भारतीय संविधान सभा संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य

भारत की संविधान सभा का चुनाव भारतीय संविधान की रचना के लिए किया गया था. ग्रेट ब्रिटेन से स्वतंत्र होने के बाद संविधान सभा के सदस्य ही प्रथम संसद के सदस्य बने:
(1) कैबिनेट मिशन की संस्तुतियों के आधार पर भारतीय संविधान का निर्माण करने वाली संविधान सभा का गठन जुलाई, 1946 ई० में किया गया.
(2) संविधान सभा के सदस्यों की कुल संख्या 389 निश्चित की गई थी, जिनमें 292 ब्रिटिश प्रांतों के प्रतिनिधि, 4 चीफ कमिश्नर क्षेत्रों के प्रतिनिधि एवं 93 देशी रियासतों के प्रतिनिधि थे.
(3) मिशन योजना के अनुसार जुलाई, 1946 ई० में संविधान सभा का चुनाव हुआ. कुल 389 सदस्यों में से प्रांतों के लिए निर्धारित 296 सदस्यों के लिय चुनाव हुए. इसमें कांग्रेस को 208, मुस्लिम लीग को 73 स्थान एवं 15 अन्य दलों के तथा स्वतंत्र उम्‍मीदवार निर्वाचित हुए.
(4) 9 दिसंबर, 1946 ई० को संविधान सभा की प्रथम बैठक नई दिल्ली स्थित काउंसिल चैम्बर के पुस्तकालय भवन में हुई. सभा के सबसे बुजुर्ग सदस्य डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा को सभा का अस्थायी अध्‍यक्ष चुना गया. मुस्लिम लीग ने बैठक का बहिष्‍कार किया और पाकिस्तान के लिए बिलकुल अलग संविधान सभा की मांग प्रारम्भ कर दी.
(5) हैदराबाद एक ऐसी रियासत थी, जिसके प्रतिनिधि संविधान सभा में सम्मिलित नहीं हुए थे.
(6) प्रांतों या देसी रियासतों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में संविधान सभा में प्रतिनिधित्व दिया गया था. साधारणतः 10 लाख की आबादी पर एक स्थान का आबंटन किया गया था.
(7) प्रांतों का प्रतिनिधित्व मुख्यतः तीन समुदायों की जनसंख्या के आधार पर विभाजित किया गया था, ये समुदाय थे: मुस्लिम, सिख एवं साधारण.
(8) संविधान सभा में ब्रिटिश प्रातों के 296 प्रतिनिधियों का विभाजन सांप्रदायिक आधार पर किया गया- 213 सामन्य, 79 मुसलमान तथा 4 सिख.
(9) संविधान सभा के सदस्यों में अनुसूचित जनजाति के सदस्यों की संख्या 33 थी.
(10) संविधान सभा में महिला सदस्यों की संख्या 12 थी.
(11) 11 दिसंबर, 1946 ई. को डॉ राजेंद्र प्रसाद संविधान सभा के स्थाई अध्यक्ष निर्वाचित हुए.
(12) संविधान सभा की कार्यवाही 13 दिसंबर, 1946 ई. को जवाहर लाल नेहरू द्वारा पेश किए गए उद्देश्य प्रस्‍ताव के साथ प्रारम्भ हुई.
(13) 22 जनवरी, 1947 ई. को उद्देश्य प्रस्ताव की स्वीकृति के बाद संविधान सभा ने संविधान निर्माण हेतु अनेक समितियां नियुक्त कीं. इनमे प्रमुख थी- वार्ता समिति, संघ संविधान समिति, प्रांतीय संविधान समिति, संघ शक्ति समिति, प्रारूप समिति.
(14) बी. एन. राव द्वारा किए गए संविधान के प्रारूप पर विचार-विमर्श करने के लिए संविधान सभा द्वारा 29 अगस्त, 1947 को एक संकल्प पारित करके प्रारूप समिति का गठन किया गया तथा इसके अध्यक्ष के रूप में डॉ भीमराव अम्बेडकर को चुना गया. प्रारूप समिति के सदस्यों की संख्या सात थी, जो इस प्रकार है: 
i. डॉ. भीमराव अम्बेडकर (अध्यक्ष)
ii. एन. गोपाल स्वामी आयंगर
iii. अल्लादी कृष्णा स्वामी अय्यर
iv. कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी
v. सैय्यद मोहम्मद सादुल्ला
vi. एन. माधव राव (बी.एल. मित्र के स्थान पर)
vii. डी. पी. खेतान (1948 ई. में इनकी मृत्यु के बाद टी. टी. कृष्माचारी को सदस्य बनाया गया). संविधान सभा में अम्बेडकर का निर्वाचन पश्चिम बंगाल से हुआ था.।

(15) 3 जून, 1947 ई. की योजना के अनुसार देश का बंटवारा हो जाने पर भारतीय संविधान सभा की कुल सदस्य संख्या 324 नियत की गई, जिसमें 235 स्थान प्रांतों के लिय और 89 स्थान देसी राज्यों के लिए थे.
(16) देश-विभाजन के बाद संविधान सभा का पुनर्गठन 31 अक्टूबर, 1947 ई. को किया गया और 31 दिसंबर 1947 ई. को संविधान सभा के सदस्यों की कुल संख्या 299 थीं, जिसमें प्रांतीय सदस्यों की संख्या एवं देसी रियासतों के सदस्यों की संख्या 70 थी.
(17) प्रारूप समिति ने संविधान के प्रारूप पर विचार विमर्श करने के बाद 21 फरवरी, 1948 ई. को संविधान सभो को अपनी रिपोर्ट पेश की.
(18) संविधान सभा में संविधान का प्रथम वाचन 4 नवंबर से 9 नवंबर, 1948 ई. तक चला. संविधान पर दूसरा वाचन 15 नवंबर 1948 ई० को प्रारम्भ हुआ, जो 17 अक्टूबर, 1949 ई० तक चला. संविधान सभा में संविधान का तीसरा वाचन 14 नवंबर, 1949 ई० को प्रारम्भ हुआ जो 26 नवंबर 1949 ई० तक चला और संविधान सभा द्वारा संविधान को पारित कर दिया गया. इस समय संविधान सभा के 284 सदस्य उपस्थित थे.
(19) संविधान निर्माण की प्रक्रिया में कुल 2 वर्ष, 11 महीना और 18 दिन लगे. इस कार्य पर लगभग 6.4 करोड़ रुपये खर्च हुए.
(20) संविधान के प्रारूप पर कुल 114 दिन बहस हुई.
(21) संविधान को जब 26 नवंबर, 1949 ई० को संविधान सभा द्वारा पारित किया गया, तब इसमें कुल 22 भाग, 395 अनुच्छेद और 8 अनुसूचियां थीं. वर्तमान समय में संविधान में 25 भाग, 395 अनुच्छेद एवं 12 अनुसूचियां हैं.
(22) संविधान के कुछ अनुच्छेदों में से 15 अर्थात 5, 6, 7, 8, 9, 60, 324, 366, 367, 372, 380, 388, 391, 392 तथा 393 अनुच्छेदों को 26 नवंबर, 1949 ई० को ही परिवर्तित कर दिया गया; जबकि शेष अनुच्छेदों को 26 जनवरी, 1950 ई० को लागू किया गया.
(23) संविधान सभा की अंतिम बैठक 24 जनवरी, 1950 ई० को हुई और उसी दिन संविधान सभा के द्वारा डॉ. राजेंद्र प्रसाद को भारत का प्रथम राष्ट्रपति चुना गया.
(24) कैबिनेट मिशन के सदस्य सर स्टेफोर्ड क्रिप्स, लार्ड पेंथिक लारेंस तथा ए० बी० एलेक्ज़ेंडर थे.
नोट: 26 जुलाई, 1947 ई० को गवर्नर जनरल ने पाकिस्तान के लिए पृथक संविधान सभा की स्थापना की घोषणा की.

सीधी कार्रवाई दिवस / डायरेक्ट एक्शन डे / कलकत्ता दंगा

भारत की स्वतंत्रता के पूर्व मुस्लिम लीग द्वारा मुस्लिम देश की मांग के लिए 'सीधी कार्रवाई या प्रत्यक्ष कारवाही (Direct Action )' की घोषणा से 16 अगस्त, वर्ष 1946 को कोलकाता में भीषण दंगे शुरु हो गये। इसे कलकत्ता दंगा या कलकत्ता का भीषण हत्याकांड (Great Calcutta Killing) कहते हैं।

अंतरिम सरकार में 14 सदस्य होंगे, जिनमें 6 कांग्रेस मनोनीत करेगी तथा 5 को मुस्लिम लीग तथा अन्य तीन अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधि होगें। मुस्लिम लीग को वायसराय का यह प्रस्ताव मंजूर नहीं था। 29 जुलाई 1946 को जिन्ना ने बम्बई में मुस्लिम लीग की बैठक बुलाई। इसमें पाकिस्तान की मांग करते हुए जिन्ना ने 16 अगस्त 1946 को 'सीधी कार्रवाई' की घोषणा की।

कलकत्ता में 72 घंटों के भीतर 4,000 से अधिक लोगों ने अपनी जान गंवाई और 100,000 निवासी बेघर हो गए। नोआखली दंगे का प्रमुख केन्द्र रहा, दंगों के दौरान लगभग 6,000 लोग मारे गये और 20,000 लोग या तो घायल हुए या फिर उनके साथ बलात्कार हुआ।

Source :
https://en.m.wikipedia.org/wiki/Direct_Action_Day
https://books.google.co.in/books?id=RHI9DwAAQBAJ



66वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार 2019 - विजेताओं की सूची

66वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार
  • बेस्ट एक्टर- आयुष्मान खुराना (अंधाधुन) और विक्की कौशल (उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक)
  • बेस्ट एक्ट्रेस- कीर्ति सुरेश, महानती (तेलुगू फिल्म)
  • बेस्ट फिल्म - अंधाधुन
  • मोस्ट फिल्म फ्रेंडली स्टेट- उत्तराखंड
  • बेस्ट फिल्म क्रिटिक अवॉर्ड- ब्लेस जॉनी और अनंत विजय
  • स्पेशल मेंशन- महान हुतात्मा 
  • बेस्ट राजस्थानी फिल्म- टर्टल
  • बेस्ट गुजराती फिल्म: रेवा
  • बेस्ट मराठी फिल्म-  भोंगा
  • सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का पुरस्कार- स्वानंद किरकिरे ,चुम्बक (मराठी) के लिए
  • बेस्ट उर्दू फिल्म- हामिद
  • बेस्ट तेलुगू फिल्म- महानती
  • गारो में बेस्ट फिल्म अवॉर्ड- मामा
  • बेस्ट पंजाबी फिल्म- हरजीता
  • बेस्ट तमिल फिल्म- बारम
  • बेस्ट बंगाली फिल्म - एक जे छीलो राजा
  • बेस्ट कोरियोग्राफर: पद्मावात के गाने घूमर के लिए कृति महेश और ज्योति तोमर
  • बेस्ट एक्शन डायरेक्टर- केजीएफ के लिए प्रशांत नील
  • बेस्ट म्यूजिक डायरेक्शन- फिल्म पद्मावत के लिए संजय लीला भंसाली
  • बेस्ट म्यूजिक डायरेक्शन (बैकग्राउंड म्यूजिक) - उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक
  • बेस्ट ऑडियोग्राफी (साउंड डिजाइनर) - उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक
  • बेस्ट प्लेबैक सिंगर- अरिजीत सिंह (बिन्ते दिल, पद्मावत)
  • बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस- सुरेखा सीकरी (बधाई हो)
  • बेस्ट मेकअप - रंजीत
  • सामाजिक मुद्दे पर बेस्ट फिल्म- पैडमैन
  • बेस्ट डायरेक्टर अवॉर्ड- आदित्य धर, उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक के लिए जीता
  • बेस्ट एंटरटेनमेंट फिल्म- बधाई हो

मंदराजी - Mandraji

दाऊ दुलार सिंह मंदराजी का जन्म राजनांदगांव से 5 किलोमीटर दूर स्थित ग्राम रवेली में 1 अप्रैल, 1911 को एक संपन्न मालगुजार परिवार में हुआ था। उन्होंने प्राथमिक शिक्षा गांव की पाठशाला में ही प्राप्त की। उच्च शिक्षा की व्यवस्था गांव में नहीं होने के कारण वे आगे नहीं पढ़ सके। स्कूल का साथ छूटने के बाद वे गांव के कुछ लोक कलाकारों के संपर्क में आये और उन्हीं से चिकारा एवं तबला बजाना सीखा तथा गाने का भी अभ्यास किया।

मंदराजी का नाच- गान दाऊजी के पिता को बिल्कुल भी पसंद नहीं था लेकिन पिता के विरोध के बावजूद मंदराजी दाऊ गांव में होने वाले सामाजिक एवं धार्मिक कार्यक्रमों में बढ़- चढ़कर हिस्सा लेते थे।

मंदराजी ने सन् 1928-29 में कुछ लोक कलाकारों को एकत्रित कर अपने गांव में "रवेली नाचा पार्टी" की स्थापना की। रवेली नाचा पार्टी के 1928 से 1953 तक लगभग पच्चीस वर्षों के कार्यकाल में छत्तीसगढ़ के अनेक मूर्धन्य एवं नामी कलाकारों ने अपनी कला का प्रदर्शन किया।

रवेली नाच पार्टी के प्रारंभिक दिनों में खड़े साज का प्रचलन या यानि वादक पूरे कार्यक्रम के दौरान मशाल की रोशनी में खड़े होकर ही वादन करते थे। दाऊजी ने इसमें परिवर्तन किया और नाचा का वर्तमान स्वरूप दिया। इसके अलावा मध्यरात्रि को समाप्त हो जाने वाले नाचा के समय सीमा को उन्होंने प्रातः काल तक बढ़ा दिया। उसी प्रकार पूर्व में चिकारा नाचा का प्रमुख वाद्य था। उसके स्थान पर दाऊजी ने नाचा में हारमोनियम का प्रयोग शुरू किया। नाचा में हारमोनियम का प्रयोग सन् 1933-34 में हुआ। 1936 के आते- आते नाचा में मशाल के स्थान पर पेट्रोमैक्स का प्रयोग शुरू हो गया था। रवेली नाचा पार्टी में 1936 में एक पेट्रोमैक्स आ गया था।

वर्ष 1940 तक रवेली नाचा पार्टी ने समूचे छत्तीसगढ़ में प्रशिद्ध हो चुकी थी। उन दिनों इसके समकक्ष छत्तीसगढ़ में कोई भी पार्टी नहीं थी। सन 1940 से 1952 तक का समय रवेली नाचा पार्टी का स्वर्ण युग माना जाता है।

मंदराजी दाऊ ने रवेली नाचा पार्टी में अपने गम्मत के माध्यम से तत्कालीन सामाजिक बुराईयों पर जमकर प्रहार किया तथा जन जागरण लाने में अपनी सार्थक भूमिका निभायी। इसके साथ ही उन्होंने कुछ देश भक्ति के गीतों को भी नाचा में शामिल कर अंग्रेजी राज के खिलाफ जनजागरण का प्रयास किया।

रवेली नाचा पार्टी के उत्तरार्द्ध में 1948-49 में भिलाई के समीप स्थित ग्राम रिगनी में "रिगनी नाचा पार्टी" का जोर- शोर से अभ्युदय हुआ था। सन् 1951-52 तक यह पार्टी भी प्रसिद्ध के शिखर पर पहुंच चुकी थी। तब समूचे छत्तीसगढ़ में सिर्फ रवेली और रिंगनी नाचा पार्टी का डंका बज रहा था। लोककला मर्मज्ञ दाऊ रामचंद देशमुख ने फरवरी सन् 1952 में अपने गृहग्राम पिनकापार में दो दिवसीय मंड़ई का आयोजन किया। इस कार्यक्रम के बाद रवेली एवं रिगनी नाच पार्टी का एक - दूसरे में विलय हो गया। यही से रेवली नाचा पार्टी का स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त हो गया। बाद में रिगनी- रवेली नाचा पार्टी के प्रमुख कलाकार दाऊ रामचंद देशमुख की सांस्कृतिक संस्था "छत्तीसगढ़ देहाती कला विकास मंच" में शामिल हो गये।

आर्थिक प्रलोभनों के कारण मंदराजी के कलाकार धीरे- धीरे अलग होते चले गये और कुछ कलाकारों ने छत्तीसगढ़ से पलायन भी किया। इन बीते वर्षों में मंदराजी दाऊ अपनी सारी संपत्ति नाचा में लगा चुके थे। इस कारण वे अपनी नई टीम भी नहीं बना पाये, लेकिन कलाकरों के छोड़कर जाने के बाद भी नाचा के प्रति उनका मोह मृत्युपर्यन्त बना रहा।

मंदराजी की मृत्यु 24 सिंतबर, 1984 को हुई। बाद में छत्तीसगढ़ सरकार ने दाऊजी की स्मृति को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए उनके नाम पर दो लाख रूपये का दाऊ मंदराजी सम्मान देना शुरू किया है।

>>छत्तीसगढ़ के लोक कलाकार

एल नीनो (El Nino) एवं ला नीना (La Nina) प्रभाव

एल नीन्यो (El Nino) और ला नीना (La Nina) दोनों स्पेनिश नाम है। एल नीनो का शाब्दिक अर्थ है- "छोटा बच्चा" यह नाम पेरू के मछुआरों द्वारा बाल ईसा के नाम पर किया गया है क्योंकि इसका प्रभाव सामान्यतः क्रिसमस के आस-पास अनुभव किया जाता है। ला नीना स्पैनिश का शाब्दिक अर्थ है- "छोटी बच्ची" चूंकि इसका प्रभाव एल नीनो के विपरीत होता है इसलिए इसे "प्रति एल नीनो" नाम से भी जाना जाता है।
 ऊष्ण कटिबंधीय प्रशांत महासागर में पैदा होने वाले गरम और ठंडे मौसमी प्रभावों को इन्हीं नामों से पुकारा जाता है।

एल नीनो प्रभाव
एल निनो गर्म जलधारा है जिसके आगमन पर सागरीय जल का तापमान सामान्य से 3-4° बढ़ जाता है। पेरू के तट के पास जल ठंडा होता है एवं पोषक-तत्वों से समृद्ध होता है जो कि प्राथमिक उत्पादकों, विविध समुद्री पारिस्थितिक तंत्रों एवं प्रमुख मछलियों को जीवन प्रदान करता है। एल नीनो के दौरान, व्यापारिक पवनें मध्य एवं पश्चिमी प्रशांत महासागर में शांत होती है। इससे गर्म जल को सतह पर जमा होने में मदद मिलती है जिसके कारण ठंडे जल के जमाव के कारण पैदा हुए पोषक तत्वों को नीचे खिसकना पड़ता है और प्लवक जीवों एवं अन्य जलीय जीवों जैसे मछलियों का नाश होता है तथा अनेक समुद्री पक्षियों को भोजन की कमी होती है। इसे एल नीनो प्रभाव कहा जाता है।
एल-नीनो अक्सर दस साल में दो बार आती है और कभी-कभी तीन बार भी। एल-नीनो हवाओं के दिशा बदलने, कमजोर पड़ने तथा समुद्र के सतही जल के ताप में बढोत्तरी की विशेष भूमिका निभाती है। एल-नीनो का एक प्रभाव यह होता है कि वर्षा के प्रमुख क्षेत्र बदल जाते हैं। परिणामस्वरूप विश्व के ज्यादा वर्षा वाले क्षेत्रों में कम वर्षा और कम वर्षा वाले क्षेत्रों में ज्यादा वर्षा होने लगती है। कभी-कभी इसके विपरीत भी होता है।


ला नीना प्रभाव
ला नीना एल नीनो से ठीक विपरीत प्रभाव रखती है। पश्चिमी प्रशांत महासागर में एल नीनो द्वारा पैदा किए गये सूखे की स्थिति को ला नीना बदल देती है, तथा आर्द्र मौसम को जन्म देती है। ला नीना के आविर्भाव के साथ पश्चिमी प्रशांत महासागर के ऊष्ण कटिबंधीय भाग में तापमान में वृद्धि होने से वाष्पीकरण अधिक होने से इण्डोनेशिया एवं समीपवर्ती भागों में सामान्य से अधिक वर्षा होती है। ला नीना परिघटना कई बार दुनिया भर में बाढ़ की सामान्य वजह बन जाती है।

एशियाई विकास बैंक (एडीबी) - ADB

यह एक क्षेत्रीय विकास बैंक है जिसकी स्थापना 19 दिसम्बर 1966 को 31 सदस्यों के साथ एशियाई देशों के आर्थिक विकास के सुगमीकरण के लिए की गयी थी। वर्तमान में एडीबी के पास 67 सदस्य हैं - जिसमे से 48 एशिया और पैसिफिक से हैं और 19 सदस्य बाहरी हैं।

यह बैंक यूऍन (UN) इकोनॉमिक कमीशन फॉर एशिया एंड फार ईस्ट (अब यूएनईएससीएपी- UNESCAP) और गैर क्षेत्रीय विकसित देशों के सदस्यों को सम्मिलित करता है।

एडीबी (ADB) का प्रारूप काफी हद तक वर्ल्ड बैंक के आधार पर बनाया गया था और वर्ल्ड बैंक (विश्व बैंक) के समान यहां भी वोट प्रणाली की व्यवस्था है जिसमे वोटों का वितरण सदस्यों के पूंजी अभिदान अनुपात के आधार पर किया जाता है।

शेयर
वर्तमान में, संयुक्त राज्य अमेरिका और जापान दोनों के ही पास 552,210 शेयर हैं - इन दोनों के पास शेयरों का सबसे बड़ा हिस्सा है जो कुल का 12.756 प्रतिशत है।

पक्षियों के नाम - छत्तीसगढ़ी शब्दावली

छत्तीसगढ़ी भाषा में पशु एवं पक्षियों के नाम दिए गए है। ये नाम परीक्षाओं के लिए भी उपयोगी हो सकते है। इस सूची में और नामो को हम समय-समय जोड़ते रहते है। यदि आप को उपयोगी लगे तो अपने दोस्तों के साथ जरूर शेयर करें।

हिंदी - छत्तीसगढ़ी
पक्षी - चिराई
उल्लू - घुघुवा
कौवा - कंउवा
मयूर - मंजूर
मुर्गा - कुकरा
मुर्गी - कूकरी
चूजा - चिंया
कबूतर - परेवा
गौरेया - गुड़ेड़ीया/ गौरेला / ब्राम्हण चिराई
बत्तक - बदख
बगुला - कोकड़ा
गिध्द - गिधवा
बाज - छचान/ रवना
तोता - सुवा/मिठ्ठू
चकवा - चकहा/ गोना
चमगादड़ - चंगेदरी/ गदराइल
नीलकंठ - टेहा
मैना - सलहई
तीतर - तीतुर


त्रिभाषा फॉर्मूला क्या है ?

वर्ष 1947 में भारत की आज़ादी के बाद प्रतिस्पर्धा परीक्षाओं या सिविल सेवा के परीक्षाओं में हिंदी को अहमियत देने का गैर-हिंदी भाषायी राज्यों में विरोध हुआ।
इस विरोध की वजह से तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने वर्ष 1956 में मुख्यमंत्रियों की एक बैठक बुलाई जिसमें त्रिभाषा फॉर्मूले पर सबकी रज़ामंदी ली गई।

त्रिभाषा फॉर्मूले / त्रिभाषा सूत्र को तैयार करने की शुरूआत 1960 के दशक में हुई और ये राष्ट्रीय शिक्षा नीति का हिस्सा है। इसका ज़िक्र कोठारी कमीशन की रिपोर्ट में भी है जो 1966 में बनकर तैयार हुई थी। वर्ष 1968 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इसका समर्थन किया गया था और वर्ष 1968 में ही पुन: अनुमोदित कर दिया गया था। वर्ष 1992 में संसद ने इसके कार्यान्वयन की संस्तुति कर दी थी।

त्रिभाषा
1-शास्त्रीय भाषाएं जैसे संस्कृत, अरबी, फारसी।
2-राष्ट्रीय भाषाएं
3-आधुनिक यूरोपीय भाषाएं 
इन तीनों श्रेणियों में किन्हीं तीन भाषाओं को पढ़ाने का प्रस्ताव है। इसके अलावा, हिन्दी भाषी राज्यों में दक्षिण की कोई भाषा पढ़ाई जानी चाहिए।

त्रिभाषा फॉर्मूला क्या है ?
इस फॉर्मूले के तहत स्कूलों में तीन भाषाओं की शिक्षा दी जानी थी। हिंदी भाषी राज्यों में छात्रों को जो तीन भाषाएं पढ़ाई जानी थीं वो थीं - हिंदी, अंग्रेज़ी और एक आधुनिक भारतीय भाषा (बांगला, तमिल, तेलुगू, कन्नड़, असमिय़ा, मराठी और पंजाबी और अन्य)। ग़ैर हिंदी भाषी राज्यों में मातृभाषा के अलावा, हिंदी और अंग्रेज़ी पढ़ाई जानी थी।

राजनांदगांव जिला - Rajnandgaon Jila

जिला राजनांदगांव 26 जनवरी 1973 को तात्कालिक दुर्ग जिले से अलग हो कर अस्तित्व में आया। रियासत काल में राजनांदगांव एक राज्य के रूप में विकसित था एवं यहाँ पर सोमवंशी, कलचुरी एवं मराठाओं का शासन रहा. पूर्व में यह नंदग्राम के नाम से जाना जाता था। यहाँ की रियासत कालीन महल, हवेली राज मंदिर इत्यादि स्वयं इस जगह की गौरवशाली समाज, संस्कृति, परंपरा एवं राजाओं की कहानी कहता है. साहित्य के क्षेत्र में श्री गजनानद माधव मुक्तिबोध, श्री पदुमलाल पुन्नालाल बक्षी एवं श्री बल्देव प्रसाद मिश्रा का योगदान विशिष्ठ रहा है।

जिले का पुनर्गठन
1948 में, रियासत राज्य और राजधानी शहर राजनांदगांव मध्य भारत के बाद में मध्य प्रदेश के दुर्ग जिले में विलय कर दिया गया था। 1973 में, राजनांदगांव को दुर्ग जिले से बाहर निकाला गया और नया राजनांदगांव जिला बनाया गया था। राजनांदगांव जिले का प्रशासनिक मुख्यालय बन गया। 1 जुलाई 1998 को इस जिले के कुछ हिस्से को अलग कर एक नया जिला कबीरधाम की स्थापना हुई। जिला राजनांदगांव छत्तीसगढ़ राज्य के मध्य भाग में स्थित है। जिला मुख्यालय राजनांदगांव दक्षिण-पूर्व रेलवे मार्ग स्थित है। राष्ट्रीय राज़ मार्ग 6 राजनांदगांव शहर से हो कर गुजरता है। नजदीकी हवाई अड्डा माना (रायपुर) यहाँ से करीब 80 किलोमीटर की दुरी पर है।

पर्यटन

खारा रिजर्व वन :
यह एक संरक्षित वन (जिसे आरक्षित वन भी कहा जाता है) है।

शिव मन्दिर - गंडई (टिकरी पारा) :
यह शिव मंदिर भूमिज में पूर्वाभिमुखी निर्मित है। यह मंदिर स्थापत्य कला की दृष्टि से उच्चकोटि का है। इस मंदिर का निर्माण 13-14 वीं शताब्दी में किया गया था।


शिव मंदिर - (नव उत्खनित) घटियारी :
स्थापत्य कला की दृष्टि से मात्र-अधिष्ठान तथा गर्भगृह शेष है । इस मंदिर का निर्माण 11-12 वीं शताब्दी में किया गया था ।

नर्मदा कुंड - नर्मदा 
यह प्राकृतिक जल स्त्रोत (जल कुंड) है । मराठा कालीन पंचायतन शैली का मंदिर है ।

बम्लेश्वरी मंदिर - डोंगरगढ़
पहाड़ी में स्थित बगुलामुखी (बम्लेश्वरी) मंदिर है । शारदीय एवं वासंतीय नवरात्री में भव्य मेला आयोजित किया जाता है ।

मण्दीप खोल - ठाकुरटोला
यहां प्राकृतिक गुफा एवं पानी का स्त्रोत है ।

छत्तीसगढ़ की बोलियाँ एवं वर्गीकरण


छत्तीसगढ़ राज्य एक जनजाति (आदिवासी) बहुल क्षेत्र है। छत्तीसगढ़ राज्य में 93 के करीब बोलियों का प्रचलन है। राज्य में छत्तीसगढ़ी बोली का प्रयोग सर्वाधिक किया जाता है, इसके बाद हल्बी बोली का प्रयोग होता है। 

छत्तीसगढ़ की बोलियों की उनके भाषा परिवार के आधार पर तीन भागों में, आर्य, मुण्डा और द्रविड़ में बांटा गया है।

मुण्डा भाषा परिवार :
हो, तुरी, गदबा, खड़िया, कोरवा, विदहो, नगेसिया, मझवार, खैरवारी, कोरकू, मांझी, निहाल, पण्डो(पंर्डो),बिरहोर, सौता।
द्रविड़ भाषा परिवार :
दोरला, दंडामी, भुंजिया, अबुझमाड़िया, धुरवी/धुरवाकुडुख, ओराव(उराव), पर्ज़ी ( परजी/परजा ), गोंड़ी, मुड़िया।
आर्य भाषा परिवार :
मागधी, उड़िया, भतरी, हल्बी, सदरी।

छत्तीसगढ़ी का वर्गीकरण
छत्तीसगढ़ में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा छत्तीसगढ़ी के अनेक क्षेत्रीय स्वरूप प्रचलित हो गए है।

केंद्रीय छत्तीसगढ़ी : 
यह बोली मानक हिंदी भाषा से प्रभावित है। क्यो की इस पर स्थानीय बोलियों का प्रभाव कम पड़ा है। इसे कुल 18 नामो से भी जाना जाता है। इस समूह में छत्तीसगढ़ी को सर्वोपरी माना जाता है।
कवरधाई, कांकेरी, खैरागढ़ी, बिलसपुरी, रतनपुरी, रायपुरी, धमतरी, पारधी, बहेलिया, बैगनी तथा सतनामी।

पश्चिमी छत्तीसगढ़ी : 
छत्तीसगढ़ी के इस प्रकार में बुंदेली तथा मराठी का प्रभाव दिखता है। इस समूह में खल्टाही सर्वप्रमुख है।
कमरी, खल्टाही, मरारी, पनकी।

उत्तरी छत्तीसगढ़ी : 
इस समूह में बघेली, भोजपुरी, कुडुख का प्रभाव दिखता है। इसमें सरगुजिया प्रमुख है।
पण्डो, नगेशिया, सादरी, कोरवा, जशपुरी, सरगुजिया।

पूर्वी छत्तीसगढ़ी : 
इस समूह में उड़िया भाषा का प्रभाव है। इसमें लारिया प्रमुख है।
कलिंजर, कलंगा, बिंझवार, लारिया, चर्मशिल्पी।

दक्षिणी छत्तीसगढ़ी : 
इस समूह में मराठी, उड़िया, गोंड़ी का प्रभाव है। इसमें प्रमुख हल्बी है।
जोगी, बस्तरी, अदकुरी, चंदारी, धाकड़, मगरी, मिरगानी, हल्बी।