रविंद्रनाथ टैगोर जी का छत्तीसगढ़ आगमन - Rabindranath Tagore in Chhattisgarh

गुरुदेवर रविंद्रनाथटैगोर जी का छत्तीसगढ़ आगमन सितंबर, 1902 हुआ था। गुरूदेव की पत्नी मृणालिनी देवी टीबी रोग की मरीज थी। गुरूदेव उनके इलाज के लिए (तब मध्यप्रान्त) बिलासपुर जिले के पेंड्रा आए थे। पेंड्रा में करीब 2 महीनो तक रह कर उन्होंने अपनी पत्नी का इलाज करवाया, परंतु इलाज के दौरान 23 नवंबर, 1902 को उनकी मृत्य हो गई।

पेंड्रा में स्थित सेनेटोरियम में तब टीबी का इलाज होता था। टीबी रोग तब बहुत गंभीर बिमारी होती थी। इजाल सुलभ नहीं था। वे अपनी पत्नी को लेकर आए थे।


बिलासपुर रेल्वे स्टेशन

वर्ष 1918 कोलकाता से पेंड्रा जाते समय उन्हें बिलासपुर स्टेशन में रूकना पड़ा, क्योंकि कोलकाता से पेंड्रा के लिए सीधी ट्रेन नहीं थी। पेंड्रा के लिए अगली ट्रेन 6 घंटे बाद थी, इस लिए उन्हें प्रतीक्षा कक्ष में रुकना पड़ा। जिस वक्त वे बैठे हुए थे उसी वक्त उनकी पत्नी मृणालिनी के पास एक भिखारन रूखमणी आयी। रूखमणी की आपबीती सुन का मृणालिनी भावुक हो गयी। मृणालिनी उस महिला की मद्दत करना चाहती थी, परन्तु रवीन्द्रनाथ टैगोर ने 25 रुपये की राशि नहीं दी, जिसका उन्हें बाद में पश्च्याताप हुआ। गुरुदेव ने इसी धोखे का उल्लेख अपनी कविता फांकी में किया है।

 "बिलासपुर" इस शब्द को गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने अपनी कविता 'फांकी' की पंक्तियों में जगह दी है। कारण यह कि इस कविता को 

उन्होंने वर्ष 1918 में बिलासपुर स्टेशन में छह घंटे बिताने के दौरान यहां के अनुभवों के आधार पर रची थी। बिलासपुर रेलवे ने भी इस कविता को धरोहर के रूप में सहेजकर रखा है। गुरुदेव ने ट्रेन से उतरते ही कहा था- 

बिलासपुर स्टेशन में बदलनी है गाड़ी, तारातरि(जल्दी ही) उतरना पड़ा, मुसाफिरखाने में पड़ेगा छह घंटे ठहरना..।


फांकी कविता :

रविन्द्र नाथ टैगोर जी ने छत्तीसगढ़ यात्रा के दौरान कविता फांकि ( धोखा ) लिखी। यह कविता उनके काव्य संग्रह पलातका में है। इस कविता में दो जगहों पर बिलासपुर का जिक्र है। उनकी कविता को एक धरोहर के रूप में स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर-दो के गेट पर लगाकर रखा गया है। ये यात्रियों के लिए भी आकर्षण का केंद्र है।

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