से तोप की आवाज नही आ गाई। 10000 की आदिलशाही सेना को फांद नही पाई। यह युद्ध करीब 5 घण्टो तक चला जिसमे 3000 से ज्यादा आदिलशाही सेना को 300 मराठाओं ने मौत के घाट उतार दिया। बाजीप्रभू जी अपनी अन्तिम साँस तक लड़ते रहें और 14 जुलाई को विशालगढ़ से तोप की आवाज आने के बाद किले कि तरफ देख कर अपना अन्तिम प्रणाम किया।
इस युद्ध से मरठा सैनिको ने शिवाजी को विशालगढ़ पहुचाने के उददेश्य की पूर्ति की। शिवाजी ने इस बलिदान को पूजते हुये दर्रे का नाम घोडखिंडी से पावन खिंडी कर दिया।

पैरी नदी - Pairi river

पैरी नदी महानदी कि एक प्रमुख सहायक नदी है। पैरी नदी का उद्गम गरियाबंद जिले में मैनपुर से करीब 3 किलोमीटर दूर स्थित भाटिगढ़ के पहाड़ से हुआ है। इस नदी के उद्गम के पास ही कुंड एवं मन्दिर है। मन्दिर तक पहुचने के लिये करीब 255 सीढियां है।
अपने उद्गम स्थल से निकलने के बाद करीब 90 कि.मी. बहती हुई राजिम क्षेत्र में महानदी से मिलती है। पैरी नदी धमतरी और राजिम को विभाजित करती है। इसी नदी के तट पर प्रसिद्ध 'राजीवलोचन मंदिर' स्थित है। राजिम में महानदी और सोंढुर नदियों का त्रिवेणी संगम स्थल भी है।


बन्दरगाह के अवशेष:
गरियाबंद पांडुका की पैरी नदी में ढाई हजार साल पुरने बंदरगाह के अवशेष मिले है। पांडुका सिरकट्टी के तट पर नदी के किनारे छह चैनल यानी गोदी के अवशेष साफ नजर आ रहे हैं। प्रारंभिक सर्वेक्षण के बाद पुरातत्व विभाग के विशेषज्ञों ने दावा किया है कि नदी के तट पर चट्टानों को काटकर जहाज खड़ा करने के लिए गोदी बनाई गई थी।
यहां से जहाज ओडिशा के कटक से होकर बंगाल की खाड़ी से चीन तक जाते थे। उस समय में छत्तीसगढ़ में बड़े पैमाने पर कोसा की पैदावर हुआ करती थी। कोसा इसी रास्ते से चायना भेजा जाता था।

सिकासार सिंचाई परियोजना:
सिकासार जलाशय / बाँध, गरियाबंड़ जिला मुख्यालय से 50 किमी की दुरी पर पैरी नदी में सिकासार गांव मे स्थित है। सिकासार जलाशय का निर्माण सन 1977 मे पुर्ण हुआ । सिकासार बाँध की लबाई 1540 मी. एवं बाँध मी अधिकतम उंचाई 9.32 मी. है । सिकासार जलाशय मे 2X3.5 M.W. क्षमता का जल विद्युत संयंत्र स्थापित है जिससे सिचाई के साथ साथ विद्युत उत्पादन किया जाता है।

इन्हे देखें:
छत्तीसगढ़ कि प्रमुख नदियाँ 

ब्रू या रेयांग (Bru or Reang) समुदाय - विवाद का कारण

ब्रू या रेयांग (Bru or Reang) समुदाय पूर्वोत्तर भारत के मूल निवासी हैं जो मुख्यतः त्रिपुरा, मिज़ोरम तथा असम में रहते हैं। मिजोरम में ब्रू अनुसूचित जनजाति का एक समूह माना जाता है और त्रिपुरा में एक अलग जाति है। त्रिपुरा में इन्हें रियांग नाम से जाना जाता हैं, इनकी भाषा भी ब्रू है।

किवदंतियों के अनुसार, माना जाता है कि त्रिपुरा का एक राजकुमार, जिसे राज्य से निकाल दिया गया था वह, अपने समर्थकों के साथ मिज़ोरम में जाकर बस गया। वहाँ उसने एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना की। ब्रू समुदाय के पूर्वज उस राजकुमार के समर्थक थे।

विवाद क्या है?
वर्ष 1995 में यंग मिज़ो एसोसिएशन और मिज़ो स्टूडेंट्स एसोसिएशन ने राज्य की चुनावी भागीदारी में ब्रू समुदाय के लोगों की मौजूदगी का विरोध किया। 40 सीटों वाली मिजोरम विधानसभा में से 9 विधानसभा क्षेत्रों में ब्रू शरणार्थी वोटरों की निर्णायक भूमिका है।

मिजो संगठनों का कहना था कि ब्रू समुदाय के लोग राज्य के मुल निवासी नहीं है।  'मिज़ो’ तथा ‘ब्रू’ जनजातियों के बीच हुए आपसी झड़प की वजह से ‘यंग मिज़ो एसोसिएशन’ (Young Mizo Association) तथा ‘मिज़ो स्टूडेंट्स एसोसिएशन’ (Mizo Students’ Association) ने यह मांग रखी कि ब्रू लोगों के नाम राज्य की मतदाता सूची से हटाए जाए। इसके बाद 21 अक्टूबर, 1996 को  ब्रू नेशनल लिबरेशन फ्रंट (Bru National Liberation Front-BNLF) ने एक मिज़ो अधिकारी की हत्या कर दी जिसके बाद से दोनों समुदायों के बीच सांप्रदायिक दंगा भड़क गया।जिसके बाद लगभग 37,000 ब्रू लोगों को मिज़ोरम छोड़ना पड़ा। उसके बाद उन्हें त्रिपुरा के शरणार्थी शिविरों में रखा गया। तब से अभी तक लगभग 5,000 ब्रू लोग वापस मिज़ोरम लौट सके हैं जबकि शेष 32,000 अभी भी त्रिपुरा के कंचनपुर और पाणिसागर उपसंभागों में बने शरणार्थी शिविरों में रह रहे हैं।

शुंग वंश - Shung Vansh

मौर्य वंश का अंतिम शासक वृहद्रय था। वृहद्रय को उसके ब्राह्मण सेनापति पुष्यमित्र ने ई. पूर्व 185 में मार दिया और इस प्रकार मौर्य वंश का अंत हो गया। हर्षचरित में बृहद्रथ को 'प्रतिज्ञादुर्बल' कहा गया है। इसका अभिप्राय यह है कि, राज्याभिषेक के समय प्राचीन आर्य परम्परा के अनुसार राजा को जो प्रतिज्ञा करनी होती थी, बृहद्रथ उसके पालन में दुर्बल था। सेना उसके प्रति अनुरक्त नहीं थी। इसीलिए सेनानी पुष्यमित्र का षड़यंत्र सफल हो गया।

पुष्यमित्र ने अश्वमेध यज्ञ किया था। पुष्यमित्र ने सिंहासन पर बैठकर मगध पर शुंग वंश के शासन का आरम्भ किया। शुंग वंश का शासन सम्भवतः ई. पू. 185 ई. से पू. 100 तक दृढ़ बना रहा। पुष्यमित्र इस वंश का प्रथम शासक था, उसके पश्चात् उसका पुत्र अग्निमित्र, उसका पुत्र वसुमित्र राजा बना। वसुमित्र के पश्चात् जो शुंग सम्राट् हुए, उसमें कौत्सीपुत्र भागमद्र, भद्रघोष, भागवत और देवभूति के नाम उल्लेखनीय है। शुंग वंश का अंतिम सम्राट देवहूति था, उसके साथ ही शुंग साम्राज्य समाप्त हो गया था। शुग-वंश के शासक वैदिक धर्म के मानने वाले थे। इनके समय में भागवत धर्म की विशेष उन्नति हुई।

शुंग वंश के शासकों की सूची है:-

पुष्यमित्र शुंग (185 - 149 ई.पू.) :
पुष्यमित्र शुंग ने मगध में शुंग साम्राज्य की निव डाली थी। मौर्य वंश के अन्तिम राजा बृहद्रथ ने उसे अपना सेनापति नियुक्त कर दिया था। बृहद्रथ की हत्या करके पुष्यमित्र शुंग ने मौर्य राजगद्दी पर अपना अधिकार कर लिया। पुष्यमित्र के राजत्वकाल में ही वह विदिशा का 'गोप्ता' बनाया गया था और वहाँ के शासन का सारा कार्य यहीं से देखता था। आधुनिक समय में विदिशा को भिलसा कहा जाता है।

अग्निमित्र (149 - 141 ई.पू.) :
ये पुष्यमित्र के पुत्र थे। कालीदास की सुप्रसिद्ध रचना 'मालविकाग्निमित्र' से पता चलता है कि, विदर्भ की राजकुमारी 'मालविका' से अग्निमित्र ने विवाह किया था। यह उनकी तीसरी पत्नी थी। उसकी पहली दो पत्नियाँ 'धारिणी' और 'इरावती' थीं। इस नाटक से यवन शासकों के साथ एक युद्ध का भी पता चलता है, जिसका नायकत्व अग्निमित्र के पुत्र वसुमित्र ने किया था।

वसुज्येष्ठ (141 - 131 ई.पू.)
वसुमित्र (131 - 124 ई.पू.)
अन्धक (124 - 122 ई.पू.)
पुलिन्दक (122 - 119 ई.पू.)
घोष शुंग
वज्रमित्र
भगभद्र :
शुंग वंश का नौवा शासक था। इनका शासनकाल काफी महत्वपूर्ण रहा। इनके शासनकाल के दौरान तक्षशीला के यवन नरेश 'एन्टीयालकीड्स' ने अपने राजदूत 'हेलियोडोरस' को भागभद्र के दरबार में विदिशा भेजा। यहाँ हेलियोडोरस ने भागवत धर्म ग्रहण कर लिया।
बेसनगर गरुण स्तम्भ हेलियोडोरस ने भागभद्र के शासनकाल में बनवाया था। यह भागवत धर्म से सम्बंधित प्रथम स्तम्भ था।

देवभूति (83 - 73 ई.पू.) :
अन्तिम शासक थे। वसुदेव कण्व ने देवभूति की हत्या कर कण्व वंश की स्थापना की।

सातवाहन वंश - Satvahan vansh

सातवाहन वंश (60 ई.पू. से 240 ई.) भारत का एक प्राचीन राजवंश था, इस वंश का केंद्र दक्षिण भारत में था। भारतीय इतिहास में यह राजवंश 'आन्ध्र वंश' के नाम से भी जाना जाता है। सातवाहन वंश का प्रारम्भिक (संस्थापक) राजा सिमुक था। इस वंश के राजाओं ने विदेशी आक्रमणकारियों से संघर्ष किया था। इन राजाओं ने शक शासकों को भारत में पैर जमाने से रोका।

इतिहास:
भारतीय परिवार, जो पुराणों (प्राचीन धार्मिक तथा किंवदंतियों का साहित्य) पर आधारित कुछ व्याख्याओं के अनुसार आंध्र जाति (जनजाति) का था और 'दक्षिणापथ' अर्थात दक्षिणी क्षेत्र में साम्राज्य की स्थापना करने वाला पहला दक्कनी वंश था। इस वंश का आरंभ 'सिभुक' अथवा 'सिंधुक' नामक व्यक्ति ने दक्षिण में कृष्णा और गोदावरी नदियों की घाटी में किया था। इस वश को 'आंध्र राजवंश' के नाम भी जाना जाता है। सातवाहन वंश के अनेक प्रतापी सम्राटों ने विदेशी शक आक्रान्ताओं के विरुद्ध भी सफलता प्राप्त की थी। 
दक्षिणापथ के इन राजाओं का वृत्तान्त न केवल उनके सिक्कों और शिलालेखों से जाना जाता है, अपितु अनेक ऐसे साहित्यिक ग्रंथ भी उपलब्ध हैं, जिनसे इस राजवंश के कतिपय राजाओं के सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण बातें ज्ञात होती हैं।

सातवाहन वंश के राजाओं के नाम
सिमुक
सातकर्णि
गौतमीपुत्र सातकर्णि : इस वंश का सबसे प्रसिद्ध शासक था, इन्हे शक, पल्लव व येवान/यवन शक्तियों का विनाशक कहा गया। इन्होने राज तथा महाराज की उपाधि ग्रहण की थी।
वासिष्ठी पुत्र पुलुमावि
कृष्ण द्वितीय सातवाहन
राजा हाल : इस वंश का 17वाँ शासक था। इसने प्राकृत भाषा में सप्तशती नामक एक ग्रंथ का संकलन करवाया। 
महेन्द्र सातकर्णि
कुन्तल सातकर्णि

प्रशासन
संपूर्ण राज्य जनपद मे विभाजित था तथा पुनः अहरस में उपविभाजित था। प्रत्येक आहर अमात्य द्वारा प्रशासित होता था। यह पुनः ग्राम में विभाजित होता था जिसका मुख्य ग्रामिका होता था। सातवाहन प्रशासन में ग्रामीण क्षेत्र के प्रशासनिक अधिकारी को गौल्मीका कहा जाता था।

विशेष 
नासिक में प्राप्त दो गुफा अभिलेख गौतमीपुत्र शत्कारणी से संबंधित है।
सातवाहन अभिलेख में पहली बार अमात्य के कार्यालय का वर्णन है।
नगनिका (शत्कारणी की पत्नी) का नानाघाट अभिलेख पुणे के पास से प्राप्त हुआ है।

इन्हे भी देखें:
ब्राम्हण साम्राज्य


मकर संक्रांति - उत्तरायण एवं दक्षिणायन

मकर संक्रान्ति हिन्दुओं का प्रमुख पर्व है। मकर संक्रान्ति पूरे भारत और नेपाल में किसी न किसी रूप में मनाया जाता है। पौष मास में जब सूर्य मकर राशि पर आता है तभी इस पर्व को मनाया जाता है। वर्तमान शताब्दी में यह त्योहार जनवरी माह के चौदहवें या पन्द्रहवें दिन ही पड़ता है , इस दिन सूर्य धनु राशि को छोड़ मकर राशि में प्रवेश करता है।

इसे अलग-अलग नामो से जाना जाता है।
  • मकर संक्रान्ति : छत्तीसगढ़, गोआ, ओड़ीसा, हरियाणा, बिहार, झारखण्ड, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर, राजस्थान, सिक्किम, उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, पश्चिम बंगाल, गुजरात और जम्मू ताइ पोंगल, 
  • उझवर तिरुनल : तमिलनाडु 
  • उत्तरायण : गुजरात, उत्तराखण्ड 
  • माघी : हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, पंजाब 
  • भोगाली बिहु : असम 
  • शिशुर सेंक्रात : कश्मीर घाटी 
  • खिचड़ी : उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार 
  • पौष संक्रान्ति : पश्चिम बंगाल 
  • मकर संक्रमण : कर्नाटक 
  • लोहड़ी : पंजाब
  • पोंगल : तमिलनाडु 
  • संक्रांति: आन्ध्र प्रदेश 

उत्तरायण एवं दक्षिणायन 
उत्तरायण सूर्य की स्थिति है।'उत्तरायण' ( उत्तर + अयन) का शाब्दिक अर्थ है - 'उत्तर में गमन'।
दिन के समय सूर्य के उच्चतम बिंदु को यदि दैनिक तौर पर देखा जाये तो वह बिंदु हर दिन उत्तर की और बढ़ता हुआ दिखेगा। उत्तरायण की दशा में पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध में दिन लम्बे होते जाते है और राते छोटी। उत्तरायण का आरंभ 21 या 22 को दिसम्बर होता है। यह दशा 21 जून तक रहती है। उसके बाद पुनः दिन छोटे और रात लम्बी होती जाती है |
मकर संक्रांति उत्तरायण से भिन्न है। मकर संक्रांति वर्तमान शताब्दी में 14 जनवरी को होती है।

दक्षिणायन की स्थिति है।'दक्षिणायन'( दक्षिण + आयन) का शाब्दिक अर्थ है - 'दक्षिण में  गमन'।
इस दौरान सूर्य दक्षिण की ओर गमन करता है (अयन=गति), अर्थात कर्क संक्रांति के दिन सूर्य की किरणे कर्क रेखा पर सीधी पड़ने के बाद क्रमशः दक्षिण की ओर खिसकते हुए मकर संक्रांति के दिन मकर रेखा पर सीधी पड़ती हैं। सूर्य की सीधी किरणों के पड़ने के इस खिसकाव में छह महीने लगते हैं। सायन पद्धति में यह समय 21 जून से लेकर 22/23 दिसंबर का होता है जबकि निरयन पद्धति में यह 15/16 जुलाई से लेकर 14/15 जनवरी के बीच होता है।

सूर्य की स्थिति मकर रेखा से कर्क रेखा की ओर बढ़ने को उत्तरायण एवं कर्क रेखा से मकर रेखा को वापसी को दक्षिणायन कहते हैं। इस प्रकार वर्ष 6-6 माह के में दो अयन होते हैं।

खेलो इंडिया - Khelo India Youth Games

खेलो इंडिया (Khelo India Youth Games (KIYG), पूर्व में Khelo India School Games (KISG)), इसका आयोजन जनवरी या फरवरी में वार्षिक रूप से होता है, भारत में दो श्रेणियों में आयोजित होने वाला राष्ट्रीय स्तर का खेल आयोजन हैं। खेल में सर्वश्रेष्ठ 1000 बच्चों को अंतरराष्ट्रीय खेल स्पर्धाओं के लिए तैयार करने के लिए 8 साल के लिए 5 लाख की वार्षिक छात्रवृत्ति प्रदान की जाती है।


2018 दिल्ली (31 जनवरी - 16 फरवरी):-
प्रथम - हरियाणा
द्वितीय - महाराष्ट्र 
तृतीय -  दिल्ली

2019 पुणे, महाराष्ट्र ( 9 जनवरी - 20 जनवरी):-
प्रथम - महाराष्ट्र
द्वितीय - हरियाणा
तृतीय - दिल्ली

2020 गुवाहटी, असम ( 10 जनवरी - 22 जनवरी ):-
प्रथम -
द्वितीय -
तृतीय -