ज्ञानवापी मस्जिद संबंधित 10 तथ्य : Gyanvapi Mosque 10 Facts


ज्ञानवापी मस्जिद बनारस, उत्तर प्रदेश में स्थित है। इस मस्जिद से संबंधित अनेक एतिहासिक और पौराणिक साक्ष्य उपलब्ध है। इन्ही साक्ष्यों के आधार पर इससे संबंधित कुछ महत्वपूर्ण तथ्य निम्न है :


  1. विश्वनाथ मंदिर के निर्माण अकबर के नौरत्नों में से एक राजा टोडरमल ने वर्ष 1585 में दक्षिण भारत के विद्वान नारायण भट्ट की मदद से कराया था।
  2. इसका निर्माण विश्वनाथ मंदिर की जगह पर किया गया था जिसे औरंगजेब ने 1669 में ध्वस्त कर दिया था। मंदिर ध्‍वस्‍त किए जाने से पहले ज्ञानवापी परिसर और ज्ञानवापी कूप विश्वनाथ मंदिर का हिस्‍सा था। 
  3. मुगल शासक औरंगजेब के आदेश से मंदिर पर आक्रमण के बाद मंदिर के अर्चक स्वयंभू शिवलिंग को लेकर ज्ञानवापी कूप में कूदे गए थे।
  4. ज्ञानवापी कूप के नाम पर ही मस्जिद का नाम ज्ञानवापी पड़ा है।
  5. ज्ञानवापी मस्जिद का पहला ज़िक्र वर्ष 1883-84 के राजस्व दस्तावेजो में मिलता है। दस्तावेज़ों में जामा मस्जिद ज्ञानवापी के तौर पर दर्ज किया गया।
  6. विश्वनाथ मंदिर का वर्णन मत्स्य पुराण और स्कंदपुराण के काशी खंड में मिलता है। इसमें अविमुक्तेश्वर, विश्वेश्वर और ज्ञानवापी का उल्लेख है। पुराणों में ज्ञानवापी कूप विश्वेश्वर (विश्वनाथ) को एक अभिन्न अंश माना गया है जो काशी का केन्द्र माना गया है।


पवित्र ज्ञानवापी तीर्थ के लिए हिंदुओं का संघर्ष :

1194 : कुतुब अल-दीन ऐबक ने मूल विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर को तोड़ा।

1236-1240: रजिया सुल्ताना ने मंदिर सामग्री का उपयोग करके मूल स्थान पर एक मस्जिद का निर्माण किया।

13वीं शताब्दी : हिंदुओं ने ज्योतिर्लिंग को ज्ञानवापी तीर्थ के पास अविमुक्तेश्वर महादेव के परिसर में स्थानांतरित कर दिया।

15वीं शताब्दी : मुस्लिम शर्की शासकों और सिकंदर लोधी ने नए मंदिर को ध्वस्त कर दिया।

1585: राजा मान सिंह के संरक्षण में हिंदुओं ने विश्वनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण किया।

1669 - 1777 : औरंगजेब ने मंदिर को ध्वस्त कर दिया और उसके ऊपर एक आंशिक रूप से निर्मित मस्जिद का निर्माण किया। हिंदुओं ने विश्वनाथ जी को बगल के क्षेत्र में स्थानांतरित कर दिया और पुराने ढांचे में अन्य देवताओं की पूजा भी करते रहे।

रानी अहिल्या बाई होल्कर ने विश्वनाथ जी के लिए एक नई मंदिर संरचना का निर्माण किया।

2022 : अदालत द्वारा आदेशित सर्वेक्षण में मंदिर के परिसर में एक शिवलिंग की फिर से खोज की गई जिसे औरंगजेब द्वारा ध्वस्त कर दिया गया था।






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