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अलीनगर की संधि 1757

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अंग्रेज़ों द्वारा कलकत्ता पर दुबारा अधिकार कर लेने के बाद, 9 फ़रवरी 1757 ई. को बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला और ईस्ट इंडिया कम्पनी के बीच अलीनगर की संधि हुई, जिसमें अंग्रेज़ों का प्रतिनिधित्व क्लाइव और वाटसन ने किया था।

इस संधि के द्वारा नवाब और ईस्ट इंडिया कम्पनी में निम्नलिखित शर्तों पर फिर से सुलह हो गई :
  • ईस्ट इंडिया कम्पनी को मुग़ल बादशाह के फ़रमान के आधार पर व्यापार की समस्त सुविधाएँ फिर से दे दी गईं। 
  • कलकत्ता में क़िले की मरम्मत की इजाज़त भी दे दी गई 
  • कलकत्ता में सिक्के ढालने का अधिकार भी उन्हें दे दिया गया 
  • नवाब के द्वार कलकत्ते पर अधिकार करने से अंग्रेज़ों को जो क्षति हुई थी, उसका हर्जाना देना स्वीकार किया गया 

अलीनगर की संधि पर हस्ताक्षर करने के एक महीने बाद अंग्रेज़ों ने संधि का उल्लघंन कर, कलकत्ता से कुछ मील दूर गंगा नदी के किनारे की फ़्राँसीसी बस्ती चन्द्रनगर पर आक्रमण करके उस पर अपना अधिकार कर लिया। सिराजुद्दौला की सहानुभूि फ्रांसीसियों के प्रति हो गयी और उसने फ्रांसीसियों को शरण अैर संरक्षण दिया। उसके दूसरे महीने जून में अंग्रेज़ों ने मीर ज़ाफ़र और नवाब के अन्य विरोधी अफ़सरों से मिलकर सिराजुद्दौला के विरुद्ध षड़यंत्र रचा। इस षड़यंत्र के परिणाम स्वरूप 23 जून, 1757 ई. को प्लासी की लड़ाई हुई, जिसमें सिराजुद्दौला की पराजय हुई।

इन्हे भी देखें:
प्लासी का युद्ध


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