सिंधु घाटी सभ्यता ( प्रमुख स्थल )

Image Source : Saqib Qayyum | Wikipedia


सिंधु घाटी सभ्यता (3300-1700 ई.पू.) विश्व की प्राचीन नदी घाटी सभ्यताओं में से एक थी। सबसे पहले वर्ष 1927 में "हड़प्पा" नामक स्थल पर उत्खनन होने के कारण "सिन्धु सभ्यता" का नाम 'हड़प्पा सभ्यता' पड़ा। यह सभ्यता लगभग 2500 ईस्वी पूर्व दक्षिण एशिया के पश्चिमी भाग मैं फैली हुई थी,जो कि वर्तमान में पाकिस्तान तथा पश्चिमी भारत के नाम से जाना जाता है। सभ्यता की खोज का श्रेय 'रायबहादुर दयाराम साहनी' को जाता है। उन्होंने ही पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग के महानिदेशक 'सर जॉन मार्शल' के निर्देशन में वर्ष 1921 में इस स्थान की खुदाई करवायी।


खोज कैसे हुई ?

पूर्व पाकिस्तान के "पश्चिमी पंजाब प्रां" के "माण्टगोमरी ज़िले" में स्थित "हरियाणा" के निवासियों अपने आस-पास की ज़मीन में दबी जिन ईटों का प्रयोग अपने मकानों के निर्माण में कर रहे थे। जब 1856 ई. में "जॉन विलियम ब्रन्टम" ने कराची से लाहौर तक रेलवे लाइन बिछवाने हेतु ईटों की आपूर्ति के इन खण्डहरों की खुदाई प्रारम्भ करवायी। खुदाई के दौरान ही इस सभ्यता के प्रथम अवशेष प्राप्त हुए, जिसे इस सभ्यता का नाम "हड़प्पा सभ्यता" का नाम दिया गया। चूंकि ये स्थल सिंधु नदी के पास थी, इस वजह से इसे सिंधु घाटी सभ्यता कहा गया। रेडियो कार्बन c14 पद्धति के द्वारा सिंधु घाटी सभ्यता की तिथि 2350 ई पू से 1750 ई पूर्व मानी गई हैै।


खोज:

रायबहादुर दयाराम साहनी ने पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग के महानिदेशक सर जॉन मार्शल के निर्देशन में वर्ष 1921 में इस स्थान की खुदाई करवायी। लगभग एक वर्ष बाद 1922 में राखल दास बनर्जी के नेतृत्व में पाकिस्तान के सिंध प्रान्त के "लरकाना" ज़िले के मोहनजोदाड़ो में स्थित एक बौद्ध स्तूप की खुदाई के समय एक और स्थान का पता चला। इस नवीनतम स्थान के प्रकाश में आने क उपरान्त यह मान लिया गया कि संभवतः यह सभ्यता सिंधु नदी की घाटी तक ही सीमित है, अतः इस सभ्यता का नाम ‘सिधु घाटी की सभ्यता‘ (Indus Valley Civilization) रखा गया। सबसे पहले 1927 में 'हड़प्पा' नामक स्थल पर उत्खनन होने के कारण 'सिन्धु सभ्यता' का नाम 'हड़प्पा सभ्यता' पड़ा। 



हड़प्पा

  • दया राम साहनी द्वारा 1921-1923 में खुदाई की गयी थी।
  • पंजाब (पाकिस्तान) मोंटगोमरी जिले में रवी नदी के तट पर स्थित है।
  • पत्थर की नटराज की मूर्ति और कब्रिस्तान-37 यहां खुदाई के दौरान मिली।


मोहनजो-दड़ो (मृत के टीले)

  • आर डी बनर्जी ने 1922 द्वारा खुदाई की गयी थी।
  • पंजाब (पाकिस्तान) के लरकाना जिले में सिंधु नदी के तट पर स्थित है।
  • स्नानागार, मंडल भवन, विधानसभा हॉल, पशुपति महादेव (आद्य शिव) की मुहर और बुना कपास के टुकडे खुदाई के दौरान मिली है।


चाहुदारो  (सिंध , पाकिस्तान)

  • वर्ष 1931 में एन.जी मजूमदार द्वारा खुदाई की गयी थी।
  • सिंध, पाकिस्तान में सिंधु नदी के तट पर स्थित है।
  • यह सिन्धु घटी की ऐसी स्थल जहा सिटाडेल (Citadel) नहीं है।
  • बैलगाड़ी , इक्कास  और एक छोटे बर्तन जो की आग में पकाए हुये तथा कांस्य मूर्तियों खुदाई के दौरान मिली है।


लोथल (गुजरात)

  • वर्ष 1954 में एस.आर राव द्वारा खुदाई की गयी थी।
  • यह स्थल नदी भोगवा  के तट पर स्थित है।
  • शहर का विभाजन - गढ़ और निचले शहर और गोदी (जहाज़ बनाने का स्थान) में किया गया था।
  • यहाँ चावल के साक्ष्य पाये गए हैं।


कालीबंगा (काला चूड़ियाँ ), राजस्थान

  • वर्ष 1961 में बी. बी लाल द्वारा खुदाई की गयी थी।
  • यह स्थल घग्गर के तट पर स्थित है।
  • जोता क्षेत्र, लकड़ी के कुंड के साक्ष्य, सात आग वेदियों, ऊंट की हड्डियों और अंत्येष्टि के दो प्रकार (परिपत्र गंभीर और आयताकार कब्र) पाया गया है।


धोलावीरा

  • वर्ष 1967-68 में जे.पी जोशी द्वारा खुदाई की गयी थी।
  • गुजरात में कच्छ जिले के लूनी नदी के तट पर स्थित है।
  • यहाँ जल प्रबंधन प्रणाली के साक्ष्य, हरपण  शिलालेख और स्टेडियम मिले हैं।


सुरकोतड़ा  (गुजरात)

  • वर्ष 1961 में बी.बी लाल द्वारा खुदाई की गयी है।
  • यह यह स्थल घग्गर के तट पर स्थित।


बनावली  (हरियाणा)

  • वर्ष 1973 में आर.एस बिष्ट द्वारा खुदाई की गयी थी।
  • यह स्थल सरस्वती नदी के तट पर स्थित हैं।
  • जौ के साक्ष्य यहाँ मिले 



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