छत्तीसगढ़ में जैन धर्म – Jainism in Chhattisgarh


वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार छत्तीसगढ़ की जनसंख्या का 0.24% जैन धर्म को मानते है। परंतु इतिहासिक रूप से देखें तो जैन धर्म का बहुत प्रभाव रहा है। छत्तीसगढ़ के कई स्थलों से प्राचीन जैन मूर्तियां प्राप्त हुई है। छठी शताब्दी के मध्य में सिरपुर क्षेत्र में हिंदू शैव राजा तीवरदेव और 8वीं शताब्दी के राजा शिवगुप्त बलार्जुन ने राज्य में जैनियों के लिए भी मंदिरों की स्थापना की थी।


पुरातात्विक स्थलों की सूची :

1. मल्हार (बिलासपुर)/Malhar

जैन धर्म के प्रथम तीर्थकर ऋषभदेव की प्रतिमा मल्हार के समीप बुढ़िखार नामक स्थान पेण्ड्रा बिलासपुर एवं जांजगीर चंपा जिले के गुंजी/ दमाऊदरहा से प्राप्त हुई है।


2. आरंग (रायपुर)/Arang

जैन धर्म के 24 वे तीर्थकर महावीर स्वामी की प्रतिमा आरंग रायपुर से प्राप्त हुई है।


3. नगपुरा (दुर्ग)/Nagpura

जैन धर्म के 23 वे तीर्थकर पाशर्वनाथ का नगपुरा, दुर्ग मे प्राचीन मंदिर स्थित है। वर्ष 1995 में नागपुरा में जैन मंदिर की स्थापना की गई थी। इसे "श्री उवसग्‍गहंर पार्श्‍व तीर्थ" भी कहा जाता है।

नागदेव (Nagdev):

दुर्ग-खैरागढ़ मार्ग पर दुर्ग शहर से 16 किलोमीटर दूर दुर्ग जिले के नागपुरा गांव यह मंदिर में स्थित है। यहाँ भगवान पार्श्वनाथ, 23वें तीर्थंकर का प्रतीक बहुत धार्मिक और पुरातात्विक महत्व का है। इसके अलावा कई अन्य जैन मूर्तियां और उनके टुकड़े यहां बिखरे हुए हैं। पार्श्वनाथ की मूर्ति को ही ग्रामीण नागदेव के नाम से पूजते है और इससे ही इस गाँव का नाम नागपुरा पड़ा। नागदेव की प्रतिमा लगभग 11वीं-12वीं शताब्दी की है।


4. भटगुड़ा (बस्तर) / Bhatguda

बस्तर जिले में इंद्रावती नदी के समीप स्थित भाटागुड़ा नामक स्थान जैन धर्म के 16 वे तीर्थकर शांतिनाथ की 3 फीट ऊची प्रतिमा से प्राप्त हुई है। यहां देवी लक्ष्मी की भी दुर्लभ प्रतिमा भी है। ग्रामीण इन मूर्तियों को बेताल और कोटगुड़िन देवी के रूप में पूजते हैं।


By : प्रवीण सिंह


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