बिहार की साक्षरता दर - जिलों के साथ



वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार बिहार की साक्षरता दर 61.8% है। इसमें से पुरुष साक्षरता 71.2% और महिला साक्षरता 51.8% है। 

भारत की राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) की रिपोर्ट में बिहार कम साक्षरता दर वाले राज्यों में तीसरे स्थान पर है। बिहार 70.9 फीसदी समग्र साक्षरता दर के साथ राष्ट्रीय औसत (77.7 फीसदी) से 6.8 फीसदी पीछे है।


2011 जनगणना के अनुसार जिलों का क्रम

जिलासाक्षरता दर प्रतिशतजिलासाक्षरता दर प्रतिशत
रोहतास73.33लखीसराय62.42
पटना70.68समस्तीपुर61.86
भोजपुर70.47जमुई59.79
मुंगेर70.46नवादा59.76
औरंगाबाद70.32मधुबनी58.62
बक्सर70,14बांका58.17
सिवान69.45खगड़िया57. 92
कैमूर69.34सुपौल57.67
अरवल67.43दरभंगा56.56
जहानाबाद66.80पूर्वी चंपारण55.79
वैशाली66.60किशनगंज55.46
सारण65.96शिवहर53.78
गोपालगंज65.47अररिया53.53
नालंदा64,43सहरसा53.20
बेगूसराय63.87मधेपुरा52.25
शेखपुरा63.86कटिहार52. 24
गया63.67सीतामढ़ी52.05
मुजफ्फरपुर63.43पूर्णिया51.08
भागलपुर63,14



राजिम - गरियाबंद : Rajim Gariyaband



'राजिम' छत्तीसगढ़ का प्रसिद्ध तीर्थ स्थाल है। यह पवित्र स्थान हिन्दुओं की आस्था का केंद्र है। राजिम, रायपुर से करीब 45 किलोमीटर की दुरी पर गरियाबंद जिले में स्थित है। यहाँ का माघ पूर्णिमा का मेला पूरे भारत में प्रसिद्ध है।




राजिम के देवालय:

राजिम के देवालय ऐतिहासिक, पुरातात्विक और धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। यह पंचायतन शैली का उदहारण है। इन्हें इनकी स्थिति के आधार पर चार भागों में बांटा गया है। 
  • पश्चिमी समूह: कुलेश्वर (9वीं सदी), पंचेश्वर (9वीं सदी) और भूतेश्वर महादेव (14वीं सदी) के मंदिर। 
  • मध्य समूह: राजीव लोचन (7वीं सदी), वामन, वाराह, नृसिंह बद्रीनाथ, जगन्नाथ, राजेश्वर एवं राजिम तेलिन मंदिर। 
  • पूर्व समूह: रामचंद्र (8वीं सदी) का मंदिर। 
  • उत्तरी समूह: सोमेश्वर महादेव का मंदिर।

कुलेश्वर महादेव मंदिर- Kuleshwar Mahadev :

यह मंदिर महानदी और पैरी के संगम मे, नदी के बिच में स्थित है। कहा जाता है कि जिस जगह मंदिर स्थित है, वहां कभी वनवास काल के दौरान मां सीता ने देवों के देव महादेव के प्रतीक रेत का शिवलिंग बनाकर उसकी पूजा की थी। 
वर्ष 1967 में राजिम में जब बाढ़ आई थी तब यह मंदिर पूरा डूब चुका था, परन्तु मंदिर को कोई नुकसान नहीं हुआ। इस मंदिर के शिवलिंग की मूर्ति में पैसा डालने से वह नीचे चला जाता है और की प्रतिध्वनि गूंजित होती है।


बेलहारी - Belhari :

राजिम में कुलेश्वर से थोड़ी दूरी पर दक्षिण की ओर लोमश ॠषि का आश्रम है। यहां बेल के बहुत सारे पेड़ हैं, इसीलिए यह जगह बेलहारी के नाम से भी जानी जाती है। महर्षि लोमश ने शिव और विष्णु की स्थापित करते हुए हरिहर की उपासना का महामन्त्र दिया है।  कुलेश्वर महादेव की अर्चना राजिम में आज भी इसी शैली में हुआ करती है।


रामचन्द्र मंदिर - Ramchandra Temple :

राजिम में राजीवलोचन मन्दिर से थोड़ी दूर पर पूर्व दिशा में रामसीता मन्दिर स्थित है। यह मन्दिर रतनपुर के कलचुरी नरेशों के सामन्त जगतपाल के द्वारा 12 वीं शताब्दी में बनवाया गया था।


इतिहास :
मंदिर का निर्माण नल वंशी शासक विलासतुंग केे काल मेें 712 ई. में कराया गया था। 
राजिम का प्रथम ऐतिहासिक दस्तावेजीकरण अंग्रेज अधीक्षक रिचर्ड जेंकिन्स ने वर्ष 1825 में किया था। वर्ष 1869 में एक और अंग्रेज पुरातत्ववेता जे. डी. बेग्लर और वर्ष 1882 में सर एलेग्जेंडर कनिंघम राजिम की यात्रा कर शोधपत्र प्रकाशित किये थे। वर्ष 1898 में पं सुंदरलाल शर्मा जी ने "श्रीराजीवक्षेत्रमहात्मय" नामक पद्य ग्रन्थ लिखा था, जिसका प्रकाशन वर्ष 1915 में हुआ था। इस ग्रन्थ में राजिम भक्तिन का संक्षेप में उल्लेख है।
इतिहासकारों के अनुसार राजा जगतपाल ने रामचंद्र मंदिर का निर्माण कराया था, जिसका शिलालेख वर्तमान राजिमलोचन मंदिर में है।





सुरेंद्र दुबे (Surendra Dubey)



सुरेंद्र दुबे (Surendra Dubey) का जन्म 8 जनवरी 1953 को भारतीय राज्य छत्तीसगढ़ में दुर्ग के बेमेतरा में हुआ था। वे छत्तीसगढ़ के प्रशिद्ध व्यंग्यवादी और लेखक हैं। वह पेशे से एक आयुर्वेदिक चिकित्सक भी हैं। उन्होंने पांच किताबें लिखी हैं। उन्होंने कई मंचो और टेलीविजन शो पर अपनी प्रतिभा से लोगो का मन मोह लिया है।


सुरेंद्र दुबे "छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग" के प्रथम सचिव थे।


पुरष्कार एवं सम्मान:

उन्हें भारत सरकार द्वारा 2010 में, देश के चौथे उच्चतम भारतीय नागरिक पुरस्कार पद्म श्री से सम्मानित किया गया था।वह 2008 में काका हाथ्री से हसया रत्न पुरस्कार के भी प्राप्तकर्ता हैं।

राजपुर ( बस्तर ) - Rajpur ( Bastar )

राजपुर, छत्तीसगढ़ में बस्तर विकासखंड अंर्तगत नारंगी नदी किनारे स्थित एक ग्राम पंचायत है। यहाँ नागवंशी शासको से संबंधित महल के भग्नावशेष मिले है।


गांव के बाहर जंगलों में करीब करीब दो एकड़ में महल के अवशेष बिखरे पड़े हैं। स्थानीय ग्रामीण इसे छेरकीन महल भी कहते हैं। महल के सामने भव्य प्रवेश द्वार आज भी स्थित है।


इतिहास :

वर्ष 1065 ई. का राजपुर अभिलेख यह प्रमाणित करता है कि नागवंशी बोदरागढ़ नरेश मधुरांतक देव का आधिपत्य इस क्षेत्र पर था। उसने नरबलि के लिए राजपुर नामक गांव माणिकेश्वरी देवी मंदिर को अर्पित किया था। जब यहां चालुक्य राजाओं का आक्रमण हुआ तो उस दौर के राजा-रानी की महल में हत्या कर दी गई थी।वर्ष 1774 तक यहां चालुक्य राजाओं का कब्जा रहा। इसके बाद इस क्षेत्र में नागपुर के भोंसले का अधिपत्य हो गया।


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News18

बिजाकसा जलप्रपात – Bijakasa Waterfall

बिजाकसा जलप्रपात छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में स्थित है। यह जिला मुख्यालय से करीब 50 किलोमीटर की दूरी पर चित्रकोट मार्ग पर रतेंगा से करीब 2 किलोमीटर सघन वन के बीच स्थित है। 


यह एक बारहमासी जलप्रपात है जो लुदे नाले पर स्थित है। इसकी ऊंचाई लगभग 100 फीट है।


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Dainik bhaskar

रविंद्रनाथ टैगोर जी का छत्तीसगढ़ आगमन - Rabindranath Tagore in Chhattisgarh

गुरुदेवर रविंद्रनाथटैगोर जी का छत्तीसगढ़ आगमन सितंबर, 1902 हुआ था। गुरूदेव की पत्नी मृणालिनी देवी टीबी रोग की मरीज थी। गुरूदेव उनके इलाज के लिए (तब मध्यप्रान्त) बिलासपुर जिले के पेंड्रा आए थे। पेंड्रा में करीब 2 महीनो तक रह कर उन्होंने अपनी पत्नी का इलाज करवाया, परंतु इलाज के दौरान 23 नवंबर, 1902 को उनकी मृत्य हो गई।

पेंड्रा में स्थित सेनेटोरियम में तब टीबी का इलाज होता था। टीबी रोग तब बहुत गंभीर बिमारी होती थी। इजाल सुलभ नहीं था। वे अपनी पत्नी को लेकर आए थे।


बिलासपुर रेल्वे स्टेशन

वर्ष 1918 कोलकाता से पेंड्रा जाते समय उन्हें बिलासपुर स्टेशन में रूकना पड़ा, क्योंकि कोलकाता से पेंड्रा के लिए सीधी ट्रेन नहीं थी। पेंड्रा के लिए अगली ट्रेन 6 घंटे बाद थी, इस लिए उन्हें प्रतीक्षा कक्ष में रुकना पड़ा। जिस वक्त वे बैठे हुए थे उसी वक्त उनकी पत्नी मृणालिनी के पास एक भिखारन रूखमणी आयी। रूखमणी की आपबीती सुन का मृणालिनी भावुक हो गयी। मृणालिनी उस महिला की मद्दत करना चाहती थी, परन्तु रवीन्द्रनाथ टैगोर ने 25 रुपये की राशि नहीं दी, जिसका उन्हें बाद में पश्च्याताप हुआ। गुरुदेव ने इसी धोखे का उल्लेख अपनी कविता फांकी में किया है।

 "बिलासपुर" इस शब्द को गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने अपनी कविता 'फांकी' की पंक्तियों में जगह दी है। कारण यह कि इस कविता को 

उन्होंने वर्ष 1918 में बिलासपुर स्टेशन में छह घंटे बिताने के दौरान यहां के अनुभवों के आधार पर रची थी। बिलासपुर रेलवे ने भी इस कविता को धरोहर के रूप में सहेजकर रखा है। गुरुदेव ने ट्रेन से उतरते ही कहा था- 

बिलासपुर स्टेशन में बदलनी है गाड़ी, तारातरि(जल्दी ही) उतरना पड़ा, मुसाफिरखाने में पड़ेगा छह घंटे ठहरना..।


फांकी कविता :

रविन्द्र नाथ टैगोर जी ने छत्तीसगढ़ यात्रा के दौरान कविता फांकि ( धोखा ) लिखी। यह कविता उनके काव्य संग्रह पलातका में है। इस कविता में दो जगहों पर बिलासपुर का जिक्र है। उनकी कविता को एक धरोहर के रूप में स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर-दो के गेट पर लगाकर रखा गया है। ये यात्रियों के लिए भी आकर्षण का केंद्र है।

गुरुनानक देव जी का छत्तीसगढ़ आगमन - Guru Nanak Dev And Chhattisgarh

सीखो के प्रथम गुरु नानक देव ( Guru Nanak Dev ) जी का छत्तीसगढ़ ( Chhattisgarh ) आगमन उनके प्रथम यात्रा ( प्रथम उदासी ) के दौरान हुई थी। वर्ष 1500 से 1506 के बीच अमरकंटक से पुरी जाते वक्त छत्तीसगढ़ में बसना से करीब 7 किलोमीटर दूर गढ़ फुलझर वे पधारे थे। तब गढ़ फुलझर एक रियासत थी। यहां उन्होंने 2 दिन बिताए थे, तत्कालीन भैना राजवंश के मानसराज सागरचंद उनसे इतने प्रभावित थे कि जिस जगह गुरुनानक ठहरे, वह जमीन ही उनके नाम कर दी। राजस्व रिकॉर्ड में वह 5 एकड़ जमीन आज भी गुरुनानक देव की के नाम पर दर्ज है। स्थानीय लोग इसे गुरु खाब के नाम से जानते हैं। केवल यही नहीं, गढ़ फुलझर के पास एक गांव भी गुरुनानक देव के नाम पर है।


छत्तीसगढ़ आगमन के कोई पुख्ता प्रमाण नहीं थे। शोध के बाद पता चला है कि वे गढ़ फूलझर के अलावा शिवरीनारायण में भी उनका आगमन हुआ था।


Source :

Dainik Bhaskar


उमा देवी मंदिर - रिसेवाड़ा ( कांकेर ) Uma Devi Temple Kanker



उमा देवी मंदिर, कांकेर—नारायणपुर मुख्य मार्ग नरहरपुर ब्लॉक में रिसेवाड़ा गांव में स्थित है। इसका निर्माण 12 वीं शताब्दी में सोमवंश के शासन काल के दौरान किया गया था।

इस मंदिर में भगवान शिव, देवी पार्वती सहित अनेक देवियों की पत्थर का मूर्तियां हैं। इस मंदिर के पास में ही एक छोटा सा तालाब है। इसमें लोग पूर्णिमा के दिन स्नान एवं पूजा करते है।


मंदिर का निर्माण किसने कराया ?

मंदिर के निर्माण के संबंध में अधिक जानकारी उपलब्ध नही है। परंतु माना जाता है कि सोम वंश में के राजाओं ने कांकेर राज्य में कई भव्य देवालयओं का निर्माण कराया था।

उत्तराखंड की प्रमुख जनजातियां



उत्तराखण्ड में 5 अनुसूचित जनजाति है। इनमे भोटिया, थारू, जौनसारी,बुक्शा एंव राजी शामिल है। वर्ष 1967 में इन्हें अनुसूचित जनजाति घोषित किया गया था। इन पांच जनजातियों मे से बुक्सा एवं राजी जनजाति आर्थिक, शैक्षिक एवं सामाजिक रूप से अन्य जनजातियों की अपेक्षा काफी निर्धन एवं पिछड़ी होने के कारण उन्हें आदिम जनजाति समूह की श्रेणी में रखा गया है।


जनसंख्या वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार

अनुसूचित जनजाति की जनसंख्या 2,91,903 है।


Source : समाज कल्याण विभाग उत्तराखंड


असुर जनजाति और आढ़ा-बूढ़ा परंपरा - Aadha-boodha Ritual

प्रतीकात्मक तस्वीर


आढ़ा-बूढ़ा परंपरा असुर जनजाति के लोगो में है। इस परंपरा के अनुसार इस जनजाति के लोग किसी धार्मिल अनुष्ठान या अपने देवी-देवताओं की पूजा से पहले घर के बुजुर्गों की पूजा कर आशीर्वाद लेते हैं। दीपावली पर भी पारंपरिक पूजा से पहले बड़े-बूढ़ों की पूजा कर उनका आशीर्वाद लेते हैं। इस समाज में पुरोहित या बैगा की परंपरा नहीं है। प्रत्येक परिवार के सदस्यों के द्वारा स्वयं ही पूजा की जाती है। 


कौन है असुर (Asur) ?

ये जनजाति खुद को असुरराज महिषासुर का वंशज मानते है।  यह आदिवासी दहशहरे का पर्व नहीं मनाते है, इस वजह से रावण के दहन या वध की परंपरा नहीं है। आधुनिक असुर

जनजाति को तीन उप-जनजातीय प्रभागों में विभाजित किया गया है, अर्थात् बीर (कोल) असुर, बिरजिया असुर और अगरिया असुर।


विवाह :

असुर जनजाति एक विवाह के नियम का पालन करते हैं, लेकिन बाँझपन, विधुर और विधवा के मामले में, वे द्विविवाह के नियम का पालन करते हैं या यहां तक कि बहुविवाह के साथ-साथ विधवा पुनर्विवाह की अनुमति है।


छत्तीसगढ़ में निवास :

असुर जानजाति छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) में जशपुर, सरगुजा और झारखण्ड (Jharkhand) राज्य के छोटा नागपुर के पठारी क्षेत्र में निवास करती है।


भाषा ( Language ) :

असुर जनजाति के लोगो के द्वारा प्रयोग में लाये जाने वाले भाषा को असुर भाषा के नाम से ही जाना जाता है। इस भाषा की कोई लिपि नहीं है, परंतु शब्दावली और लोकगीत के लिहाज से यह बेहद समृद्ध है।


अस्तित्व पर खतरा :

असुर जनजाति की संख्या एक लाख से भी कम बची है, जिस वजह से इस जनजाति की संस्कृति और भाषा दोनों के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है।


Source :

Lucknow university