पूर्वोत्तर भारत का इतिहास – History of northeast india


पूर्वोत्तर भारत, 350 ईस्वी से 1140 ईस्वी तक एक बड़ा राज्य था - कामरूप अथवा प्राग्ज्योतिष। मान्यतानुसार, महाभारत में इसी प्राग्ज्योतिषपुर का राजा था नरकासुर। अपनी शक्ति के चरम पर यह राज्य ब्रह्मपुत्र नद की सम्पूर्ण घाटी सहित भूटान, बंगाल (पश्चिमी बंगाल और बांग्लादेश) और बिहार के कुछ हिस्सों पर भी आधिपत्य रखता था। यहाँ के लोगों को प्राचीन कल में किरात अथवा लौहित्य (चाणक्य रचित अर्थशास्त्र में) कहते थे।


कामरूप में तीन अलग अलग वंशों ने शासन किया -

  • वर्मन वंश
  • मलेच्छ वंश 
  • पाल (या भौम पाल) वंश

तीनों वंशों के राजा नरक से यानी नरकासुर से अपना रिश्ता जोड़ते थे और इसी आधार पर राजा की पदवी पर अधिकार करते थे। समुद्रगुप्त द्वारा प्रयाग में स्थापित पत्थर के स्तम्भ में कामरूप को गुप्त साम्राज्य का अधीनस्थ बताया गया है।


वर्मन वंश / Varman dynasty

वर्मन वंश ने बड़ी तीव्रता से कामरूप का विस्तार किया। राजा भूतिवर्मन द्वारा अश्वमेध यज्ञ करने का भी उल्लेख है। वर्मन वंश पर गौर राजा और सहयोगियों का आक्रमण हुआ जिसमे वे परास्त हुए और कुछ समय के लिए गौर वंश के अधीन हुए। परन्तु भूतिवर्मन के छोटे बेटे राजा भास्करवर्मन ने थानेसर के राजा हर्षवर्धन से दोस्ती की और संयुक्त आक्रमण से गौर राजा शशांक पर विजय पायी।

इस वंश के अंतिम शासक भास्करवर्मन निःसंतान थे। भास्करवर्मन की मृत्यु के पश्चात राज्य एक स्थानीय प्रमुख शलस्तम्भ के हाथों में ईस्वी 655 में चली गयी। इन्होंने मलेच्छ वंश की स्थापना की। 


मलेच्छ वंश / म्लेच्छ वंश - Mlechchha dynasty

भास्करवर्मन की मृत्यु के पश्चात शलस्तम्भ ने 655 ई. में  मलेच्छ वंश की स्थापना की। इन्होंने भी अपना वंश नरक से जोड़ा और राजधानी प्राग्ज्योतिषपुर से हरुप्पेशवर स्थानांतरित की।

900 ई. में त्यागसिम्हा के निःसंतान मरने पर कामरूप के मुख्य लोगों ने मिल कर भौम वंश को वैसे ही चुना।  भौमपाल के राजाओं ने आज के गुवाहाटी के पास एक नयी राजधानी बसी - दुर्जय।  


पाल वंश - Pal dynasty

वर्ष 1100 के आस-पास बंगाल ने कामरूप को हरा कर इन पर कब्जा कर लिया। बंगाल के पाल राजाओं के आक्रमण से कामरूप के पतन की शुरुवात हुई। वर्ष 1257 में मलिक इख्तियारुद्दीन इउज्बक के आक्रमण और मौत के साथ कामरूप का अंत हो गया। इसकी जगह तीन नए राज्य उभरे - कामत, कचरी और सुतिया। 


अहोम का उदय

1228 ई. में मोंग-माओ से राजा सुखपा के नेतृत्व में आये अहोम लोगों ने कालांतर में इस राज्य को पुनः एकजुट किया। यहाँ की संस्कृति अपना कर अहोम राजाओं ने बंगाल और दिल्ली के मुसलमान सुल्तानों से जमकर लोहा लिया। लाचित बोड़फुकन




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