तवांग मठ Tawang Monastery

तवांग मठ भारत के अरुणाचल प्रदेश में स्थित एक बौद्ध मठ है। यह भारत का सबसे बड़ा बौद्ध मठ है और ल्हासा के पोताला महल के बाद विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मठ है। यह तवांग नदी की घाटी में तवांग कस्बे के निकट स्थित है। बौद्ध भिक्षु इस मठ को एक अंतरराष्ट्रीय धरोहर मानते हैं।

इसे वर्ष 1680 में मेराक लामा लोद्रे ग्यास्तो के द्वारा 5 वें दलाई लामा, नगवांग लोबसांग ग्यात्सो ( Ngawang Lobsang Gyatso ) के निर्देश पर बनवाया गया था। इसमें 570 से ज्यादा बौद्ध भिक्षु रहते हैं। समुद्र तल से 10,000 फुट की ऊंचाई पर तवांग चू घाटी में बने इस मठ में दुनिया भर के बौद्ध भिक्षु और पर्यटक आते हैं। पहाड़ी पर बने होने के कारण तवांग मठ से पूरी त्वांग घाटी के खूबसूरत दृश्य देखे जा सकते हैं।

यह मठ दूर से एक विशाल किले के जैसा दिखाई देता है। इसके प्रवेश द्वार का नाम 'काकालिंग' है जो देखने में झोपडी जैसा लगता है और इसकी दो दीवारों के निर्माण में पत्थरों का प्रयोग किया गया है। इन दीवारों पर खूबसूरत चित्रकारी की गई है जो पर्यटकों को बहुत पसंद आती है।

यह क्षेत्र पहले तिब्बत के अधिकार क्षेत्र में आता था। परंतु 1913-14 शिमला अग्रीमेंट के तहत ये क्षेत्र ब्रिटिश राज के अधिकार में आ गया।
चीन ने दावा किया कि तवांग तिब्बत का हिस्सा है। यह तिब्बती बौद्ध धर्म के कुछ मठों में से एक है जो बिना किसी नुकसान के माओ की सांस्कृतिक क्रांति से संरक्षित रहा है। भारत-चीन युद्ध के पहले, वर्ष 1959 में, चीन द्वारा तिब्बत पर कब्जा करने के बाद, 14 वें दलाई लामा ने तिब्बत छोड़ दिया, 30 मार्च 1959 को वें भारत पहुचे, और तेजपुर जाने से कुछ दिन पहले तवांग मठ में आश्रय लिया। 50 साल बाद, चीन द्वारा मजबूत विरोध के बावजूद, 8 नवंबर 2009 को दलाई लामा की यात्रा तवांग मठ के लिए और इस क्षेत्र के लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण घटना थी।


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