खिलजी वंश - Khalji dynasty


खिलजी वंश का संस्थापक जलालुद्दीन खिलजी ने गुलाम वंश के अन्तिम शासक कैकुबाद और क्युमर्स की हत्या कर के की थी। इन्हे ख़लजी भी कहा जाता है, क्यो की ये अफगानिस्तान के खल्ज नामक स्थान से थे। परन्तु, ये भी मूलतः तुर्की थे। इन्होने अपनी राजधानी किलाखरी को बनाया था।


खिलजी वंश के शासको के नाम :

  1. जलालुद्दीन खिलजी ( 1290-1298 ई.)
  2. अलाउद्दीन खिलजी ( 1296-1316 ई. )
  3. कुतुबुद्दीन मुबारक शाह खिलजी (1316-1320 ई. )
  4. नासिरुद्दीन खुसरो शाह ( 1320 ई. )


जलालुद्दीन खिलजी

जलालुद्दीन खिलजी का वास्तविक नाम फिरोज था। वह खिलजी शासक बनने से पहले आरिज-ए-मुमालिक ( सैन्य विभाग का प्रमुख ) था।

वह 70 वर्ष की आयु में कैकुबाद द्वारा निर्मित किलोखरी महल ( दिल्ली ) में राज्याभिषेक कराया और सबसे वृद्ध शासक बना।

जलालुद्दीन खिलजी के काल मंगोल आक्रमण हुआ परन्तु उन्हे अलउद्दीन खिलजी ने परास्त कर दिया। युद्ध के बाद चंगेज खाँ के नाती उलूग खाँ ने अपने 4,000 मंगोल समर्थको के साथ इस्लाम धर्म ग्रहण किया। 

इनके शासन काल में मंगोल दिल्ली मे बसे जिन्हें नवीन मुसलमान कहा गयाफिरोज खिलजी ने अपनी पुत्री की शादी उलूग खाँ से कर दी तथा नवीन मुसलमानो के रहने के लिए मुगलपुर नामक बस्ती बसाई।

वर्ष 1292 में अलाउद्दीन खिलजी ने भिलसा व वर्ष 1296 में देवगिरि का अभियान किया।

वर्ष 1296 में मानिकपुर में अलाउद्दीन खिलजी मे अपने भाई अलमस की सहायता से जलालुद्दीन खिलजी की हत्या कर दिल्ली का शासक बन गया।


अलाउद्दीन खिलजी

अलाउद्दीन ख़िलजी के बचपन का नाम अली 'गुरशास्प' था। जलालुद्दीन खिलजी के तख्त पर बैठने के बाद 'अमीर-ए-तुजुक' का पद मिला। 

अलाउद्दीन का राज्याभिषेक बलबन द्वारा निर्मित लाल महल मे किया गया।

सर्वाधिक मंगोल आक्रमण अलाउद्दीन के कार्यकाल में हुये। मंगोल आक्रमण से निपटने के लिये दिल्ली के निकट "सीरी" को राजधानी बनायी गयी थी।


सैन्य अभियान :

पहला शासक था जिसके पास स्थाई सेना थी। हुलिया एवं दाग प्रथा की सुरुवात की, सैनिको के लिये "हुलिया" एवं उच्च किस्म के घोड़ो को "दाग" दिया जाता था।

खिलजी ने 1299 में गुजरात पर आक्रमण के लिए उलूग खान को जिम्मेदारी सौपी। वाघेला राजा कर्ण उस समय गुजरात के शासक थे; खिलजी की सेना ने उसे हरा दिया और सोमनाथ मंदिर को ध्वस्त कर दिया। खिलजी ने हिंदुओं का नरसंहार करने और मंदिरों से धन लूटने का आदेश दिया था।

अलाउद्दीन खिलजी ने वर्ष 1300 के दौरान रणथम्भोर के किले पर कब्जा करने की कोशिश की लेकिन ऐसा करने में विफल रहे। तीन असफल प्रयासों के बाद, उनकी सेना ने अंततः जुलाई 1301 में रणथंभौर किले पर कब्जा कर लिया था।

वर्ष 1305 में मालवा का अभियान किया। यहाँ का शासक महलदेव था जो मंत्री कोका प्रधान की सहायता से शासन  करता था।


खिलजी वंश का पतन

अलाउद्दीन खिलजी की मौत के बाद उसके सेनापति मलिक काफूर ने अलाउद्दीन के सबसे छोटे बेटे शिहाबुद्दीन उमर खिलजी 6 वर्ष की उम्र में शासक बना दिया, परन्तु सत्ता की सारी बागडोर मलिक काफूर के हाथ में ही थी।

मलिक काफूर ने अलाउद्दीन खिलजी की मौत के बाद उसकी विधवा पत्नी से शादी कर ली और बाद में उसके दो पुत्रों को अंधा कर के उसकी मां मल्लिका-ए-जहां के साथ ग्वालियर के किले में कैद करवा दिया। मलिक काफूर ने अलाउद्दीन ने एक और बेटे कुतुबुद्दीन मुबारक खिलजी को राजधानी सीरी के किले में कैद करवा दिया।

मुबारक खिलजी ने कैद में रहते हुए ही मलिक काफूर की हत्या करवा दी और अपने ही छोटे भाई शिहाबुद्दीन उमर खिलजी को अंधा बना कर कैद करवा दिया।

इसके बाद मुबारक खिलजी ने 1316 से लेकर 1320 ई. तक सफलतापूर्वक राज किया। मुबारक खिलजी अब मुबारक खां के नाम से जाना जाने लगा।

सत्ता हासिल होते ही मुबारक खां ने अलाउद्दीन खिलजी के कई नियमों को हटाकर राज्य में अपने नियम लागू किए।

मुबारक खां के वजीर (प्रधानमंत्री) खुसरो खां (नासिरुद्दीन खुसरोशाह) ने 1320 में उसकी हत्या कर खिलजी वंश का अंत कर दिया।

खुसरो खां दिन 12 दिन ही शासन कर सका। तुगलक वंश के प्रथम शासक गयासुद्दीन तुगलक ने उसकी हत्या कर दी और तुगलक वंश की स्थापना की।

खुसरु खान - Khusrau Khan


खुसरु खान 1320 में लगभग दो महीने के लिए दिल्ली का सुल्तान था। वह बारादु हिंदू सैन्य कबीले से संबंधित था, और 1305 में मालवा में अलाउद्दीन खिलजी की विजय के दौरान दिल्ली की सेना द्वारा कब्जा कर लिया गया था। बाद में उसे गुलाम के रूप में दिल्ली लाया गया, उसने धर्मपरिवर्तन किया। इस्लाम के लिए, और अलाउद्दीन के बेटे मुबारक शाह के समलैंगिक साथी बन गए। 1316 में सिंहासन पर चढ़ने के बाद, मुबारक शाह ने उन्हें "ख़ुसरु खान" की उपाधि दी, और उनका बहुत एहसान किया।


सैन्य अभियान:

ख़ुसरो ख़ान ने 1317 में देवगिरी पर सफल अभियान का नेतृत्व किया। अगले साल वारंगल को घेरने वाली सेना का भी नेतृत्व किया, जिसने काकतीय शासक प्रतापरुद्र को दिल्ली के लिए भुगतान करने के लिए मजबूर किया। 1320 में, उन्होंने बारादस के एक समूह का नेतृत्व किया और मुबारक शाह की हत्या करने के नसीरुद्दीन नाम के साथ सिंहासन पर बैठ गया। 

वर्ष 1320 में ही विद्रोही गुटों के एक समूह ने मलिक तुगलक के नेतृत्व में हटा दिया, जिन्होंने उन्हें सिंहासन पर बैठाया।

ग़ुलाम / मामलूक वंश - Gulam/Mamluk Dynasty (1206 -1290 )


गुलाम वंश की स्थापना कुतुब-उद-दीन ऐबक ने की थी। कुतुब-उद-दीन ऐबक मोहम्मद गौरी का गुलाम था, इस वजह से इस वंश को "गुलाम" या "मामलूक" वंश कहा गया। ऐबक वर्ष 1206 में मोहम्मद गौरी की मृत्यू के बाद दिल्ली का शासक बना।



गुलाम वंश के शासकों का क्रम :–

  1. कुतुब-उद-दीन ऐबक (1206-1210)
  2. आरामशाह (1210-1211)
  3. शम्सुद्दीन इल्तुतमिश (1211-1236)
  4. रुक्नुद्दीन फिरोजशाह (1236)
  5. रजिया सुल्तान (1236-1240)
  6. मुईज़ुद्दीन बहरामशाह (1240-1242)
  7. अलाउद्दीन मसूदशाह (1242-1246)
  8. नासिरुद्दीन महमूद शाह (1246-1265)
  9. गयासुद्दीन बलबन (1265-1287)
  10. अज़ुद्दीन कैकुबाद (1287-1290 )
  11. क़ैयूमर्स (1290)

कुतुबुद्दीन ऐबक (1206-1210)

कुतुबुद्दीन ऐबक कुत्त्बी तुर्क था, जो महमूद गौरी का गुलाम व दामाद था।

कुतुबुद्दीन ऐबक सिपहसालार या मालिक के रूप में 1206 को दिल्ली का शासक बना। इसने अपनी राजधानी लाहौर को बनाया। वर्ष 1208 में एक स्वतंत्र शासक बना।

कुतुबुद्दीन ऐबक को लाखबक्शा या हातिमताई, कुरान खाँ एवं चन्द्रमुखी की उपाधि दी गयी।

कुतुबुद्दीन ऐबक ने यलदोज (गजनी) को दामाद, कुबाचा (मुलतान + सिंध) को बहनोई और इल्तुतमिश को अपना दामाद बनाया ताकि गौरी की मृत्यु के बाद सिंहासन का कोई और दावेदार ना बन सके।

वर्ष 1210 में चौगान खेलते समय घोड़े से गिरकर इसकी मृत्यु हुई तथा इसे लाहौर में दफनाया गया था।

निर्माण:

इसने अपने गुरु कुतुबद्दीन बख्तियार काकी की याद में कुतुब मीनार की नींव रखी। निर्माण कार्य को दामाद इल्तुतमिश पूरा करवाया।

दिल्ली में स्थित कवेट-उल-इस्लाम मस्जिद और अजमेर का ढाई दिन का झोंपडा का निर्माण  कुतुबुद्दीन ऐबक ने ही करवाया था।

कवेट-उल-इस्लाम मस्जिद भारत में निर्मित पहली मस्जिद थी,  जिसे 27 हिंदू व जैन मंदिरों को तोड़कर बनाया गया था। 


आरामशाह (1210)

कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यू के बाद उनका पुत्र आरामशाह का शासक बना। आरामशाह के काबिल ना होने की वजह से दिल्ली के अमीरों ने इल्तुतमिश को दिल्ली के सिंहासन पर बैठने के लिए आमंत्रित किया। आरामशाह की हत्या कर इल्तुतमिश शासक बना। 



इल्तुतमिश (1210-1236)

(शम्शी वंश)

इल्तुतमिश इल्बारी जनजाति एवं शम्शी वंश का था। उसने दिल्ली में शम्शी वंश की स्थापना की।

कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु के बाद इल्तुत्मिश 1210 ई. में  दिल्ली के सिंहासन पर बैठा। दिल्ली का शासक बनने से पहले यह बनदायू का राजा था।

इल्तुतमिश को गुलाम वंश का वास्तविक संस्थापक कहा जाता हैं। इसने दिल्ली के सिंहासन पर बैठने के बाद राजधानी को लाहौर से दिल्ली स्थांतरित किया।

इल्तुतमिश को गुलामो का ग़ुलाम कहा जाता है क्योंकि यह कुतुबुद्दीन ऐबक का गुलाम था जो (कुतुबुद्दीन ऐबक) खुद भी महमूद गौरी का गुलाम था।

इल्तुतमिश प्रथम शासक था जिसने 1229 ई.में बगदाद के खलीफा से सुल्तान की वैधानिक उपाधि हासिल की।

इल्तुतमिश की मृत्यु 1236 ई. में हुई। उसने अपनी पुत्री रजिया को अपनी उतराधिकारी घोषित किया क्योंकि उसका बड़ा पुत्र महमूद पहले ही मारा जा चुका था।

परंतु तुर्को की व्यवस्ता के अनुसार कोई महिला उत्तराधिकारी नहीं हो सकती थी। इस वजह से इल्तुतमिश की पत्नी शाह तुरकाना के नेतृत्व में उसके छोटे पुत्र रुकनुद्दीन फिरोज को सुल्तान बनाया गया। परन्तु चालीसा ने रुकनुद्दीन को गद्दी पर बिठाया।


प्रशासन :

इल्तुतमिश इक्ता प्रथा और शुद्ध अर्बियन सिक्के चलाने वाला प्रथम शासक था। इसने सोने व चांदी के सिक्के चलाए जिसमें चांदी के सिक्कों को टंका और सोने के सिक्कों को जीतल कहा जाता था।

इसको तुर्क-ए-चिहालगानी का गठन किया, जो चालीस गुलामों का समूह था जो हमेशा साए की तरह इल्तुतमिश के साथ रहता था।

इत्ता प्रथा : इस प्रथा केे अंतर्गत सैनिको / राज्य आधिकारियों और कर्मचारियोंं को वेतन में रुपये, भूमि दी जाती थी। इक्ता प्रथा का अंत अलाउद्दीन खिलजी ने किया तथा फिर से राज्य कर्मचारियों को वेतन के रुप में नगद भुगतान फिर से शुरु किया।


निर्माण :

दिल्ली में स्थित नसीरुद्दीन का मकबरा इल्तुतमिश ने सुल्तान गोरही की याद में बनवाया था, यह मकबरा भारत में निर्मित प्रथम मकबरा था।


सुल्तान रुकनुद्दीन फिरोज  (1236)

रुकनुद्दीन फिरोज 1236 में अपनी माता शाह तुरकाना के संरक्षण में सुल्तान घोषित किया गया।

रुकनुद्दीन फिरोज के आलसी और विलासी प्रवृति होने के कारण कुछ ही महीनों के बाद जनता के विद्रोह के कारण रजिया सुल्तान को सुल्ताना बनाया गया।



रजिया सुल्तान (1236-40) 

रज़िया ने भाई रुकनुद्दीन को अपदस्थ करके सत्ता प्राप्त की। रज़िया ने पर्दा प्रथा त्यागकर पुरुषों की भाँती पोशाक धारण करके दरबार आयोजित किया। 

रजिया सुल्तान ने यकूट को अमीर- ए- आखुर तथा एतगीन को अमीर- ए- हाजिब की उपाधि दी।

कबीर खान को लाहौर तथा अल्तूनिया को तबरहिंद (आज का बठिंडा) का इक्तेदर बनाया।  

रज़िया ने मलिक याकूत को उच्च पद प्रदान किया। सुल्तान की इन सब गतिविधियों से अमीर समूह नाराज़ हुआ। रज़िया के शासनकाल में मुल्तान, बदायूं और लाहौर के सरदारों ने विद्रोह किया था। तत्पश्चात, रज़िया ने भटिंडा के गवर्नर अल्तुनिया से विवाह किया।

वर्ष 1240 में कैथल में रज़िया की हत्या कर दी गयी।



मुईज़ुद्दीन बहरामशाह (1240-42)

1240 में रजिया सुल्तान की हत्या के बाद रजिया सुल्तान का भाई मुइजुधिन बहराम शाह सुलतान बना।  

उसने सुल्तान की शक्तियों को कम करने के लिए "नाइब" या "नाइब-ए-मुमलिकत" नामक एक पद का सृजन किया तथा इस पद पर सर्वप्रथम मलिक इख्तियारुद्दीन ऐतगीन को नियुक्त किया गया। 

बहरामशाह के शासनकाल के दौरान 1241 ई. में भारत पर पहली बार तैर बहादुर के नेतृत्व में मंगोलों का पंजाब पर आक्रमण किया।

बहरामशाह द्वारा वजीर निज़ाम-अल-मुल्क के नेतृत्व में मंगोलों के विरुद्ध भेजी गई सेना का रुख दिल्ली की ओर कर दिया। बहराम शाह को बन्दी बना कर मई, 1242 ई. को उसकी हत्या करके बहराम शाह के पौत्र अलाउद्दीन मसूद शाह को सुल्तान बनाया गया।



अलाउद्दीन मसूद शाह (1242-46)

बहराम शाह की मृत्यु के बाद 1242 में फिरोज शाह का पुत्र मसूद शाह सिहासन पर बैठा।

मसूद शाह ने बलबन को अमीर- ए- हाजिब की उपाधि प्रदान की।



गयासुद्दीन बलबन (1265-1290)

गयासुद्दीन बलबन दिल्ली सल्तनत का नौवां सुल्तान था। वह 1266 में दिल्ली सल्तनत का सुल्तान बना। बलबन का असली नाम बहाउधिन था।

बलबन एक सरदार था, "तुर्कान ए चहलगानी" का। उसने सत्ता हासिल की और "तुर्कान ए चहलगानी" का दमन/अंत किया।

बलबन ने नासिरुद्दीन महमूद को सुल्तान बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया था। नासिरुद्दीन को सुल्तान बनाकर बलबन ने अधिकतर अधिकार अपने नियंत्रण में ले लिए थे।

नासिरुद्दीन महमूद ने गियासुद्दीन बलबन को उलूग खां की उपाधि दी थी।

बलबन के चार पुत्र थे सुल्तान महमूद, कैकुबाद, कैखुसरो और कैकआउस।

शासक बनने के बाद इसने सबसे पहले सेना का पुर्नगठन किया। सेना को दीवाने - ए- आरिज कहा जाता था।

नसीरुद्दीन ने बलबन को उलुग खां की उपाधि दी।

उसने सिजदा (दंडवत) तथा पाइबोस (कदम चूमना) की प्रथा प्रारंभ करवाई और ईरानी त्यौहार नौरोज भी मनवाया, और ईरानी त्यौहार नौरोज भी मनवाया।

आंतरिक विद्रोहों और मंगोलों के विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा उत्पन्न चुनौतियों से निपटने के लिए बलबन द्वारा कठोर, कठोर और हिंसक नीति अपनाई गई। इस नीति को रक्त और लोहे की नीति के रूप में जाना जाता है।



अन्तिम शासन

बलबन की मृत्यू के बाद उसका पोता कैकुबाद (Muiz ud din Qaiqabad) दिल्ली का शासक बना। इसने जलालुद्दीन खिलजी को कमांडर नियुक्त किया जिसने कैकुबाद और क्युमर्स की हत्या कर खिलजी वंश की स्थापना की।



दिल्ली सल्तनत काल - Delhi Sultanate

भारत में दिल्ली सल्तनत का काल 1206 ई. 1562 ई. तक रहा। मोहम्मद गौरी ने वर्ष 1194 ई. में चंदवार के युद्ध में विजय प्राप्त कर दिल्ली (भारत) का शासन कुतुब-उद-दीन ऐबक (Qutb al-Din Aibak) सौप कर गजनी वापस चले गया। वर्ष 1206 ई. में मोहम्मद गौरी की मृत्यू के बाद कुतुब-उद-दीन ऐबक दिल्ली का शासक बना, और इस प्रकार दिल्ली सल्तनत के पहले वंश "ऐबक" वंश की स्थापना हुई। चूंकि कुतुब-उद-दीन ऐबक एक गुलाम था, इस वजह से इस वंश को "गुलाम" या "मामलूक" वंश कहा गया।


भारत में दिल्ली सल्तनत के स्थापना का कारण :

अरब और मध्य एशिया में इस्लाम की स्थापना के परिणामस्वरूप जो धार्मिक और राजनीतिक परिवर्तन हुये, उस वजह से प्रसारवादी गतिविधियाँ बढ़ी। इस प्रसारवादी गतिविधियों के करण भारत में इस्लामिक हमले हुये। इन हमलो के परिणामस्वरूप दिल्ली सल्तनत की स्थापना हुई। वर्ष 1258 में हलाकु ख़ान ने जब बगदाद को तबाह कर दिया, तब इस्लाम को मानने वाले संतों, विद्वानों, साहित्यकारों और शासकों के लिये दिल्ली सल्तनत शरणस्थली बन गयी थी।


दिल्ली सल्तनत के 5 वंश :

  • मामलूक / ग़ुलाम वंश (1206 से 1290 ई.)
  • ख़िलजी वंश (1290 से 1320 ई.)
  • तुग़लक़ वंश (1320 से 1414 ई.)
  • सैय्यद वंश (1414 से 1451 ई.) 
  • लोदी वंश (1451 से 1526 ई.)


नारायणपुर जिला - Narayanpur District




नारायणपुर जिले की स्थापना 11 मई, 2007 को की गाई थी। यह पहले बस्तर जिला का हिस्सा था। यह प्रदेश का सर्वाधिक वर्षा वाला क्षेत्र है। छत्तीसगढ़ सर्वोत्तम सागौन इस जिले के खुर्सेल घाटी में पाया जाता है। अबूझमाड़ीया विकास प्राधिकरण नारायणपुर जिले में ही स्थित है।

परलकोट विद्रोह:

1824 ई. में नारायणपुर तहसील के परलकोट के जमींदार गेंद सिंह ने अंग्रेजो और मराठो के खिलाफ विद्रोह किया था जिसे परलकोट विद्रोह के नाम से जाना जाता है और इसके बाद छत्तीसगढ़ में अनेक विद्रोह हुए।  पुर्ण पढ़ें

टाईगर किड:

टाईगर किड के नाम से मसहूर चेन्दरू भी नारायणपुर जिले से ही है। चेन्दरू ने एक अन्ग्रेजी फिल्म साशा में काम किया था। चेन्दरू माड़िया जनजाति से थे, जो बचपन से ही बाघो के बिच रहे थे।

पर्यटन:

खुर्सेल/खुरसेल जलप्रपात, छोटी डोंगर, ओरछा, मिलकुलवाड़ा आदि।

नदियां:

माड़िन, गुडरा, निबरा, कोटरी

छत्तीसगढ़ के जिलें :


बालोद जिला- Balod District



बालोद जिले का गठन 1 जनवरी 2012 को किया गया था। यह पहले दुर्ग जिले का हिस्सा था। बालोद शहर तंदुला (आदमाबाद) डैम के समीप है, जिसका निर्माण सूखा एवं तानदूला नदी पर 1912 में किया गया था।

सिंचाई परियोजना :

तानदुला, खरखरा एवं गोँदली डैम।

पर्यटन स्थल:

गंगा मैया मंदिर : यह मंदिर बालोद तहसील में बालोद-दुर्ग रोड के पास झलमला में स्थित है।

सियादेवी मंदिर : यह मंदिर गरूर-धमतरी मार्ग पर स्थिर गांव सांकरा से करीब 6 किलोमीटर की दुरी पर नारागांव में स्थित है। यहाँ एक प्राकृतिक झरना भी है जिसे सियादेवी झरना कहते है।

तेन्दुला बाँध : यह बाँध बालोद से 5 किमी की दूरी पर स्थित है।

छत्तीसगढ़ के जिलें :


घनश्याम सिंह गुप्त - Ghanshyam Singh Gupt

घनश्‍याम सिंह गुप्‍त का जन्‍म 22 दिसंबर, 1885 को छत्तीसगढ़ के दुर्ग में हुआ था। इन्होने जबलपुर के राबर्टसन कॉलेज से बीएससी (गोल्ड मेडल के साथ) वर्ष 1906 में और वर्ष 1908 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एल.एल.बी. की पढ़ाई पुरी की। 13 जून 1976 को उनका निधन हुआ।

राजनीति:

वर्ष 1915 में मध्य प्रांत एवं बरार के प्रांतीय परिषद के सदस्य चुने गए। 1923 से 1926 सेंट्रल प्रोविंस एंड बरार विधानसभा के निर्विरोध सदस्य निर्वाचित हुए, 1927-1930 के कार्यकाल में भी निर्वाचित हुए और प्रदेश विधान सभा के कांग्रेस दल के नेता चुने गए। इस बीच आप सन् 1926 में दुर्ग नगर निगम के भी अध्यक्ष निर्वाचित हुए थे। वर्ष 1930 में दिल्ली के सेंट्रल असेंबली सदस्‍य के लिए हुए चुनाव में आप सदस्‍य निर्वाचित हुए जहां सन् वे 1937 तक सदस्‍य रहे। वर्ष 1933 में गांधी जी जब दुर्ग आए तब इनके घर में ठहरे थे 31 अप्रेल 1937 से 1952 तक सीपी और बेरार (CP & Berar) के विधान-सभा अध्‍यक्ष रहे। सन् 1939-50 - संविधान सभा में संविधान के हिन्‍दी ड्राफ्ट कमेंटी के अध्‍यक्ष रहे। 24 जनवरी, 1950 को घनश्याम सिंह गुप्त नें संविधान के हिन्दी अनुवाद की प्रति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के समक्ष प्रस्तुत की।



फूलबासन बाई यादव - Phoolbasan Bai Yadav

जन्म : 5 दिसम्बर, 1969

फूलबासन बाई यादव एक भारतीय सामाजिक कार्यकर्ता और गैर सरकारी संगठन, माँ बम्लेश्वरी जनहित कारी समिति की संस्थापक हैं, जो छत्तीसगढ़, भारत की आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़ी महिलाओं के विकास के लिए अपने प्रयासों के लिए जानी जाती हैं। उन्हें भारत सरकार द्वारा 2012 में चौथे सर्वोच्च भारतीय नागरिक पुरस्कार "पद्म श्री" से सम्मानित किया गया था। वह विज़न इंडिया फाउंडेशन के संरक्षक के रूप में भी काम करती हैं।

जिवन एवं शिक्षा :

फूलबासन बाई यादव का जन्म एक सामाजिक रूप से पिछड़े परिवार में 5 दिसंबर 1969 को छत्तीसगढ़ के राजनांदगाँव जिले में एक दूरस्थ गाँव सुकुलदैहान में हुआ था। केवल 10 वर्ष की उम्र में उनकी शादी कर दी गई  थी,  और उन्होने केवल सातवीं कक्षा तक शिक्षा प्राप्त की।

2001 में 10 महिलाओं के साथ स्व सहायता समूह की शुरुआत की थी। उन्होंने दो रुपये और दो मुट्ठी चावव से महिला समूह का काम शुरू किया. आज इस महिला समूह से दो लाख महिलाएं जुड़ गई हैं।

सोर्स : News18



छत्तीसगढ़ में भारिया जनजाति - Bharia Tribe In Chhattisgarh



भारिया द्रविड़ियन प्रजाति के आदिम लोग हैं। इस जनजाति का विस्तार क्षेत्र मुख्यतः मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ राज्य है। यह जनजाति छत्तीसगढ़ में कोरबा, बिलासपुर एवं जांजगीर जिले में फैली हुई है। ये 

उत्पत्ति
भारिया जनजाति की उत्पत्ति के संबंध यह मान्यता है कि जब पांडवो को वनवास हुआ था तब पांडव अपनी कुटिया का निर्माण भारू नामक घास से करते थे , पांडव पांच भाई थे कौरव सैकड़ो भाई थे। इसलिए महाभारत युद्ध में पाँच पाण्डवों द्वारा सैकड़ो कौरवों को पराजित करना मुश्किल था। तब अर्जुन ने भारू नामक घास को हाथों में लेकर उसकी मानव मूर्ति बनाया एवं उसे मंत्र - शक्ति द्वारा जीवित किया जिन्होंने कौरवों से युद्धकर उन्हें परास्त किया। यह मानव ही भारिया कहलाए। 

मूल स्थान एवं छत्तीसगढ़ आगमन: 
भारिया जनजाति अपना मूल निवास स्थान बांधवगढ़ को मानते हैं। बांधवगढ़ के महाराजा कर्णदेव भारिया वंश के थे। वर्ष 1857 की क्रांति के दौरान अंग्रेजों ने राजा संग्रामसाय को जबलपुर में फांसी पर चढ़ा दिया गया। इसके बाद भारिया लोगो पर अंग्रेजो की प्रताड़ना बड़ गई। महाराजा संग्रामसाय की मृत्यु के पश्चात् भारियाजन अपने आप को निराधर पाकर कुछ भारियाजन विंध्य पर्वत होते हुए सिवनी , नरसिंहपुर , जबलपुर , छिंदवाड़ा के आसपास के घने जंगलों में बस गए एवं कुछ भारियाजन शहडोल , पेंड्रा व छुरी - कोरबा के आसपास के घने जंगलों में बस गए। 

कलचुरिकालीन शासन व्यवस्था - छत्तीसगढ़


छत्तीसगढ़ ( महकोसल ) क्षेत्र में कलचुरीयो ने जो शासन व्यवस्था सुरुवात में स्थापित की थी उसे त्रिपुरी से पृथक होने के बाद स्थानिय आवश्यकतानुसार विकसित किया गया। कलचुरी शासक कल्याण साय के शासन काल के दौरान लिखी पुस्तिका के अनुसार वर्ष 1868 में चिशम ने कलचुरि शासन प्रबंधन पर एक लेख लिखा।

कलचुरि शासन प्रबंध
प्रशासनिक व्यवस्था - शासन प्रबंधन के लिये मंत्रियों एवं अन्य अधिकारोयो की नियुक्ति की जाती थी। 
राज्य -> राष्ट्र ( संभाग ) -> विषय ( जिला ) -> देश/जनपद ( तहसील ) -> मंडल ( खंड )
सम्पुर्ण राज्य प्रशासनिक सुविधा के लिये गढ़ो में तथा गढ़ ताल्लुको/ बरहो में विभाजित होते थे। गांव के प्रमुख को गौटिया कहा जाता था। राजा के अधिकारियों की नियुक्ति योज्ञता के अनुसार होता था, केवल लेखक एवं ताम्रपत्र लिखने वाले पद परम्परा के अनुसार होता था ।
12 ग्राम - 1 बरहा - प्रमुख 'दाऊ' होता था।
84 ग्राम ( 7 बरहा ) - 1 गढ़ - प्रमुख दिवान होता था।

मन्त्री मंडल -
महासंधिविग्रहक - विदेश मन्त्री
महापुरोहित - राजगुरु
जमाबंदी मन्त्री - राजस्व मन्त्री

अधिकरी एवं कर्मचारी -
अमात्य - विभाग प्रमुख
महाध्यक्ष - सचिवालय प्रमुख

महासेनापति - सैन्य प्रशासन
साधिन - सर्विच्च सैन्य अधिकरी
महापीलुपति - हस्ति सेना प्रमुख ( हांथी)
महाश्वसाधनिक - अश्वसेना प्रमुख

दण्डपाषिक - पुलिस अधिकरी ( जुर्माना वसुली भी इनकी जिम्मेदारी थी।)
दुष्ट-साधक - चोर पकड़ने वाला
नोट: दान किये गये गांव मे इनका प्रवेश वर्जित था, किन्तु राज द्रोह के मामले में ये कहीं भी जा सकते थे।

महाकोट्टपाल - दुर्ग/किले की रक्षा करने वाला
चाट, भट, पिशुन, वेतृक - गांव का दौरा करने वाले
महाप्रमात्र - राजस्व प्रमुख ( भूमि की माप कर के राजस्व निर्धारण )
शोल्किक - कर वसुली करने वाला
दन्डिक - न्याय अधिकारी
पुरोहित - धर्म विभाग प्रमुख
धर्म लेखी - दानपात्रो का लेखा-जोखा
गमागमिक  - यातायात प्रबंधन

स्थानिय प्रशासन -
स्थानिय प्रशासन के लियें गांवो एवं नगरो में पाँच सदायों की 'पंचकुल' नामक संस्था होती थी। पंचकूल के प्रमुख अधिकारी को नगरो में 'पुर प्रधान' एवं ग्रामो में 'ग्राम कुट' या 'ग्राम भोगिक' कहा जाता था।

आय के श्रोत -
कलचुरि काल में खान कर ( लोहा, खनिज), नमक कर, वन चरागाह, आयत-निर्यात कर आदि कर लिये जाते थे। मंडी में सब्जी बचाने के लिये 'युगा' नामक परमिट लेना होता था।

समाजिक स्थिति -
वर्ण व्यवस्था का अस्तित्व तो था, परंतु नियम कठोर नहीं थे। लेखो में शूद्र का उल्लेख नहीं मिलता है।