त्रिभाषा फॉर्मूला क्या है ?

वर्ष 1947 में भारत की आज़ादी के बाद प्रतिस्पर्धा परीक्षाओं या सिविल सेवा के परीक्षाओं में हिंदी को अहमियत देने का गैर-हिंदी भाषायी राज्यों में विरोध हुआ।
इस विरोध की वजह से तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने वर्ष 1956 में मुख्यमंत्रियों की एक बैठक बुलाई जिसमें त्रिभाषा फॉर्मूले पर सबकी रज़ामंदी ली गई।

त्रिभाषा फॉर्मूले / त्रिभाषा सूत्र को तैयार करने की शुरूआत 1960 के दशक में हुई और ये राष्ट्रीय शिक्षा नीति का हिस्सा है। इसका ज़िक्र कोठारी कमीशन की रिपोर्ट में भी है जो 1966 में बनकर तैयार हुई थी। वर्ष 1968 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इसका समर्थन किया गया था और वर्ष 1968 में ही पुन: अनुमोदित कर दिया गया था। वर्ष 1992 में संसद ने इसके कार्यान्वयन की संस्तुति कर दी थी।

त्रिभाषा
1-शास्त्रीय भाषाएं जैसे संस्कृत, अरबी, फारसी।
2-राष्ट्रीय भाषाएं
3-आधुनिक यूरोपीय भाषाएं 
इन तीनों श्रेणियों में किन्हीं तीन भाषाओं को पढ़ाने का प्रस्ताव है। इसके अलावा, हिन्दी भाषी राज्यों में दक्षिण की कोई भाषा पढ़ाई जानी चाहिए।

त्रिभाषा फॉर्मूला क्या है ?
इस फॉर्मूले के तहत स्कूलों में तीन भाषाओं की शिक्षा दी जानी थी। हिंदी भाषी राज्यों में छात्रों को जो तीन भाषाएं पढ़ाई जानी थीं वो थीं - हिंदी, अंग्रेज़ी और एक आधुनिक भारतीय भाषा (बांगला, तमिल, तेलुगू, कन्नड़, असमिय़ा, मराठी और पंजाबी और अन्य)। ग़ैर हिंदी भाषी राज्यों में मातृभाषा के अलावा, हिंदी और अंग्रेज़ी पढ़ाई जानी थी।