गुरुद्वारा दरबार साहिब, करतारपुर Gurdwara Darbar Sahib, Kartarpur

करतारपुर साहिब, पाकिस्तान के नारोवाल जिले में स्थित है। यह जगह भारतीय सीमा (डेरा बाबा नानक (Dera Baba Nanak) से) से 3 किमी. और लाहौर से करीब 120 किमी. की दूरी पर स्थित है।

वर्तमान गुरुद्वारा वर्ष 1925 में 1,35,600 रुपये की लागत से बनाया गया था, जिसे पटियाला के महाराजा सरदार भूपिंदर सिंह ने दान किया था। वर्ष 1995 में पाकिस्तान सरकार द्वारा इसके कुछ हिस्सों की मरम्मत की गई।

इस जगह की अहमियत:
सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक जी करतारपुर के इसी गुरुद्वारा दरबार साहिब के स्थान पर एक आश्रम में रहा करते थे। करतारपुर के गुरुद्वारा दरबार साहिब स्थान पर गुरु नानक जी ने 16 सालों तक अपना जीवन व्यतीत किया था। इसी गुरुद्वारे की जगह पर गुरु नानक देव जी ने  22 सितंबर,1539 को अपना देह छोड़ा था, जिसके बाद गुरुद्वारा दरबार साहिब बनवाया गया।

मान्यता है कि जब नानक जी ने अपनी आखिरी सांस ली तो उनका शरीर अपने आप गायब हो गया और उस जगह कुछ फूल रह गए। इन फूलों में से आधे फूल सिखों ने अपने पास रखे और उन्होंने हिंदू रीति रिवाजों से इन्हीं से गुरु नानक जी का अंतिम संस्कार किया और करतारपुर के गुरुद्वारा दरबार साहिब में नानक जी की समाधि बनाई। आधे फूलों को पाकिस्तान के पंजाब प्रांत मुस्लिम भक्त अपने साथ ले गए और उन्होंने गुरुद्वारा दरबार साहिब के बाहर आंगन में मुस्लिम रीति रिवाज के मुताबिक कब्र बनाई।

गुरु नानक जी ने इसी स्थान पर अपनी रचनाओं और उपदेशों को पन्नों पर लिख अगले गुरु यानी अपने शिष्य भाई लहना के हाथों सौंप दिया था। यही शिष्य बाद में गुरु अंगद देव नाम से जाने गए। इन्हीं पन्नों पर सभी गुरुओं की रचनाएं जुड़ती गई और दस गुरुओं के बाद इन्हीं पन्नों को गुरु ग्रन्थ साहिब (Gur Granth Sahib) नाम दिया गया।


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