मातर तिहार - Matar Tihar

छत्तीसगढ़ के गांवो में मातर, मेला मंडाई छत्तीसगढ़ की परंपरा है। यहां सुरहोती (दीपावली) के अगले दिन गोवर्धन पूजा और उसके बाद के दिन को "मातर" कहा जाता है। "मातर" में मा का अर्थ है माता और 'तर" यानी उनकी शक्ति को जगाना।
इस पर्व में गाय की पूजा की जाती है। छत्तीसगढ़ में यह पर्व मुख्य रूप से यादव ( राउत, ठेठवार, पहटिया) समाज  के लोगो के द्वारा मनाया जाता है, परंतु अन्य समाज के लोग भी इसमे शामिल होते है।
यादव समुदाय के लोग घर-घर (जिनके घरों में गोवंश पाले जाते है) जा कर दोहा, नाचा करते है।

गौठान(दईहान) में होती है पूजा:
गांव के गौठान(दईहान) में यादव समुदाय के लोग पारंपरिक परिधान, बांहों में बांहकर, पेटी, कौड़ी से बने साजू, रंगबिरंगी पगड़ी, हाथों में फुलेता (फूलों से सजी तेंदू की लाठियां) और पांव में घुंघरू पहन कर इकट्ठा होते है। इकट्ठे हो कर खुड़हर देव, सांहड़ा देव, पशुधन और सोहाई की पूजा अर्चना की जाती है। यादव समाज के लोग गोवंश को सोहई, दुहर की माला पहनाते हैं। इसके बाद नए अनाज से गऊमाता के लिए भोजन बनता है, उसे घर के सभी सदस्य खाते हैं।

पर्व में गाय के गोबर का तिलक होता है। गाय के लिए बने प्रसाद से पूरा घर खाना खाता है और गाय के दूध से रात को खीर बनाई जाती है और सारी रात दोहे पढ़े जाते हैं।

इस पर्व में लाठी चलाने की भी परंपरा है। लाठी को खुद पर पड़ने से रोकने के लिए लोग हाथों में "फरी" पहने होते है, जो लोहे का बना एक ढाल जैसा होता है जिसके सामने से एक नुकीली आकृति निकली हुई होती है। इसे "लाठी झोकना" कहते है।

सोहई : सोहई, मोर पंख और दुहर, पेड़ की छाल से बनी विशेष माला होती हैं।
पहटिया : पहट के समय जगाने वाला।

मातर तिहार के साथ ही राज्य में गौरी-गौरा उत्सव मनाया जाता है।
>>गौरी-गौरा उत्सव