ब्रिटिश संरक्षण में मराठा शासन ( 1818 - 1830 )


रघुजी द्वितीय की मृत्यु ( 22 मार्च 1816 ) के बाद उनका पुत्र परसोंजी भोसले शासक बनाये गए तथा परसोंजी के चाचा अप्पा साहब को रीजेंट नियुक्त किया गया। तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड हेस्टिंग ने नागपुर में ब्रिटिश राज्य विस्तार हेतु अप्पा साहब का साथ दिया। अंग्रेजों और अप्पा साहब के मध्य 27 मार्च 1816 में सहायक संधि हुई। और 9 जून 1816 को नागपुर राज्य में ब्रिटिश सेना रखना मंजूर हुआ।

10 फरवरी 1817 में परसोंजी की संदेहास्पद मौत के बाद 21 अप्रैल 1817 को अप्पा साहब नागपुर के उत्तराधिकारी हुए। अप्पा साहब ने अंग्रेजो के इच्छा के विरुद्ध बाजीराव द्वितीय से संबंध स्थापित किये और 1817 में बाजीराव द्वितीय से सेना साहब की उपाधि भी प्राप्त की। जिसे अंग्रेजो ने संधि की शर्तों का उल्लंघन माना।

पेशवा बाजीराव द्वितीय ने अंग्रेजो के खिलाफ विद्रोह कर दिया जिसमें अप्पा साहब ने भी बाजीराव का साथ दिया, जिसके कारण तृतीय आंग्ल-मराठा(1817-1818) युद्ध हुआ। तृतीय आंग्ल मराठा युद्ध के दौरान सीताबर्डी के युद्ध में भोसले पराजित हुये। 15 मई 1818 को अप्पा साहब को गिरफ्तार कर लिया गया। 3 मई 1818 में वे फरार हो गए। 1840 में उनकी मृत्यु हुई।

शासन की स्थापना:-
युद्ध के बाद मराठा उत्तराधिकारी अल्पव्यस्क होने की वजह से अंग्रेजो ने इस क्षेत्र पर शासन की स्थापना की।
31 मई 1818 को रेजिडेंट जेनकिन्स के द्वारा सूबा शासन समाप्त कर दिया गया। जेनकिन्स ने घोषणा की जिसमे अप्पा साहब को भगोड़ा घोषित किया गया तथा रघुजी द्वितीय के बेटे रघुजी तृतीय को वयस्क होने तक राज्य का प्रशासन ब्रिटिश संरक्षण में रखा जाएगा।
नागपुर भोंसले शासन का ब्रिटिश संरक्षण में आने के बाद जेनकिन्स ने छत्तीसगढ़ में नवीन अधीक्षक व्यवस्था की सुरुवात की तथा एडमंड को प्रथम अधीक्षक नियुक्त किया गया। ब्रिटिश शासन द्वारा मराठा शासन के दौरान के परम्पराओ में कोई परिवर्तन नहीं किया गया। सम्पूर्ण राज्य को सुविधा के लिए पांच सुबो - नागपुर, चाँदा, छिंदवाड़ा, भंडारा और छत्तीसगढ़ में विभाजित किया गया।

ब्रिटिश अधीक्षक ( 1818 - 1830 )

कैप्टन एडमंड ( 1818 )
ये छत्तीसगढ़ के प्रथम अधीक्षक थे। इन्होंने क्षेत्र में शांति व्यवस्था शापित की।
इनके शासन काल में डोंगरगढ़( प्राचीन नाम कामावती पूरी) के जमींदार ने अंग्रेजो के खिलाफ विद्रोह किया।
इन्होंने मात्र 6 माह तक शासन किया। शासन काल के दौरान ही इनकी मृत्यु हो गई।

कैप्टन पी. वन्स एगेन्यु ( 1818 - 1825 )
ये सर्वाधिक समय तक छत्तीसगढ़ के अधीक्षक थे। जिन्होंने राजधानी रतनपुर से रायपुर स्थानांतरित की।( अधीक्षक का मुख्यालय )
इन्होंने अंतरिम अनियमित सेना का गठन किया।

इन्होंने छत्तीसगढ़ के 27 परगनो को पुनर्गठित कर 8 परगनो का गठन किया गया।
8 परगनो के नाम -
1) रायपुर(सबसे बड़ा), 2) रतनपुर, 3) दुर्ग, 4) धमधा, 5) राजरों(साबसे छोटा), 6) नवागढ़, 7) धमतरी, 8) खरौद
कुछ समय बाद 8 परगनो के अलावा 9वें परगने दुर्ग-बालोद की स्थापना की गई। 1820 तक परगनो की संख्या 9 रही।

परगनो के अधिकारी को कमाविसदार कहा जाता था।
विद्रोह-
धमधा क्षेत्र में गोंड़ राजा का विद्रोह।
कोटपाड़ की संधि(बस्तर - जैपुर) विवाद को सुलझाया।
1819 में रामराय/रामराजे का विद्रोह।
1825 में परलकोट का विद्रोह।
नवागढ़ के महाशिया नामक जमींदार का विद्रोह।

कैप्टन हंटर ( 1825 )
ये 6 माह तक अधीक्षक थे।

कैप्टन सैण्डिस ( 1825 - 1828 )
इनके शासन के दौरान नागपुर का शासन रघुजी तृतीय के हाथों में आगया परंतु अंग्रेजो का नियंत्रण जारी रहा।
इन्होंने ग्रिगेरियन कैलेंडर लागू किया तथा सरकारी कामकाज का माध्यम अंग्रेजी बनाया।
छत्तीसगढ़ में ताहूतदारी प्रथा की सुरुवात की। लोरमी और तरेंगा नामक दो तहुतदारी का गठन किया गया।
तहुतदारी का प्रधान तहुतदार कहलाता था।
बस्तर और करौद के मध्य समझौता करवाया।

विलकिंसन( 1828 )
क्राफर्ड (1828 - 1830)

ये छत्तीसगढ़ के अंतिम अधीक्षक थे।
इसके शासन के दौरान रेसीडेंट विल्डर 26 दिसम्बर 1829 में हुई संधि के अनुसार पुनः नागपुर पर मराठा शासन की स्थापना हुई। काफर्ड ने भोसले द्वारा नियुक्त जिलेदार अप्पाराव को शासन सौंप दिया गया।
9 जून 1830 को स्थानांतरण सम्पन्न हुआ और मराठा शासन की पुनर्स्थापना हुई।

अंग्रेजो के शासन के दौरान 1819-1820 के दौरान छत्तीसगढ़ में अकाल पड़ा।
अंग्रेजो द्वारा प्रादेशिक सेना का गठन किया गया। जिसके प्रथम कमांडर 'माक्सन' थे।

ब्रिटिश संरक्षणाधिन मराठा शासन व्यवस्था :-
कर अदायगी रुपयों के माध्यम से।
परगनो का सर्वोच्च अधिकारी कमाविसदार थे।
राजस्व संबंधित हिसाब के लिए अमीन या पेशकार की नियुक्ति की गई।
अंग्रेजो ने 20-30 गांवों के लिए 'पण्डया' नामक अस्थायी राजस्व कर्मचारी की नियुक्ति।
गोंटिया के पद में परिवर्तन नहीं किया गया। तथा मराठा काल के पटेल पद को समाप्त कर दिया गया।

भूमिकर 1/4 से 1/3 तक। तथा भूमि को 6 वर्गो में विभाजित किया गया।
1) काली जमीन
2) पथरीली जमीन
3) डोरसा
4) कछार
5) भाठा
6) डीह

अंग्रेजो ने बेकार पड़ी जमीन को जोत क्षेत्र के अंतर्गत लाने के लिए प्रोत्साहित किया।

गैर भूमिकर :-
सायर - आयात-निर्यात
कलाली - मादक द्रव्यों पर
सेवाई - छोटे-छोटे अस्थाई करो का समूह
पण्डरी - गैर-कृषक
ओवरी - जमींदारों से प्राप्त कर


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