बस्तर दशहरा

बस्तर दशहरा छत्तीसगढ़ राज्य के बस्तर अंचल में आयोजित होने वाले पारंपरिक पर्वों में से सर्वश्रेष्ठ पर्व है। बस्तर दशहरा पर्व का सम्बन्ध महाकाव्य रामायण के रावण वध से नहीं है, अपितु इसका संबंध सीधे महिषासुर मर्दिनी माँ दुर्गा से जुड़ा है। पौराणिक वर्णन के अनुसार अश्विन शुक्ल दशमी को माँ दुर्गा ने अत्याचारी महिषासुर को शिरोच्छेदन किया था। यह पर्व निरंतर 75 दिनो तक चलता है। पर्व की शुरुआत हरेली अमावस्या से होती है। बस्तर दशहरा में राज्य के दूसरे जिलो के देवी-देवताओं को भी आमंत्रित किया जाता है।

भगवान जगन्नाथ के प्रति आस्था के इस महापर्व में आदिवासी जनता भगवान को सलामी देने के लिये जिस उपकरण का उपयोग करती है उसे तुपकी कहते है।
गोंचा महापर्व में आकर्षण का सबसे बड़ा केन्द्र तुपकी होती है। विगत छः सौ साल से तुपकी से सलामी देने की परंपरा बस्तर में प्रचलित है।तुपकी बांस से बनी एक खिलौना बंदुक है।
इतिहास
बस्तर के चौथे काकतिया / चालुक्य नरेश पुरुषोत्तम देव ने एक बार श्री जगन्नाथपुरी तक पैदल तीर्थयात्रा कर मंदिर में स्वर्ण मुद्राएँ तथा स्वर्ण भूषण आदि सामग्री भेंट में अर्पित की थी। यहाँ पुजारी ने राजा पुरुषोत्तम देव को रथपति की उपाधि से विभूषित किया।
गोंचा की सुरुवात:
जब राजा पुरुषोत्तम देव पुरी धाम से बस्तर लौटे तब उन्होंने धूम-धाम से दशहरा उत्सव मनाने की परंपरा का शुभारम्भ किया और तभी से गोंचा और दशहरा पर्वों में रथ चलाने की प्रथा चल पड़ी।
काछनदेवी और दशहरा: 
1725 ई. में काछनगुड़ी क्षेत्र में माहरा समुदाय के लोग रहते थे। तब तात्कालिक नरेश दलपत से कबीले के मुखिया ने जंगली पशुओं से अभयदान मांगा। राजा इस इलाके में पहुंचे और लोगों को राहत दी। नरेश यहां की आबोहवा से प्रभावित होकर बस्तर की बजाए जगतुगुड़ा को राजधानी बनाया। राजा ने कबीले की ईष्टदेवी काछनदेवी से अश्विन अमावस्या पर आशीर्वाद व अनुमति लेकर दशहरा उत्सव प्रारंभ किया। तब से यह प्रथा चली आ रही है।

तैयारी
पर्व की शुरुआत हरेली अमावस्या को माचकोट जंगल से लाई गई लकड़ी (ठुरलू खोटला) पर पाटजात्रा रस्म के साथ होती है। इसके लिए परंपरानुसार बिलोरी जंगल से साल लकड़ी का गोला लाया जाता है। काष्ठ पूजा के बाद इसमें सात मांगुर मछलियों की बलि और लाई-चना अर्पित कियाजाता है। इस साल लकड़ी से ही रथ बनाने में प्रयुक्त औजारों का बेंठ आदि बनाया जाता है। पाटजात्रा रस्म के बाद बिरिंगपाल गांव के ग्रामीण सीरासार भवन में सरई पेड़ की टहनी को स्थापित कर डेरीगड़ाई रस्म पूरी करने के साथ विशाल रथ निर्माण प्रक्रिया शुरु की जाती है।

काछिनगादी: 
काछिनगादी ( काछिन देवी को गद्दी ) पूजा बस्तर दशहरा का प्रथम चरण है। काछिनगादी बेल कांटों से तैयार झूला होता है। पितृमोक्ष अमावस्या के दिने काछनगादी पूजा विधान होती है। काछिनगादी में मिरगान जाति की बालिका को काछनदेवी की सवारी आती है जो काछिनगादी पर बैठकर रथ परिचालन व पर्व की अनुमति देती है।

जोगी बिठाई:
दशहरा निर्विघ्न संपन्न कराने ने लिए किया है। जिस दिन बस्तर दशहरा अपना नवरात्रि कार्यक्रम आरम्भ करता है। उसी दिन सिरासार प्राचीन टाउन हॉल में जोगी बिठाई की प्रथा पूरी की जाती है। जोगी बिठाने के लिए सिरासार के मध्य भाग में एक आदमी की समायत के लायक एक गड्ढा बना है। जिसके अंदर हलबा जाति का एक व्यक्ति लगातार ९ दिन योगासन में बैठा रहता है।

जोगी बिठाई के दूसरे दिन से रथ चलना शुरू हो जाता है। रथ प्रतिदिन शाम ( अश्विन शुक्ल २ से लेकर लगातार अश्विन शुक्ल ७ तक ) एक निश्चित मार्ग को परिक्रम करता हाँ और राजमहलों के सिंहद्वार के सामने खड़ा हो जाता है। पहले-पहले १२ पहियों वाला एक रथ होता था  परंतु असुविधा के कारण रथ को आठ और चार पहियों वाले दो रथों में विभाजित कर दिया गया। अश्विन शुक्ल ७ को समापन परिक्रमा के दूसरे दिन दुर्गाष्टमी मनाई जाती है। दुर्गाष्टमी के अंतर्गत निशाजात्रा का कार्यक्रम होता है। निशाजात्रा का जलूस नगर के इतवारी बाज़ार से लगे पूजा मंडप तक पहुँचता है।

९ वे दिन जोगी उठाई मावली पर घाव की किया जाता है।
मावली पर घाव  : अर्थ है देवी की स्थापना। मावली देवी को दंतेश्वरी का ही एक रूप मानते हैं। इस कार्यक्रम के तहत दंतेवाड़ा से श्रद्धापूर्वक दंतेश्वरी की डोली में लाई गई मावली मूर्ति का स्वागत किया जाता है। नए कपड़े में चंदन का लेप देकर एक मूर्ति बनाई जाती है और उस मूर्ति को पुष्पाच्छादित कर दिया जाता है।

विजयादशमी के दिन भीतर रैनी तथा एकादशी के दिन बाहिर रैनी के कार्यक्रम होते हैं। दोनों दिन आठ पहियों वाला विशाल रथ चलता है।

निशाजात्रा :
निशाजात्रा रस्म में दर्जनों बकरों की बलि आधी रात को दी जाती है। इसमें पुजारी, भक्तों के साथ राजपरिवार सदस्य मौजुद होते है। इस रस्म में देवी-देवताओं को चढ़ाने वाले १६ कांवड़ ( कांवर ) भोग प्रसाद को तोकापाल के राजपुरोहित तैयार करते हैं। जिसे दंतेश्वरी मंदिर के समीप से जात्रा स्थल तक कावड़ में पहुंचाया जाता है।

अंतिम पड़ाव:
इस पर्व के अंतिम पड़ाव में मुरिया दरबार लगता है। जहां मांझी-मुखिया और ग्रामीणों की समस्याओ का निराकरण किया जाता है। मुरिया दरबार में पहले समस्याओं का निराकरण राजपरिवार करता था अब यह जिम्मेदारी प्रशासनिक अधिकारी निभाते हैं।इसी के साथ गाँव-गाँव से आए देवी देवताओं की विदाई हो जाती है। दंतेवाड़ा के दंतेश्वरी माई की डोली व छत्र को दूसरे दिन नजराने व सम्मान के साथ विदा किया जाता है। इस कार्यक्रम को ओहाड़ी कहते हैं।