भोरमदेव अभयारण्य : Bhoramdev Sanctuary


यह अभ्यारण्य कवर्धा से 20 कि.मी. की दुरी पर स्थित है। इस अभ्यारण्य का नाम यहां स्थित 11 वी शताब्दी के सुविख्यात भोरमदेव मंदिर के नाम से रखा गया है। जिसका निर्माण नागवंशी राजा गोपालवेद द्वारा कराया गया है। इसे वर्तमान में “छत्तीसगढ के खुजराहों” के नाम से जाना जाता है।
इस अभ्यारण्य का गठन 2001 में किया गया है, इसका कुल क्षेत्रफल 163.80 वर्ग कि.मी. है। भोरमदेव अभ्यारण्य मैकल पर्वत श्रृंखला में समुद्र सतह से लगभग 600 मीटर से 894 मीटर की ऊंचाई में स्थित है।

इसमें मुख्यतः साल तथा मिश्रित प्रजाति के वन है, कतिपय स्थानों पर सागौन के प्राकृतिक वन भी पाये जाते है। यह अभ्यारण्य विश्व विख्यात कान्हा टाईगर राष्ट्रीय उद्यान (कान्हा टाईगर रिजर्व) एवं चिल्फी बफर जोन के साथ जुड़ा हुआ है।
यहां शेर (बाघ), तेन्दूआ, लगड बग्घा, जंगली, कुत्ता, भेडि या, गीदड , लोमडी, जंगली बिल्ली, चीतल, कोटरी, सांभर, नीलगाय, जंगली सुअर, वायसन (गौर), लंगुर, लाल मुंह का बंदर, नेवला, खरगोश, बिज्जू आदि जानवर पाये जाते है।

सकरी नदी 
सकरी नदी का उद्गम इस अभ्यारण्य के कक्ष क्रमांक 94 से  है एवं कुछ दूरी पर संरक्षित क्षेत्र के अंदर बहने के पश्चात शिवनाथ नदी में मिल जाती है। भंवरटोक एवं दुरदूरी के समीप सकरी नदी पर झरना (जल प्रपात) है।

दर्शनिय स्थल:

भोरमदेव- कवर्धा से 18 कि.मी. उत्तर पिश्चम में स्थित 11वीं शताब्दी का चंदेल शैली में बना भोरमदेव मंदिर अपने उत्कृष्ट शिल्प व भव्यता की दृष्टि से छत्तीसगढ का खजुराहों कहा जाता है। यहां प्रतिवर्ष मार्च माह में “भोरमदेव उत्सव” का आयोजन किया जाता है। पूर्ण पढ़ें

मड़वा महल- भोरमदेव मंदिर से आधा कि.मी. की दूरी पर चौरग्राम के समीप पत्थरों से निर्मित एक शिवमंदिर है। ऐसी जनश्रुति है कि इस मंदिर में विवाह संपन्न कराए जाते थे अतः विवाह मंडप के रूप में प्रयुक्त होने के कारण मंडवा मडल कहा जता है। मंदिर की बाह्‌य दीवारों पर मिथुन मूर्तियां बनी हुई है। गर्भगृह का द्वार काले चमकदार पत्थरों पर आकर्षक प्रतिमाएं बनी हुई है। पूर्ण पढ़ें

छेरी महल - भोरमदेव मंदिर के समीप 1कि.मी. की दूरी पर एक छोटा शिवमंदिर है जो 14वीं शती का बना हैं मंदिर की चौखट काले पत्थरों की बनी है जिसके उपर आकर्षक भित्तचित्र बने है। गर्भगृह में गणेश प्रतिमा रखी हुई है।

हरमों - भोरमदेव से लगभग 4 कि.मी. दूर पहाड़ के तलहटी में बसे हरमों ग्राम में कवर्धा राजवंश का लगभग 300 वर्ष पुराना भवन प्राचीन वास्तु शिल्प का अतिउत्तम उदाहरण है। यह स्थान पहले राजाओ के द्वारा शिकारगाह के रूप में प्रयोग में लाया जाता था।

चिल्फी घाटी - कवर्धा से लगभग 50 कि.मी. दूर समुद्र सहत से लगभग 780 मीटर की उंचाई पर स्थित चिल्फी घाटी अत्यंत रमणीक स्थल है। इसे छत्तीसगढ राज्य का प्रवेश द्वार भी कहा जा सकता है। सघन साल वन एवं वन्य प्राणियों के बहुतायत के कारण यह क्षेत्र अत्यधिक महत्वपूर्ण है।
चिल्फी घाटी में ही फेन एवं हलोन नदी का उदगम है।

गढ मियानर प्रपात- चिल्फी से लगभग 15 कि.मी. दूर रानीदहरा ग्राम के पास यह जल प्रपात है जहां 3 चरणों में लगभग 50 मीटर उंचाई से पानी गिरता है।

प्राचीन शिवमंदिर राज बेन्दा- चिल्फी से 4 कि.मी. दूर बालाघाट सकरी नदी रोड से लगे राजबेन्दा वनग्राम में प्राचीन शिव मंदिर के भग्नावशेष है, जो भोरमदेव के ही समकालीन है। यहीं पर प्राचीन गणेश जी की मूर्ति भी स्थापित है।

सरोधा दादर- जिला मुख्यालय से 46 कि.मी. दूर कवर्धा चिल्फी मार्ग से 4 कि.मी. अंदर दक्षिण दिशा में 3000 फुट उपर स्थित यह वन्य ग्राम स्थित है। यहां पर सौर उर्जा से संचालित दूर संचार केन्द्र सरकार के द्वारा स्थापित किया गया है। चारों ओर पहाड और वनों से आच्छादित सुरम्य जगह है।

रामचुवा- कवर्धा से 8 कि.मी.पश्चिम जैतपुरी ग्राम के निकट प्राकृतिक मनोरम स्थल रामचुवा मैकल पर्वत की तलहटी में स्थित है। यहां पर प्राकृतिक जलस्त्रोत से निर्मित एक कुण्ड है जिसमें पानी कभी सुखता नहीं और जलस्त्रोत निरंतर प्रवाहमान रहता है। इस क्षेत्र में यह नर्मदा कुण्ड के नाम से विख्यात है। यहां से 2 कि.मी. उत्तर में सरोदा बांध स्थित है।

बखारी गुफा- रामचुवा से मात्र 2 कि.मी. की दक्षिण दूरी पर दक्षिण दिशा में बखारी नदी प्रवाहित होती है। इसी के तट पर बखारी कोन्हा नामक जगह स्थित है। यह स्थल दो पर्वत शिखरों के मध्य सकरी गलियारे से प्रकाश मार्ग द्वारा आधा कि.मी. अंदर तक प्रवेश किया जा सकता है। यहां पर शिवलिंग के आकार की प्रतिमा स्थित है। यह देव बखारी देव के नाम से प्रसिद्ध है।

झरना- कवर्धा से पूर्व दिशा में 12 कि.मी. की दूरी पर झिरना ग्राम में नर्मदा कुण्ड स्थित है जहां पर सुगंधित केवड़ो के झाडि यों के साथ सुरम्य अमराईयों के बीच यह स्थल पर्यटकों को आध्यात्मिक शांति का अनुभव कराता है। माघ पूर्णिमा को यहां मेला लगता है।

रानीदहरा- कबीरधाम जिला मुख्यालय से जबलपुर मार्ग पर 35 कि.मी. दूरी पर रानीदहरा नामक जल प्रपात स्थित है। रियासतकाल में राजा रानियां को मनोरंजन के लिए रानीदहरा लाया करते थे। रानीदहरा मैकल पर्वत के आगोश में स्थित है। तीनों ओर पहाडो से घिरे इस जगत पर 10 फीट की उंचाई पर जलप्रपात स्थित है।

चरण तीरथ- कवर्धा से 63 कि.मी. दूर बोड़ला विकास खंड मुख्यालय से तरेगांव जाने वाली मार्ग स्थित यह एक दुर्गम स्थल है जहां 575 सीढियों में से होकर मैकल श्रेणी चट्टानों से प्राकृतिक गुफा का निर्माण हुआ है। जिसमें निरंतर जल प्रवाह हो रहा है। यहां पर एक कुण्ड है जिसे भरत कुण्ड के नाम से जाना जाता है ऐसा कहा जाता है कि भगवान राम सीता की खोज में इसी मार्ग से होकर गुजरे थे जिससे उनके चरण का चिन्ह यहां आज भी विराजमान है।

कंकालीन (सील पचराही)- बोडला से तरेगांव मार्ग पर दक्षिण दिशा में स्थित दुर्गा मंदिर है। यहां पर अनेक मूर्तियां रखी गई है। जिनका संरक्षण सही ढंग से नही हो पा रहा है।

बम्हन दाई (पहाडो वाली मॉं)- कबीरधाम जिला के पंडरिया तहसील मुख्यालय से उत्तर दिशा में 10 कि.मी. ओर कवर्धा मुख्यालय से 43 कि.मी. की दूरी पर पंडरिया लोरमी मार्ग पर स्थित है। मैकल पर्वत शिखर पर मॉं बम्हन दाई का वर्तमान मंदिर का निर्माण श्री शिवराज दास मंहत ने करवाया था। यहां पर एक गुफा है जिसे ब्रम्ह गुफा के नाम से जाना जाता है जहां देवी की आकृति उत्कृष्ट है। यह मंदिर 1000 मीटर उंचाई पर स्थित है।

श्री बकेला (चिंतामणी पार्श्वनाथ मंदिर)- पंडरिया से 20 कि.मी. उत्तर दिशा में बकेला ग्राम स्थित है। यहांाँ पर पार्श्वनाथ की मूर्ति खुदाई से प्राप्त हुई है इसे स्थपित कर जैन तीर्थ के रूप में विकसित किया जा रहा है। खुदाई से प्राप्त 23वें तीर्थकर पार्श्वनाथ की प्रतिमा 10वीं शताब्दी की बताई जाती है। हाफ नदी के तट पर सघन अभ्यारण्य के बीच स्थित बहुत ही मनोरम एवं उत्कृष्ट तीर्थस्थल है। यहां पर एक गुफा मिली है जिसे देवसर गुफा के नाम से जाना जाता है।

घोघरा (लघु भेडाघाट)- कवर्धा बिलासपुर मार्ग पर पांडातराई से 9 कि.मी. दूर पर पिश्चत में प्रकृति का मनोरम खजाना हाफ नदी तट पर प्राकृतिक रूप से निर्मित है। 3 जल प्रपातों के चट्टानों के मध्य गिरना भेडाघाट को लघु रूप में प्रदर्शित करता है।

स्वयंभू जलेश्वर महादेव, डोगरिया- कवर्धा से पंडरिया रोड पर 22 कि.मी. दूर ग्राम खरहट्टा से 2 कि.मी. दूर हाफ नदी के तट पर भगवान शिवलिंग है। ऐसा कहा जाता है, यह लिंग स्वयंभू है। यहां माघ पूर्णिमा में मेला भरता है।

कामटी- कवर्धा से कुकदूर मार्ग में मुनमुना से 8 कि.मी. दूरी पर कमाठी नामक ग्राम स्थित है। यहां राजवंशीकालीन अदभूत 8 फीट उंची नरसिंह भगवान की मूर्ति स्थापित है। यह मूर्ति एक अदभूत मूर्ति है। छत्तीसगढ़ में यह सारे भारत में पंजाब के अलावा मात्र कमाठी में ही स्थित है।


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