छत्तीसगढ़ का प्रागैतिहासिक एवं प्राचीन इतिहास : Prehistoric and Ancient History Of Chhattisgarh


छत्तीसगढ के प्राचीन इतिहास को 5 भागो में बाँटा जा सकता है जो निम्न है :

  1. प्रागैतिहासिक काल
  2. वैदिक काल
  3. बुद्ध काल
  4. मौर्य एवं सात वाहन काल
  5. गुप्त काल
प्रागैतिहासिक काल
प्रागैतिहासिक काल उसे कहते है जिस काल में मनुष्यों ने उस समय होने वाली किसी भी घटनाओं का कोई लिखित प्रमाण नही  रखा । इस काल के अनेक प्रमाण छत्तीसगढ़ के विभिन्न क्षेत्रों से मिले है, इस काल में मनुष्य ( गुफाओ ) कंदराओ में रहता था, तब उसने इन शैलाश्रयों में अनेक चित्र बनाए, इसके अलावा इस काल के विविध औजार एवं स्मारक भी छत्तीसगढ़ में मिले है –

छत्तीसगढ़ में निम्न क्षेत्रों से शैलचित्रों की प्राप्ति हुई है यह है : 

जोगीमारा गुफा : जोगीमरा गुफा जो संसगुजा के समीप रामगढ़ पहाड़ी में रिथत है, जहाँ से अधिकांश चित्र खेरूए रंग के प्राप्त हुए है, जिनमें मुख्य पशु-पक्षी, वृक्ष आदि के साथ सामाजिक जीवन की अभिव्यकित के चित्र मिलते।

सिंधनुर तथा कबरा पहाड : रायगढ़ के इन स्थानों से शैलचित्र की प्राप्ति हुई है जो है : सिंघनपुर से लाल रंग की चित्रकारी, जिनमें शिकार दृश्य का अंकन मिला है, तथा मानव आकृतियाँ, सीधी डंड़े के आकार की तथा सीढ़ी के आकार में अंक्ति की गई है।

कबरा पहाड़ - यहाँ से भी लाल रंग से विभिन्न चित्र प्राप्त हुए है जो है : छिपकिली, धाड़ियाल, सांभर, अन्य पशुओं तथा पंक्ति बद्ध मानव समूह सहित प्रतीकात्मक चित्रांकन किया है।

बिलासुपर जिले के धनपुर तथा रायगढ़ जिले के सिंधनपुर में स्थित चित्रित शैलाक्षय के निकट से उत्तर पाषाण युग लघुकृत पाष्ण औजार प्राप्त हुए है।


नव पाषाण काल : अर्जुनी ( चित्रित हथौड़े ) जो दुर्ग मे स्थित है, राजनांदगाँव के पास बोनटीला मे, चितवाडोंगरी तथा रायगढ़ के टेरम नामक जगहॉ से मिले है।

महापाषण स्मारक : दुर्ग के पास करही भदर, चिरचारी और सोरर में पाषण घेरों के अवशेष मिले है, जिसे शव गाड़ने के लिए बड़े बड़े शिलाखंडो का प्रयोग किया जाता था। जिसे महापाषाण स्मारक के नाम से जाना जाता था।

काष्ठ स्तम्भ : वीर नायकों के सम्मान में बस्तर क्षेत्र से अनेक काष्ठ स्तम्भ प्राप्त हुए है जो कि उनके सम्मान मे स्थापित किए गये थे। मसेनार डिलामिली, चित्रकूट किलेपाल, चिंगेनार आदि से स्मारक प्राप्त हुए है।

  • पूर्व पाषाण युग- महानदी घाटी, सिंघनपुर
  • मध्य युग- कबरा पहाड़
  • उत्तर पाषाण युग- महानदी, घाटी, घनपुर, सिंघनपुर
  • नव पाषाण युग- अर्जुनी, चितवा डोंगरी, बोनलोला, टेरम
  • लौह युगीन पाषाण स्तंभ- करही भदर , चिररारी, सोरर, करका भाटा, धनोरा
छत्तीसगढ़ में पाषाण कालीन स्थल 
पूर्व पाषाण काल : रायगढ़ के सिंघनपुर, कबरा पहाड़, बोतल्दा, छपामाडा , भंवरखोल, जीधा, सोनबससा
मध्य पाषाण काल : गढ़घनौरा, गढ़चंदेला, कातीपुर, राजपुर, भातेवाड़ा, खड़ागघाट, घाटलोहांग
उत्तर पाषाण काल : रायगढ़ के कबरा पहाड़, सिंघनपुर, महानदी घाटी, धनपुर, करमागढ़, बसनाझर, आंगना, बोलदा
नवपाषाण काल : अर्जुनी ( दुर्ग ), टेरम ( रायगढ़ ), बोनटीला, चितवा डोंगरी ( राजनांदगाँव )
महापाषाण युग : करही भदर, चिररारी ( दुर्ग )
राज्य में सर्वाधिक शैलचित्रः रायगढ़ जिले से प्राप्त
प्राचीनतम शैलाश्रय : सिंघनपुर ( रायगढ़ )


वैदिक काल
वैदिक सभ्यता को दो भागों में बांट जाता है –

1. ऋग्वेदिक काल ( 1500 ई. पू. से 1000 ई. पूू.)
2. उत्तरवेदिक काल ( 1000 ई. पूू. से 600 ई. पूू.)

ऋग्वैदिक काल का छत्तीसगढ़ में कोई प्रमाण नहीं मिले है, उत्तर वैदिक काल में साहित्य में र्नमदा का उल्लेख रेवा नदी के रूप में मिला है।

उत्तर वैदिक ( 100 – 600 ई. पू. ) – ऋग्वैदिक काल के लोग पंजाब के क्षेत्र में रहते थे, तो पंजाब थोड़ा पाकिस्तान में था , तो आर्य सबसे पहले सिंधु तथा सरस्वती नदियों के किनारे बसे ( जिन्हें हम ऋग्वेदिक आर्य कहते है ) उत्तर वैदिक आर्य पूर्व की ओर बढ़ चले थे, और इसी समय में उनको लोहे का ज्ञान हो गया था। और इसी के साथ साथ उन्होंने खेती में लोहे का प्रयोग करना सीख लिया था। जिस अब वह खेती करने लगे थे और वह एक स्थान पर स्थिर रहने लगे थे। और कृषि में अधिक से अधिक  पैदावार करने लगे थे, और इस कारण से उत्पादन में बढ़ोतरी हुं और उत्पादन में बढ़ोतरी होने के करण ( खानाबदोश और घुमक्कड ) जीवन जीने में सुधार आया।

उत्तर वैदिक काल में शेष तीन वेद, ब्राह्मण आरण्यक और उपनिषद साहित्य की रचना हुई। 

नोट : इन्ही साहित्य सें हमें उत्तर वैदिक काल की जानकरी मिलती है। और हमें साहित्य से ही उत्तर वैदिक काल की जानकरी नही मिलती, खुदाई द्वारा उत्तर वैदिक काल के बारे में जानकारी मिलती है।

पूर्व वैदिक काल : छत्तीसगढ़ का कोई स्पष्ट जानकारी प्राप्त नही मिलता, परन्तु उत्तर वैदिक काल मे इस क्षेत्र का उल्लेख रामायाण, महाभारत और पुराणोँ में छत्तीसगढ़ की जानकारी अधिक विस्तार से देखने को मिलती है।

रामायण काल के समय विंध्य पर्वत के दक्षिण में कोसल नामक एक शक्तिशाली राजा था इसी से इस क्षेत्र का नाम कोसल पड़ा। रामायण ग्रन्थ से यह पाता चलता है जो भारत देश था वो दो भागों में बंटा था – ऊपर का भाग दक्षिण कोसल और नीचे का भाग उत्तर कोसल (उत्तर के क्षेत्र को उत्तर कोसल और दक्षिण के क्षेत्र को दक्षिण कोसल ) के नाम से जाना जाता है। तो जो दक्षिण मे था वो छत्तीसगढ़ का हिस्सा था। ऐसा कहाँ जाता है जो छत्तीसगढ़ के जो राजा थे, भानुमती और जो माता कौशल्या  के पिताजी थे। और माता कौशल्या के पुत्र राम है, तो जब भानुमत जी का शसान था, उसके बाद महराज दशराथ जो राम के पिता थे, लो उनकों यह क्षेत्र प्राप्त हुवा और आगे चल कर यह राम के शसान क्षेत्र मे सीम्मलित हो गया। इन्ही सब कारणों से जो साक्ष्य प्राप्त हुं है उसे पाता चलता है छत्तीसगढ़ को दक्षिण कोसल कहा गया है।

नोट – भानुमंत राजा जिनकी पुत्री कौशल्या थी, कैशल्या थी, कौशल्या राजा दशरथ की तीन रानियों में प्रथम एवं राम की माता थी, भानुमंत का पुत्र नही था इस कारण कोसल राज्य दशरथ के क्षेत्र में मिला लिया गया, इस तरह यह अयोध्या का हिस्सा और कालान्तर में राम यहाँ के भी शासक हुए।


राम के 14 वर्षीय वनवास का अधिकांश समय इसी क्षेत्र में व्यतीत हुआ राम ने शिवरीनारायण की यात्रा की थी और वही पर सबरी के जूठे बेर खाए थे।
माना जाता है लव और कुश का जन्म तुरतुरिया ( बारनवापारा ) में हुआ था, राम के बाद लव उत्तर कोसल और कुश दक्षिण कोसल के शासक हुए कुश की राजधानी कुशस्थल थी, और छत्तीसगढ़ दक्षिण कोसल का हिस्सा था।

महाभारत में कोसल, कांतर राज्य जिसे बस्तर कहा जाता है उसका भी उल्लेख हमें छत्तीसगढ़ मे प्राप्त होता है।
तथा राजा नल की विजय यात्रा एवं राजा कर्ण की की विजय यात्रा का प्रमाण हुए है, और शिशुपाल के संदर्भ में भी कोसल का उल्लेख देखने को मिलता है।
महाभारत काल में मीणपुर जिसे अब रतनपुर कहाँ जाता है जो की इस क्षेत्र का मुख्य केन्द्र रहा था, और मोरध्वज यहाँ का शासक था
महाभारत काल में सिरपुर  जो अब चित्रंगदपुर कहलता था, जिस पर पाण्डुवंशी बभ्रुवाहन का शासन था।
पौराणिक साहित्य में इस क्षेत्र के भूगोल और इतिहास की पर्याप्त जानकारी मिलती है, पौराणिक स्रोतो के अनुसर इस क्षेत्र में इश्वा कुवंशियों का शासन था, और यह क्षेत्र मनु वैवश्वत् के पौत्र विनताश्व को प्राप्त हुवा था।
महात्मा बुद्ध दक्षिण कौशल आए थे "अवदान शतक ग्रंथ के अनुसार" ह्वेनसांग के यात्रा वृत्तांत से एसी जानकारी मिलती है।


बुद्धकाल ( 6 वी शताब्दी ई. पू. ) 
महात्मा बुद्ध दक्षिण कौशल आए थे "अवदान शतक" ग्रंथ के अनुसार ह्वेनसांग के यात्रा वृत्तांत से एसी जानकारी मिलती है।


मौर्य एवं सातवाहन काल  
मौर्यकालीन लेखों से पता चलता है इस क्षेत्र में मौयो का प्रभुत्व रहा है, परवर्ती बुद्धकाल में यह क्षेत्र पहले नंदवंश एव बाद में मौर्यवंश के अधीन रहा, ह्वेनसांग के विवरण एवं सरगुजा जिले की सीताबेंगरा गुफाओं और जोगीमारा गुफाओं के मौर्यकालीन लेखों में इन सभी का स्पष्ट जानकारी मिलती है।
इस क्षेत्र से मौर्य कालीन आहत सिक्कों की प्राप्ति हुई हैै और पकी ईटों एवं उत्तरी काले पालिशदर बर्तनों के अवशेष से मौर्थकालीन् के स्पष्ट जानकारी मिले हैै।
इस क्षेत्र बिलासपुर से सातवाहन कालीन सिक्के प्राप्त हुए जो कि मौर्यो के पश्चात प्रतिष्ठान या पैठन ( महाराष्ट्र क्षेत्र ) के सातवाहन वंश का इस क्षेत्र में शासन रहा।
ह्वेनसांग के विवरण के अनुसार दार्शनिक नागार्जुन दक्षिण कौशल की राजधानी के निकट निवास करता था।
बाद में संभवत : मेघवंश ने इस क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित किया।
सातवाहन के पश्चात् वाकाटकों का अभ्युदय हुआ, वाकाटक शासक प्रवरसेन प्रथम ने दाक्षिण कोसल के समूचे क्षेत्र पर अपना धिकार स्थापित कर लिया। इनके आश्रय में कुछ समय भारत के प्रसिद्ध कावि कालिदास रहे थे।

गुप्तकाल
गुप्त सम्राट के दखारी कवि हीरषेण की प्रयाग प्रशस्ति में समुद्रगुप्त के दक्षिण भारत के धर्मविजय अभियान का उल्लेख है, इस अभियान के दौरान समुद्रगुप्त ने दक्षिण कोसल के शासक महेन्द्र एवं महाकान्तार ( बस्तर क्षेत्र ) के शासक व्याघ्रराज को परास्त किया, पर इस क्षेत्र का गुप्त साम्राज्य में विलय नहीं किया गया।

गुप्त कालीन सिक्कों प्राप्त हुए बानरद ( जि. दुर्ग )  एवं आरंग ( जि. रायपुर ) इस प्रकार से यह स्पष्ट होता है यहाँ के क्षेत्रीय शासकों ने गुप्तवंश का प्रभुत्व स्वीकार कर लिया था।

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