कौन थे जोगेंद्र नाथ मंडल ?

जन्म : 29 जनवरी 1904
बंगाल, ब्रिटिश भारत
मृत्यु : 5 अक्टूबर 1968 (उम्र 64)
बंगाव, पश्चिमी बंगाल, भारत

जोगेन्द्र नाथ मंडल जन्म बिरिसल जिले में हुआ था, उस समय बंगाल प्रेसीडेंसी, ब्रिटिश भारत, 1904 में बांग्लादेश का जन्म हुआ था। वे आधुनिक पाकिस्तान के प्रमुख संस्थापको में से एक थे, और देश के पहले कानून मंत्री ( 15 अगस्त 1947 – 8 अक्टूबर 1950 ) थे और यह राष्ट्रमंडल और कश्मीर मामलों के दूसरे मंत्री भी थे।

जोगेंद्र ने सन 1924 में इंटर और सन 1929 में बी. ए. पास कर पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई पहले ढाका और बाद में कलकत्ता विश्व विद्यालय से पूरी की थी । सन 1937 में उन्हें जिला काउन्सिल के लिए मनोनीत किया गया । इसी वर्ष उन्हें बंगाल लेजिस्लेटिव काउन्सिल का सदस्य चुना गया । सन 1939,40 तक वे कांग्रेस के साथ जुड़े रहे।

अनुसूचित जातियों (दलितों) के नेता के रूप में, जोगेंद्रनाथ ने मुस्लिम लीग के साथ पाकिस्तान के लिए अपनी मांग के साथ आम कारण बना दिया था, उम्मीद करते थे कि अनुसूचित जातियों को इसके लाभ मिलेगा और पाकिस्तान के पहले कैबिनेट में शामिल हो गए थे। कानून और श्रम पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमन्त्री लियाकत अली खान को अपना इस्तीफा देने के बाद पाकिस्तान के विभाजन के कुछ सालों बाद वह भारत में आकर चले गए, पाकिस्तानी प्रशासन के कथित हिंदू-विरोधी पूर्वाग्रह का हवाला देते हुए।

भारत में राजनीतिक कैरियर (1937-1947)

मंडल ने 1937 के भारतीय प्रांतीय विधानसभा चुनाव में एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में अपना राजनीतिक कैरियर शुरू किया। उन्होंने बखरागंज उत्तर पूर्व ग्रामीण निर्वाचन क्षेत्र को बंगाल विधान सभा में एक सीट पर चुनाव लड़ा और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की जिला समिति के अध्यक्ष सरकल कुमार दत्ता को पराजित किया। (कांग्रेस) और स्वदेशी नेता अश्विनी कुमार दत्ता के भतीजे थे।

सुभाष चंद्र बोस और शरतचंद्र बोस दोनों ने इस समय मंडल को काफी प्रभावित किया था। वर्ष1940 में मंडल मुस्लिम लीग (एमएल) के साथ जुड़ गए, जो एकमात्र अन्य महत्वपूर्ण राष्ट्रीय पार्टी थी, और एमएल के मुख्यमंत्री, हुसैन शहीद सुहरावर्दी के मंत्रिमंडल में एक मंत्री बने। वे मुस्लिम लीग के एक प्रमुख सदस्य थे।

जब 1946 में दंगे फैल गए, तो उन्होंने पूर्वी बंगाल के चारों ओर यात्रा की ताकि दलितों को मुसलमानों के खिलाफ हिंसा में भाग न लेने का आग्रह किया। उन्होंने तर्क दिया कि एमएल के साथ अपने विवाद में कांग्रेस के जाति हिंदुओं द्वारा प्यादे के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।

पाकिस्तान में राजनीतिक कैरियर (1947-1950)
15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश भारत के विभाजन के बाद, मंडल पाकिस्तान के संविधान सभा के सदस्य और अस्थायी अध्यक्ष बने, और प्रथम कानून और श्रम मंत्री के रूप में सेवा करने पर सहमत हो गए - और1947 से 1950 तक वह पाकिस्तान की तत्कालीन राजधानी कराची के बंदरगाह शहर में रहते थे।

भारत लौटें (1950)
पाकिस्तानी प्रशासन के विरोधी हिंदू पूर्वाग्रह का हवाला दे कर, 1950 में, पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को अपना इस्तीफा दे दिया। उन्होंने अपने इस्तीफे पत्र में सामाजिक अन्याय और गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों के प्रति पक्षपातपूर्ण व्यवहार से संबंधित घटनाओं का उल्लेख किया।

जब पाकिस्तान बना तो लाखो दलित पाकिस्तान चले गये  जिन्हें विश्वास था मुसलमान उनका साथ देंगे, उन्हें अपनाएंगे । जिन्ना को जोगेंद्र नाथ मंडल पर भरोसा था । वो मुहम्मद अली जिन्ना के काफी करीबी थे । दरअसल जोगेंद्र ने ही अपनी ताकत से असम के सयलहेट को पाकिस्तान में मिला दिया था । 3 जून 1947 की घोषणा के बाद असम के सयलहेट को जनमत संग्रह से यह तय करना था कि वो पाकिस्तान का हिस्सा बनेगा या भारत का। उस इलाकें में हिंदू मुस्लिम की संख्या बराबर थी। जिन्ना ने इलाके में मंडल को भेजा, मंडल ने वहां दलितों का मत पाकिस्तान के पक्ष में झुका दिया जिसके बाद सयलहेट पाकिस्तान का हिस्सा बना आज वो बांग्लादेश में हैं।

पाकिस्तान निर्माण के कुछ वक्त बाद गैर मुस्लिमो को निशाना बनाया जाने लगा। हिन्दुओ के साथ लूटमार, बलात्कार की घटनाएँ सामने आने लगी। मंडल ने इस विषय पर सरकार को कई खत लिखे लेकिन सरकार ने उनकी एक न सुनी। जोगेंद्र नाथ मंडल को बाहर करने के लिये उनकी देशभक्ति पर संदेह किया जाने लगा। मंडल को इस बात का एहसास हुआ जिस पाकिस्तान को उन्होंने अपना घर समझा था वो उनके रहने लायक नहीं है। मंडल बहुत आहात हुए, उन्हें विश्वास था पाकिस्तान में दलितों के साथ अन्याय नहीं होगा। करीबन दो सालों में ही दलित मुस्लिम एकता का मंडल का ख्बाब टूट गया। जिन्ना की मौत के बाद मंडल 8 अक्टूबर, 1950 को लियाकत अलीखां के मंत्री मंडल से त्याग पत्र देकर भारत आ गये।

जोगेंद्र नाथ मंडल ने अपने खत में मुस्लिम लीग से जुड़ने और अपने इस्तीफे की वजह को स्पष्ट किया, जिसके कुछ अंश यहाँ है । मंडल ने अपने खत में लिखा, 'बंगाल में मुस्लिम और दलितों की एक जैसी हालात थी । दोनों ही पिछड़े, मछुआरे, अशिक्षित थे । मुझे आश्वस्त किया गया था लीग के साथ मेरे सहयोग से ऐसे कदम उठाये जायेंगे जिससे बंगाल की बड़ी आबादी का भला होगा । हम मिलकर ऐसी आधारशिला रखेंगे जिससे साम्प्रदायिक शांति और सौहादर्य बढ़ेगा । इन्ही कारणों से मैंने मुस्लिम लीग का साथ दिया । 1946 में पाकिस्तान के निर्माण के लिये मुस्लिम लीग ने 'डायरेक्ट एक्शन डे' मनाया । जिसके बाद बंगाल में भीषण दंगे हुए । कलकत्ता के नोआखली नरसंहार में पिछड़ी जाति समेत कई हिन्दुओ की हत्याएं हुई, सैकड़ों ने इस्लाम कबूल लिया । हिंदू महिलाओं का बलात्कार, अपहरण किया गया । इसके बाद मैंने दंगा प्रभावित इलाकों का दौरा किया । मैने हिन्दुओ के भयानक दुःख देखे जिनसे अभिभूत हूँ लेकिन फिर भी मैंने मुस्लिम लीग के साथ सहयोग की नीति को जारी रखा ।

14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान बनने के बाद मुझे मंत्रीमंडल में शामिल किया गया । मैंने ख्वाजा नजीममुद्दीन से बात कर ईस्ट बंगाल की कैबिनेट में दो पिछड़ी जाति के लोगो को शामिल करने का अनुरोध किया । उन्होंने मुझसे ऐसा करने का वादा किया । लेकिन इसे टाल दिया गया जिससे मै बहुत हताश हुआ ।

मंडल ने अपने खत में पाकिस्तान में दलितों पर हुए अत्याचार की कई घटनाओं जिक्र किया उन्होंने लिखा, 'गोपालगंज के पास दीघरकुल (Digharkul ) में मुस्लिम की झूटी शिकायत पर स्थानीय नमोशूद्राय लोगो के साथ क्रूर अत्याचार किया गया । पुलिस के साथ मिलकर मुसलमानों ने मिलकर नमोशूद्राय समाज के लोगो को पीटा, घरों में छापे मारे । एक गर्भवती महिला की इतनी बेरहमी से पिटाई की गयी कि उसका मौके पर ही गर्भपात हो गया निर्दोष हिन्दुओ विशेष रूप से पिछड़े समुदाय के लोगो पर सेना और पुलिस ने भी हिंसा को बढ़ावा दिया । सयलहेट जिले के हबीबगढ़ में निर्दोष पुरुषो और महिलाओं को पीटा गया । सेना ने न केबल लोगो को पीटा बल्कि हिंदू पुरुषो को उनकी महिलाओं सैन्य शिविरों में भेजने के मजबूर किया ताकि वो सेना की कामुक इच्छाओं को पूरा कर सके । मैं इस मामले को आपके संज्ञान में लाया था, मुझे इस मामले में रिपोर्ट के लिये आश्वस्त किया गया लेकिन रिपोर्ट नहीं आई ।

खुलना (Khulna) जिले कलशैरा (Kalshira) में सशस्त्र पुलिस, सेना और स्थानीय लोगो ने निर्दयता से पुरे गाँव पर हमला किया। कई महिलाओं का पुलिस, सेना और स्थानीय लोगो द्वारा बलात्कार किया गया । मैने 28 फरवरी 1950 को कलशैरा और आसपास के गांवों का दौरा किया। जब मैं कलशैरा में आया तो देखा यहाँ जगह उजाड़ और खंडहर में बदल गयी। यहाँ करीबन 350 घरों को ध्वस्त कर दिया गया। मैंने तथ्यों के साथ आपको सूचना दी।

ढाका में नौ दिनों के प्रवास के दौरान में दंगा प्रभावित इलाकों का दौरा किया। ढाका नारायणगंज और ढाका चंटगाँव के बीच ट्रेनों और पटरियों पर निर्दोष हिन्दुओ की हत्याओं ने मुझे गहरा झटका दिया। मैंने ईस्ट बंगाल के मुख्यमंत्री से मुलाकर कर दंगा प्रसार को रोकने के लिये जरूरी कदमों को उठाने का आग्रह किया। 20 फरवरी 1950 को मैं बरिसाल (Barisal) पहुंचा। यहाँ की घटनाओं के बारे में जानकार में चकित था। यहाँ बड़ी संख्या में हिन्दुओ को जला दिया गया। उनकी बड़ी संख्या को खत्म कर दिया गया। मैंने जिले में लगभग सभी दंगा प्रभावित इलाकों का दौरा किया। मधापाशा (Madhabpasha) में जमींदार के घर में 200 लोगो की मौत हुई और 40 घायल थे । एक जगह है मुलादी (Muladi ), प्रत्यक्षदर्शी ने यहाँ भयानक नरक देखा । यहाँ 300 लोगो का कत्लेआम हुआ । वहां गाँव में शवो के कंकाल भी देखे नदी किनारे गिद्द और कुत्ते लाशो को खा रहे थे। यहाँ सभी पुरुषो की हत्याओं के बाद लड़कियों को आपस में बाँट लिया गया । राजापुर में 60 लोग मारे गये। बाबूगंज (Babuganj) में हिन्दुओ की सभी दुकानों को लूट आग लगा दी गयी ईस्ट बंगाल के दंगे में अनुमान के मुताबिक 10000 लोगो की हत्याएं हुई।


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