जहांगीर - Nur-ud-din Muhammad Salim (Jahangir)


जहाँगीर का जन्म 30 अगस्त, 1569 को फ़तेहपुर सीकरी में हुआ था। अकबर के तीन पुत्र थे। सलीम (जहाँगीर), मुराद और दानियाल। मुराद और दानियाल पिता के जीवन में मृत्यु को प्राप्त हो चुके थे। सलीम अकबर की मृत्यु पर "नूरुद्दीन मोहम्मद जहाँगीर" के उपनाम से तख्त पर बैठा। उसने 1605 ई. में कुछ उपयोगी सुधार लागू किए। कान, नाक और हाथ आदि काटने की सजा रद्द कीं। शराब और अन्य नशे आदि वाली वस्तुओं का हकमा बंद करवा दिया। किसी की भी फ़रियाद सुनने के लिए उसने अपने महल की दीवार से जंजीर ( सोने की )  लटका दी, जिसे "न्याय की जंजीर" कहा जाता था। यह जंजीर आगरे के किले शाहबुर्ज और यमुना तट पर स्थित पत्थर के खंबे में लगवाई हुई थी। अशोक को कौशांबी स्तंभ पर समुंद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति और जहांगीर का लेख उत्कीर्ण है।

जहांगीर ने अपनी आत्मकथा "तुजुक-ए-जहांगीर" लिखी थी, परन्तु इस आत्मकथा को पूरा करने का का श्रेय मौतबिंद खान को जाता है.


संतान :

  • खुसरो
  • खुर्रम 
  • शहरयार 
  • परवेज
  • जहाँदार


विद्रोह

खुसरो:

जहांगीर के सबसे बड़े बेटे खुसरो ने 1606 ई में अपने पिता के विरूद्ध विद्रोह कर दिया था। खुसरो और जहांगीर की सेना के बीच युद्ध जलांधर के पास हुआ और खुसरो को जेल में डाल दिया गया. खुसरो की सहायता करने के लिए जहांगीर ने सिक्खों के 5वें गुरु अर्जुन देव को फांसी दिलवा दी। खुसरो गुरु से गोइंदवाल में मिला था. 1622 ई में कंधार मुगलों के हाथ से निकल गया। इस पर शाह अब्बास ने अधिकार कर लिया।

खुर्रम(शाहजहाँ):

अपने ससुर आसफ खाँ के सहयोग से खुर्रम ने वर्ष 1623-24 में विद्रोह किया था। खुर्रम ने बिहार और बंगाल में स्वतंत्र संप्रभुता प्राप्त करने की भी कोशिश की थी। परन्तु, मुगल सेनापति महाबत खाँ से हार गया था।


नूरजहां

नूरजहां ईरानी निवासी मिर्जा ग्यास बेद की बेटी थी। उनका वास्तविक नाम मेहरून्निसा था। वर्ष 1549 में नूरजहां का विवाह अलीकुली बेग से हुआ। जहांगीर ने अलीकुली बेग को एक शेर मारने के कारण शेर अफगान की उपाधि दी थी। वर्ष 1607 में शेर अफगान की मौत के बाद मेहरून्निसा अकबर की विधवा सलीमा बेगम की सेवा में नियुक्त हुई. सबसे पहले जहांगीर ने नवरोज के अवसर पर मेहरून्निसा को देखा था और उससे वर्ष 1611 में विवाह कर लिया। विवाह के बाद जहांगीर ने उसे नूरमहल और नूरजहां की उपाधि दी। 

नूरजहां की बेटी मेहरून्निसा का विवाह शहरयार से हुआ था, और भाई असफ़ ख़ान की बेटी अर्जुमंद बानो (मुमताज महल) का विवाह शाहजहां से करवाया। नूरजहां एकमात्र मुगल साम्राज्ञी थी जिसके नाम पर सिक्के रखे गए थे।


सफेद संगमरमर का प्रथम मकबरा

इतमाद-उद-दौला का मकबरा 1626 ई में नूरजहां बेगम ने बनवाया था.मुगलकालीन वास्तुकला के अंतर्गत यह पहली इमारत थी जो सफेद संगमरमर से बनी थी।


चित्रकला 

मुगल चित्रकला जहांगीर के काल में अपनी चरम सीमा पर थी. वह स्वयं भी उत्तम चित्रकार और कला का पारखी था। उस समय मंसूर, बिशनदास और मनोहर प्रमुख चित्रकार थे। जहांगीर ने अपनी आत्मकथा में लिखा कि कोई भी चित्र चाहे वह किसी मृतक का हो या जीवित व्यक्ति द्वारा बनाया हो मैं देखते ही तुरंत बता सकता हूं कि ये किसकी कृति है।


जहाँगीर का सैन्य अभियान

जहाँगीर ने वर्ष 1617 में खुर्रम को अहमदनगर अभियान पर भेजा और स्वयं मांडू पहुँच गया। किन्तु अहमदनगर और मुगलों में संधि हो गयी। जहाँगीर ने संधि के फलस्वरूप खुर्रम को "शाहजहाँ" की उपाधि दी तथा बीजापुर के शासक को फर्जन्द (पुत्र ) की उपाधि दी।

1621ई. में जहाँगीर ने अपना दक्षिण अभियान समाप्त कर दिया क्योंकि इसके बाद उसे 1623ई. में शाहजहाँ के विद्रोह, और 1626ई. में महावत खाँ के विद्रोह के कारण दक्षिण की ओर ध्यान देने का अवसर ही नहीं प्राप्त हो सका।

जहाँगीर के राज्यकाल की एक उल्लेखनीय सैनिक सफलता 1620ई. में उत्तरी-पूर्वी पंजाब की पङाङियों पर स्थित कांगङा के दुर्ग पर अधिकार करना।

जहाँगीर के शासन काल में  वर्ष 1622 में फारस के शाह ने कंधार को मुगलों से छीन लिया।


अंग्रेजो का आगमन

जहॉंगीर के दरबार में अंग्रेज कैप्टन हॉकिन्स वर्ष 1609 में जेम्स प्रथम के राजदूत के रूप में दरबार में गया था। वर्ष 1615 में सम्राट जेम्स प्रथम ने सर टॉमस रो को अपना राजदूत बनाकर मुगल सम्राट जहांगीर के दरबार में भेजा। अंग्रेजों की प्रथम व्यापारिक कोठी (फैक्ट्री) सूरत में वर्ष 1608 में खोली गई। वर्ष 1611 में दक्षिण पूरब समुद्रतट पर सर्वप्रथम अंग्रेजों ने मुसलीपट्टम में व्यापारिक कोठी की स्थापना की।


जहांगीर का मकबरा

तबियत खराब होने की वजह से 28 अक्तूबर, 1627 को जहांगीर की मृत्यू हो गयी। जहांगीर की मौत के बाद उनकी अंतिम इच्छा के अनुसार उन्हें शहादरा के एक बगीचे में दफनाया गया था। मकबरे का निर्माण वर्ष 1627 से 1637 के बिच करीब 10 साल तक चला।

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