8/23/2022

छत्तीसगढ़ की महिला स्वतंत्रता सेनानी women freedom fighters from chhattisgarh

भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं का विशेष योगदान रहा है। इस आंदोलन में छत्तीसगढ़ की भी महिलाओं का विशेष योगदान रहा है। इस आर्टिकल में हम ऐसे ही कुछ महिलाओं के बारे में बता रहें है जिन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन में अपना विशेष योगदान रहा है।


रोहिणी बाई परगनिहा :

रोहिणी बाई परगनिहा भारतीय स्वावतंत्रता सेनानी थी। अविभाजित मध्यप्रदेश (वर्तमान छत्तीसगढ़) के तर्रा गांव में वर्ष 1919 में हुआ था। पिता शिवलाल प्रसाद तर्रा गाँव के बड़े मालगुज़ार थे। जब पहली बार जेल गईं, तब वे 12 वर्ष की थीं।


केकती बाई बघेल :

केकती बाई बधेल थीं डॉ. खूबचन्द बधेल की मां। डॉ. खूबचन्द बधेल थे स्वतंत्रता सग्रांम सेनानी, समाज सुधारक थे। वर्ष 1932 के सत्याग्रह के वक्त केकती बाई को जेल भी जाना पड़ा।


श्रीमती बेला बाई :

श्रीमती बेला बाई और उनके पति श्री भुजबल सिंह दोनों ही स्वतंत्रता सेनानी थे। पूरे देश में विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार में उन्होंने हिस्सा लिया और विदेशी वस्तुओं की होली जलाई थी।


दयावती कंवर :

इन्होंने तमोरा जंगल सत्याग्रह का नेतृत्व किया था। आंदोलन के समान दयावती की उम्र 16 वर्ष थी। दयावती ने सभा में अपनी माँ और अन्य महिलाओं के साथ भाग लिया था। वे वन में प्रवेश करने में सफल रहें थे।


राधाबाई :

स्वतंत्रता सेनानी तथा समाज सुधारक थी। डॉ. राधाबाई रायपुर नगर ( छत्तीसगढ़ ) की प्रथम महिला स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के रुप में जाना जाता है। डॉ. राधा बाई ने छत्तीसगढ़ में प्रचलित किसबीन प्रथा का विरोध किया और इस प्रथा को खत्म किया।



फूलकुँवर बाई :

श्रीमती फूलकुँवर बाई और उनका पुत्र मनोहर लाल श्रीवास्तव दोनों स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे।वर्ष 1921 में जब पं. माधवराव सप्रे ने रायपुर में राष्ट्रीय विद्यालय की स्थापना की तो मनोहर उस विद्यालय के पहले छात्र थे। वर्ष 1932 के आंदोलन में फूलकुँवर बाई डॉ. राधाबाई के साथ विदेशी वस्रों की दुकानों में पिकेटिंग में सहयोग किया। जिस वजह से उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। वर्ष 1942 की अगस्त क्रान्ति में पोची बाई भी अपनी सास फूलकुँवर बाई के साथ सत्याग्रह कर जेल गयीं।