छत्तीसगढ का राष्ट्रपति भवन


भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद आजादी की लडाई के दौरान क्रांतिकारी की भूमिका में काम कर रहे थे, उस दौरान अंग्रेज पुलिस उन्हें तलाश रही थी और वे उनसे बचने के लिए सरगुजा के इस इलाके में पंडो आदिवासियों के गांव में आकर छिपे थे। गांव में करीब दो साल रहे और इस दौरान एक शिक्षक के रूप में कार्य किया।

राष्ट्रपति बनने के बाद डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का छत्तीसगढ़ आगमन वर्ष 1952 में हुआ। छत्तीसगढ आने पर उन्होंने सरगुजा में उन्हीं आदिवासियों के बीच जाकर कुछ समय रहने की इच्छा जाहिर की। 22 नवंबर, 1952 को वे तत्कालीन सरगुजा महाराजा रामानुजशरण सिंहदेव के साथ पण्डो ( पण्डो ग्राम पंचायत ) पहुंचे। यहां राष्ट्रपति के प्रवास के लिए यह भवन तैयार किया गया था। इसी भवन में डॉ राजेन्द्र प्रसाद रहे और पंडो व कोरवा जनजाति के आदिवासियों को अपना दत्तक पुत्र घोषित किया।

इस भवन को "राष्ट्रपति भवन" नाम दिया गया है।

भारत में कंप्यूटर का इतिहास - History Of Computer In India



1952 में भारत में कंप्यूटर युग की शुरुआत भारतीय सांख्यिकी संस्थान (Indian Statistical Institute) कोलकाता से हुई। इस आईएसआई में वर्ष 1954 में भारत का पहला स्वदेशी इलेक्ट्रिक एनालॉग कंप्यूटर ( an indigenous electronic analog computer) बनाया गया था। इसे वैज्ञानिक और गणितज्ञ समरेंद्र कुमार मित्रा (Samarendra Kumar Mitra) और उनके साथियों ने बनाया था। यह कंप्यूटर 10 X 10 की मैट्रिक्स को हल कर सकता था। 

वर्ष 1956 में भारत के आईएसआई ( ISI ) कोलकाता में भारत का प्रथम इलेक्ट्रोनिक डिजिटल कंप्यूटर HEC – 2M स्थापित किया गया जिसे ब्रिटेन में बनाया गया था। इसके साथ भारत जापान के बाद एशिया का दूसरा ऐसा देश बन गया, जिसने कंप्यूटर तकनीक को अपनाया था।

TIFRAC (Tata Institute of Fundamental Research Automatic Calculator) : 
यह पहला कंप्यूटर था जिसका निर्माण भारत में किया गया था। सुरुवात में TIFRAC एक पायलट मशीन था, जिसकी सुरुवात 1955 में की गयी थी। इस मशीन का निर्माण 1955 में सुरु हुआ और 1960 में इसे औपचारिक साधिकार (commissioned) किया गया। वर्ष 1965 तक इस कंप्यूटर इस्तेमाल होता रहा।

ISIJU :
इस कंप्यूटर को दो संस्थाओं भारतीय सांख्यिकी संस्थान (Indian Statistical Institute) और कोलकाता की जादवपुर यूनिवर्सिटी (Jadavpur University) ने मिल कर तैयार किया था। इसी कारण इसे ISIJU नाम दिया गया। ISIJU एक ट्रांजिस्टर युक्त कंप्यूटर था। इसका निर्माण 1966 में किया गया था।

कंप्यूटर सोसायटी ऑफ इंडिया ( Computer Society of India ) :
कंप्यूटर सोसायटी ऑफ इंडिया भारत में कंप्यूटर पेशेवरों का पहला और सबसे बड़ा निकाय है। यह कुछ कंप्यूटर पेशेवरों द्वारा 6 मार्च 1965 को शुरू किया गया था और अब यह कंप्यूटर पेशेवरों का प्रतिनिधित्व करने वाला राष्ट्रीय निकाय बन गया है।

डिपार्टमेंट ऑफ इलेक्ट्रॉनिक्स (Department of Electronics) :
वर्ष 1970 में भारत में डिपार्टमेंट ऑफ इलेक्ट्रॉनिक्स की शुरुआत हुई जिसका मकसद सार्वजनिक क्षेत्र में कंप्यूटर डिविजन की नीव रखना था। वर्ष 1978 में IBM के अलावा दूसरी प्राइवेट सेक्टर की कंपनियों ने भारत में कंप्यूटर बनाना शुरू किया।

सेंटर फॉर दी डेवेलपमेंट ऑफ टेलीमैटिक्स (C-DOT) :
तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के एडवाइजर सैम पिटोदा ने सेंटर फॉर दी डेवेलपमेंट ऑफ टेलीमैटिक्स C-DOT लॉन्च किया। इसकी शुरुआत 1984 में की गई जिसका मकसद डिजिटल एक्सचेंज का डिजाइन और डेवलपमेंट करना था। बाद में इसका विस्तार किया गया और अब यह सरकार की एक बॉडी है जो इंटेलिजेंट कंप्यूटर सॉफ्टवेयर ऐप्लिकेशन बनाने का काम करती है।

परम सुपर कंप्यूटर ( Param Super Computer ) :
भारत के द्वारा वर्ष 1980 में अमरिकी कंपनी से सुपर कंप्यूटर खरीदने के प्रयास में असफल होने के बाद वर्ष 1988 में डिपार्टमेंट ऑफ इलेक्ट्रॉनिक्स और इसके डायरेक्टर डॉ विजय भटकर की अगुवाई में सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस्ड कंप्यूटिंग (C-DAC) की स्थापना पुणे में की। सीडैक को 3 साल का शुरुआती समय दिया गया और सुपर कंप्यूटर को डेवलप करने के लिए 30 करोड रुपए की शुरुआती फंडिंग की गई। यह लगभग उतना ही समय और पैसा था जोकि अमेरिका से सुपर कंप्यूटर Cray को खरीदने में लगने वाला था। 
C-DAC के वैज्ञानिकों ने जी जान लगा कर वर्ष 1990 में सुपर कंप्यूटर का प्रोटोटाइप मॉडल बना लिया गया और 1990 में ज्यूरिख में हुए सुपर कंप्यूटिंग शो में यह कंप्यूटर एक बेंच मार्क बनकर उभरा। भारत द्वारा बनाए गए परम 8000 के प्रोटोटाइप ने सुपर कंप्यूटिंग शो में दुनिया के लगभग सभी देशों के कंप्यूटर्स को पीछे छोड़ दिया और अमेरिका के बाद दूसरे नंबर पर काबिज हो गया। इसके बाद 1 जुलाई, 1991 में सामने आया PARAM 8000 सुपर कंप्यूटर। यह भारत का अपना खुद का बनाया सुपर कंप्यूटर था। परम शब्द संस्कृत भाषा से लिया गया है जिसका मतलब होता है "सबसे ऊपर"।

गोधन न्याय योजना - Godhan Nyay Yojna


शुभारंभ : 21 जुलाई 2020
छत्तीसगढ़ सरकार के द्वारा गोपालकों को लाभ दिलाने के उददेश्य से गोधन न्याय योजना लाई गयी। इस योजना में सरकार गोपालकों से गोबर खरीदेगी। 

इसका इस्तेमाल एक ओर जहां सड़क पर आवारा घूम रहे पशुओं को रोकने में होगा, वहीं गोबर से वर्मी कंपोस्ट खाद बनाई जाएगी। इसे बाद में किसानों, वन विभाग और उद्यानिकी विभाग को दिया जाएगा। 

गोबर खरीदी की शुरुआत गाेधन न्याय योजना के तहत सरकार 21 जुलाई को हरेली त्योहार के दिन से करेगी। छत्तीसगढ़ देश का पहला राज्य होगा जो गोबर की खरीद करेगा। 

गोबर की खरीदी निर्धारित दरो पर होगी। दर का निर्धारण पाँच सदस्यीय मन्त्री मण्डल के ऊप समिति के द्वारा किया जयेगा। इससे बने वर्मी कम्पोस्ट को सहकारी समितियों के द्वारा बेचा जयेगा। 

जुड़वासन तिहार Judwasan Tihar


जुड़वासन तिहार ( त्योहार ) छत्तीसगढ़ में आषाढ़ अमावस्या में मनाया जाता है। यह छत्तीसगढ़ का एक पारंपरिक त्योहार है। इस त्योहार में लोग बैगे की अगुआई में गांव के सीतल माता की पुजा पुरे विधि-विधान से करते है। पुजा में सेवा गीत भी गाया जाता है। लोग इसमे माता को चावल अर्पण करते है। 

कहि देबे संदेश - kahi debe sandesh



कही देबे सन्देश ( kahi debe sandeah) यह छत्तीसगढ़ी भाषा में बनी पहली फ़िल्म है जिसका निर्देशन मनु नायक ने किया। यह फ़िल्म "अन्तरजातीय प्रेमकहानी" और "छूआछूत विरोध" पर आधारित है। अन्तरजातीय प्रेमकहानी होने की वजह से फिल्म को विरोध का भी सामना करना पड़ा। फिल्म को तत्कलीन मध्यप्रदेश सरकार ने टैक्स फ्री कर दिया जिससे फिल्म को काफी प्रोत्साहन मिला।

कलाकार :
नायक - कान मोहन
नायिका - उमा
गायक - मोहम्मद रफी, महेंद्र कपूर, सुमन कल्याणपुर व मीनू पुरुषोत्तम ने स्वर दिए। रफी साहब ने दो गाने "झमकत नदिया हिनी लागे परबत मोर मितान(दोस्त)" तथा तोर पैरी (पायल)के झनर-झनर।
संगीतकार - मलय चक्रवर्ती 
गीतकार - डा.एस.हनुमंत नायडू 

निर्माण :
सम्पुर्ण फिल्म का निर्माण 27 दिनो में करीब सवा (1.25) लाख रुपए की लागत में हुआ था। फिल्म के अधिकांस भाग की शुटिंग वर्तमान बलौदाबाजार जिले के पलारी ग्राम में की गयी थी।16 अप्रैल 1965 को रायपुर, भाटापारा, बिलासपुर में फिल्म को प्रदर्शित किया गया था।



करमगोगा/कर्मगोगा जलप्रपात- Where is karamgoga Waterfall


करमगोगा/कर्मगोगा जलप्रपात ( karamgoga Waterfall ) छत्तीसगढ़ ( Chhattisgarh) के कोरिया जिले के मनेंद्रगढ़ से करीब 10 किलोमीटर की दुरी पर पहाड़ और जंगल से घिरा हुआ एक पिकनिक स्पॉट है। यह जलप्रपात स्थानिय लोगो के बिच काफी लोकप्रिय है। यहाँ लोग छुट्टियों में अपना समय बिताने पहुचते है। यहाँ एक मन्दिर भी है जो आस्था का केंद्र है।

यह जलप्रपात मैसमी है, इस वजह से इसका आनंद लेने का सही समय अक्टूबर और दिसंबर के मध्य है क्यो की बरसात मे रास्ता काफी दुर्गम हो जाता है।

इन्हे भी देखें:

बिरहोर जनजाति - Birhor Tribe


बिरहोर छत्तीसगढ़ की एक विशेष संरक्षित जनजाति है। इनका निवास छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में है। बिरहोर का अर्थ स्थानिय भषा में "जंगल में घूमने वाला" है, बिर- जंगल, होर- घूमने वाला।

इनमे युवा गृह का भी प्रचलन है जिसे "गितियोना" कहा जाता है। इन पर एस.सी राय ने "द बिरहोर" नामक पुस्तक भी लिखी है।

इनकी जनसंख्या काफी कम ( करीब 3000) है इस वजह से इन्हे विशेष संरक्षित जनजाति की श्रेणी में रखा गया है।

इन्हे भी देखें:

महेंद्र कर्मा - Mahendra karma

जन्म : 5 अगस्त 1950 
मृत्यू : 25 मई 2013

महेंद्र कर्मा छत्तीसगढ़ राज्य के एक राजनीतिज्ञ थे। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से संबंधित एक भारतीय आदिवासी नेता थे। वे बस्तर टाइगर के नाम से मशहूर थे। वर्ष 2013 में झिरम घाटी हमले में उनकी मृत्यू हो गई। वर्ष 2020 में बस्तर की सबसे बडी शैक्षणिक संस्था बस्तर विश्वविद्यालय का नाम "शहीद महेन्द्र कर्मा" कर दिया गया।

राजनीतिक जीवन:
वर्ष 2000 से 2004 में राज्य गठन के बाद से अजीत जोगी कैबिनेट में उद्योग और वाणिज्य मंत्री थे। वर्ष 2004 से 2008 तक छत्तीसगढ़ विधानसभा में विपक्ष के नेता थे। 2005 में, उन्होंने छत्तीसगढ़ में माओवादी समूह नक्सलियों के खिलाफ सलवा जुडूम आंदोलन के आयोजन में एक शीर्ष भूमिका निभाई। 

मृत्यू:
नक्सलियों द्वारा 25 मई 2013 को सुकमा में उनकी पार्टी द्वारा आयोजित एक परिनिर्वाण रैली बैठक से लौटते समय झिरम घाटी में हमला कर हत्या कर दी गई।

चारधाम परियोजना - Chardham pariyojana

चारधाम परियोजना (Chardham pariyojana) प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा इस परियोजना का उद्घाटन दिसम्बर 2016 में किया गया था।

मुख्य बातें :
  • परियोजना में लगभग 12,000 करोड़ रुपए की लागत आयेगी।
  • चारधाम परियोजना में केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री को जाने वाले 889 किलोमीटर के राष्ट्रीय राजमार्गों के चौड़ीकरण एवं मरम्मत कार्य शामिल है।
  • तकरीबन 889 किमी. की अनुमानित लंबाई वाली प्रतिष्ठित ‘चारधाम परियोजना’ के तहत BRO, 250 किलोमीटर लंबे राष्ट्रीय राजमार्ग का निर्माण कर रहा है जो तीर्थस्थल गंगोत्री और बद्रीनाथ की ओर जाएगा।
  • BRO को लगभग 3000 करोड़ रुपए की लागत वाले 251 किलोमीटर लंबे खंड सौंपे गए हैं जिनमें 28 किमी. से 99 किलोमीटर तक की लंबाई वाले ऋषिकेश-धरासू राजमार्ग (NH-94), 110 किलोमीटर की लंबाई वाले धरासू-गंगोत्री राजमार्ग (NH-108) और 42 किलोमीटर की लंबाई वाले जोशीमठ से ‘माना राजमार्ग’ (NH-58) पर 17 परियोजनाएँ शामिल हैं।

चंबा सुरंग Chamba Tunnel

चंबा सुरंग (Chamba Tunnel) उत्तराखण्ड के ऋषिकेश- धरासू रोड़ पर व्यस्त चंबा कस्बे के नीचे 440 मीटर लंबी सुरंग है। इसका काम जनवरी 2019 में शुरू किया, लेकिन सुरक्षा चिंताओं और क्षतिपूर्ति मुद्दों के कारण दक्षिण छोर पर अक्टूबर 2019 के बाद ही काम शुरू हो सका। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री ने 26 मई, 2020 को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से चारधाम परियोजना (Chardham Pariyojana) के तहत ‘चंबा सुरंग’ (Chamba Tunnel) का उद्घाटन किया। 

नोट:सुरंग जनवरी 2021 में पूरा होने की निर्धारित तिथि से लगभग तीन महीने पहले अक्तूबर 2020 तक यातायात के लिए तैयार हो जाएगी।  

मुख्य बातें:
सीमा सड़क संगठन (Border Roads Organisation- BRO) ने ऋषिकेश-धरासू राजमार्ग (NH-94) पर व्यस्त चंबा शहर के नीचे 440 मीटर लंबी सुरंग का निर्माण किया है।
BRO प्रतिष्ठित चारधाम परियोजना में एक महत्त्वपूर्ण हितधारक है और ‘टीम शिवालिक’ ने इस सुरंग के निर्माण में सफलता हासिल की है। 

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