भारत में अरबों का आक्रमण - Arab invasion in India


भारत और अरब के बीच व्यापार प्राचीन काल से होते आए है। गुप्त काल में भारतीय व्यापारी अरब के रास्ते ही रोम के साथ व्यापार किया करते थे। परंतु, गुप्तोत्तर काल आते-आते भारतीय व्यापारियों की रोम के साथ ये व्यापारिक गतिविधियां कम हो गईं। व्यापार के लिए आए अरबी व्यापारियों ने मालाबार के तट के आसपास अपनी बस्तियां भी बसा ली थीं। 

7वीं शताब्दी में अरब में इस्लाम धर्म का उदय हुआ, और 632 ईसवी में इस्लाम धर्म के प्रवर्तक मोहम्मद साहब की मृत्यु के पश्चात खलीफा पद शुरू हो गया। इस्लाम धर्म का प्रचार बड़ी तीव्रता से पूरे अरब में होने लगा। इन ख़लीफ़ाओं ने इस्लाम धर्म का प्रचार करने के लिए अपने प्रतिनिधि दूर-दराज देशों में भेजने शुरू कर दिए। भारत आने का एक बड़ा कारण धर्म प्रचार ही था।


अरब ( मुस्लिम ) आक्रमण

असफल (पहला हमला):

उमर बिन अल खतब के खलीफा का पद ग्रहण करने के बाद वर्ष 636 में अरब के मुस्लिम आक्रांताओ ने समुद्र के रास्ते मुम्बई के ठाणे बंदरगाह पर असफल सैनिक अभियान किया। वर्ष 647 में अब्दुल्ला बिन उमर के नेतृत्व में मकरान के रास्ते सिंध पर मुस्लिम आक्रमण हुआ। यह अभियान सफल रहा उस समय उस्मान बिन अफ़्फ़ान खलीफा पद पर थे। वर्ष 659 में अल हैरिस के नेतृत्व में सिंध पर पुनः आक्रमण हुआ जो असफल रहा। अली बिन अबी तालिब उस समय खलीफा थे। वर्ष 664 में जब उमय्यद वंश के पास खलीफा पद था उस समय भी सिंध पर असफल अभियान हुआ। वर्ष 711 में उबेदुल्लाह तथा बर्दूल के नेतृत्व में सैनिक अभियान हुए जो भी असफल रहेे थे।


पहला सफल हमला:

712 ई. में मोहम्मद बिन कासिम के नेतृत्व में सिंध पर अरब का सफल आक्रमण हुआ। 710 ई. में मोहम्मद बिन कासिम ईरान के प्रान्तपाल अल्ल हज्जाज के आदेश पर 15000 पैदल सैना तथा कुछ अश्वसेना व ऊंट सैना के साथ ईरान के शिराज शहर से रवाना हुआ। 711 ई. दिसम्बर माह के आसपास अपने सैनिकों के साथ मकरान होता हुआ वह सिंध की सीमा पर पहुंचा। उस समय सिंध का शासक दाहिर सेन था। मोहम्मद बिन कासिम ने अपना पहला अभियान सिंध के देवल (दैबुल/देबल) में किया। मोहम्मद बिन कासिम ने देवल पर दो तरफ से, जल मार्ग तथा स्थल मार्ग से आक्रमण किया। इस हमले में राजकुमार जयशाह के नेतृत्व वाली सिंध की सेना की पराजय हुई।

जब देवल पर अरब सेना के कब्जे की खबर सुन कर राजा दाहिल अपनी सेना के साथ राजधानी ब्राह्मणाबाद से सिंध नदी के पूर्वी तट पर स्थित रावर नामक स्थान पर पहुंचा। उधर मोहम्मद बिन कासिम बढ़ा और सेहवन पर अधिकार कर लिया। धीरे-धीरे मोहम्मद बिन कासिम ने पश्चिमी सिंध के सभी छोटे-छोटे सूबों को जीत लिया । पश्चिमी सिंध के इन अभियानों में स्थानीय लोगों ने मोहम्मद बिन कासिम का साथ दिया जिनमें कुछ जाटों के तथा कुछ बौद्ध मत के लोग थे जो दाहिर को अपना दुश्मन मानते थे। ये लोग दाहिर के शासन से नाखुश थे। इनका आरोप था कि दाहिर ने उनकी अवहेलना करते हुए शासन के सभी महत्वपूर्ण पदों पर ब्राह्मणों को नियुक्त किया है तथा उनके समाज पर अत्याचार किया है। पश्चिमी सिंध पर अपनी सफलता के पश्चात सिंध नदी पार कर मोहम्मद बिन कासिम भी रावर पहुंचा।

20 जून, 712 में रावर में दोनों सेनाओं के मध्य युद्ध हुआ। इस युद्ध के दौरान, अचानक राजा दाहिर के हाथी की आँख में तीर लगने से हाथी अनियंत्रित हो गया, जिस वजह से राजा दाहिर नीचे गिर पड़ता है। नीचे खड़ी अरब सेना ने भाले व तलवार से राजा दाहिर सेन की हत्या कर दी। अपने राजा की मौत के बाद सिंध सेना का मनोबल टूट गया और युद्ध क्षेत्र से भाग गई। इस प्रकार मोहम्मद बिन कासिम ने सफलतापूर्वक रावर पर अधिकार कर लिया। 


रावर में विजय प्राप्त करने के बाद कसीम आगे बढ़ता हुआ राजधानी ब्राह्मणबाद पहुंचा जहां महल की ओरतों ने अरब सेना से लोहा लिया। महल की औरतों ने अरब सेना का जमकर मुकाबला किया लेकिन जब अरब सेना उन पर भारी पड़ने लगी तो उन्होंने सामुहिक रूप से जोहर कर लिया। लेकिन इस बीच मोहम्मद बिन कासिम ने दाहिर की दोनों बेटियों तथा महल की कुछ औरतों को बंदी बनाकर उपहारस्वरूप खलीफा के पास दमिश्क भेज दिया।


ब्राह्मणबाद किले पर अधिकार करने के पश्चात मोहम्मद बिन कासिम अरोर (अलवर भी कहा जाता था) पहुंचा जहां दाहिर के परिवार के कुछ लोग रहते थे। यहां के लोग ने आत्मसमर्पण कर दिया। इस प्रकार मोहम्मद बिन कासिम प्रथम की पूरे सिंध पर विजय प्राप्त की।यह भारत में प्रथम सफल मुस्लिम ( अरब ) अभियान था।

सिंध पर विजय प्राप्त करने के बाद वर्ष 713 में उसने मुल्तान पर भी अधिकार कर लिया। मोहम्मद बिन कासिम को मुल्तान की विजय से इतना अधिक सोना प्राप्त हुआ कि उन्होंने मुल्तान का नाम ही सोने का नगर रख दिया ।

अरबों ने भारत पर आक्रमण करने का प्रयास किया, लेकिन वे 8 वीं शताब्दी की शुरुआत में गुर्जर प्रतिहार वंश के उत्तर भारतीय राजा नागभट्ट और 8 वीं शताब्दी के चालुक्य वंश के दक्षिण भारतीय सम्राट विक्रमादित्य द्वारा पराजित हुए।


अन्य आक्रमण :

राजा दाहिर के पुत्र जयशाह ने सिंध के सामन्तों से मिलकर अरब सेना को पराजित कर ब्राह्मणाबाद तथा अरोर पर पुनः अधिकार कर लिया उस समय उमर इब्न अब्द अल- अजीज खलीफा थे उमर ने सेनापति हबीब के नेतृत्व में अपनी एक सेना सिन्ध भेजी। हबीब ने जयशाह को पराजित कर अरोर तथा छोटे-छोटे प्रांतों पर अधिकार कर लिया। तत्कालीन खलीफा उमर ने जयशाह के सामने यह शर्त रखी कि यदि वह इस्लाम स्वीकार कर लेता है तो वह स्वतन्त्र रूप से ब्राह्मणाबाद पर शासन कर सकता है। जयशाह तथा सिन्ध के अन्य सामंतों ने झगडे से बचने के लिए इस्लाम स्वीकार कर लिया। लेकिन कुछ वर्षों बाद जब जयशाह को अपनी इस गलती से आत्मग्लानि हुई तो उसने इस्लाम त्याग दिया। इस बात से तत्कालीन खलीफा ने अपनी सेना सिन्ध भेजी। जयशाह जुनैद के साथ युद्ध में पराजित होकर बंदी बना लिया जाता है तथा बाद में उसकी हत्या कर दी।

सिंध में अपनी सफलता के बाद अरब आक्रमणकारी अब मेवाड़, मालवा तथा अन्य प्रांतों पर भी अधिकार करना चाहते थे। वर्ष 730 के आसपास जुनैद अपने सेनापतियों के साथ मेवाड़, गुजरात, सौराष्ट्र तथा मालवा की तरफ बढ़ा। लेकिन गुर्जर प्रतिहार शासक नागभट्ट, चित्तौड़ के शासक बप्पारावल तथा चालुक्य शासक ने उन्हें वहां से खदेड़ दिया। नागभट्ट तथा बप्पारावल की सेनाओं ने राजस्थान-सिंध सीमा पर एक बड़े युद्ध में जुनैद की सेना को पराजित किया जुनैद युद्ध में लड़ता हुआ मारा गया। इस प्रकार, वर्ष 871 तक सम्पूर्ण सिन्ध अरबों के नियंत्रण से मुक्त हो गया था।

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