रोलेक्ट/रॉलेट एक्ट 1919 - छत्तीसगढ़ में प्रभाव ( Rowlatt Act Chhattisgarh )


रॉलेट ऐक्ट (The Anarchical and Revolutionary Crime Act, 1919) सर सिडनी रौलेट की अध्यक्षता वाली समिति की शिफारिशों के आधार पर भारत में उभर रहे राष्ट्रीय आंदोलन को कुचलने के उद्देश्य से बनाया गया था।
  • 10 दिसम्बर 1917 - रोलेक्ट एक्ट समिति का गठन किया गया।
  • 15 अप्रैल 1918 - समिति ने रिपोर्ट प्रस्तुत किया।
  • 18 मार्च 1919 - रॉलेक्ट एक्ट पारित हुआ।

 इस कानून की अनुसार अंग्रेजी सरकार को यह अधिकार प्राप्त हो गया था कि वह किसी भी भारतीय पर अदालत में बिना मुकदमा चलाए और बिना दंड दिए उसे जेल में बंद कर सकती थी। इस क़ानून के तहत मुकदमा दर्ज करने वाले का नाम जानने का अधिकार भी समाप्त कर दिया गया था।

इस कानून के विरोध में सष्ट्रव्यापि आंदोलन हुए।  इसे काला कानून न अपील, न वकील, न दलील का कानून कहा जाता था। 6 अप्रैल 1919 को राष्ट्रीय अपमान दिवस मनाया गया।

छत्तीसगढ़ में प्रभाव
1919 के रॉलेक्ट एक्ट का विरोध छत्तीसगढ़ में भी हुआ। 1919 में 10 मार्च को मुंजे के द्वारा, 20 मार्च को दादा साहब खापर्डे, राघवेन्द्र राव एवं रविशंकर शुक्ल के द्वारा विरोध किया गया। इसी बीच रतनपुर के पुरषोत्तम के द्वारा खारंग बांध ( खूंटाघाट ) में कार्यरत मजदूरों को संबोधित कर काम को बंद करा दिया।

छत्तीसगढ़ में विभिन्न स्थानों पर विरोध हुए
रायपुर में : पं. रविशंकर शुक्ल, माधव राव सप्रे, महंत लक्ष्मीनारायण।
बिलासपुर में : ई. राघवेंद्रराव, शिवदुलारे मिश्र, बैरिस्टर छेदीलाल, यदुनंदन प्रसाद श्रीवास्तव।
राजनांदगांव में : ठा. प्यारेलाल।
राजिम में : पं. सुन्दरलाल शर्मा, छोटेलाल श्रीवास्तव।

जालियाँ वाला बाग हत्याकांड
रॉलेक्ट एक्ट का विरोध करने की वजह से पंजाब प्रांत में डॉ. सतपाल और सैफुद्दीन किचलू को गिरफ्तार कर लिया गया। इसके विरोध में अमृतसर में जुलूस निकाली गई। इस जुलूस के दौरान 5 अंग्रेज सिपाहियों की मृत्यु हो गई।

पंजाब प्रान्त के अमृतसर में स्वर्ण मन्दिर के निकट जलियाँवाला बाग में 13 अप्रैल 1919 (बैसाखी के दिन) को रौलेट एक्ट का विरोध कर रहे सभा पर जनरल आर. डायर ने गोलियाँ चलवा दीं। ब्रिटिश राज के अभिलेख इस घटना में 200 लोगों के घायल होने और 379 लोगों के शहीद होने की बात स्वीकार करते है जिनमें से 337 पुरुष, 41 नाबालिग लड़के और एक 6-सप्ताह का बच्चा था। अनाधिकारिक आँकड़ों के अनुसार 1000 से अधिक लोग मारे गए और 2000 से अधिक घायल हुए।

तत्कालीन पंजाब प्रांत के गवर्नर ओ. डायर ने आर. डायर के द्वारा किये गए कार्य को स्वीकार और समर्थन भी किया। बाद में ओकटुबर, 1920 में लार्ड हंटर की अद्यक्षता में 8 सदस्यों ( 5 अंग्रेज, 3 भारतीय) की एक कमेटी बनी जिसने मार्च, 1920 में अपनी रिपोर्ट पेस की।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भी मदनमोहन मालवी की अद्यक्षता में एक कमेटी बनाई।

छत्तीसगढ़:
13 अप्रैल 1919 में हुए हत्याकांड का असर छत्तीसगढ़ में भी हुआ। धमतरी में इस हत्याकांड  की भर्त्सना के लिए द्वितीय तहसील राजनीतिक परिषद का सम्मेलन हुआ जिसकी अद्यक्षता दादा भाई खापर्डे ने की।

मई 1920 में बिलासपुर जिला राजनैतिक सम्मेलन में ई. राघवेंद्रराव द्वारा जलियावाला बाग हत्याकांड का विरोध किया गया तथा ओजस्वी भाषण दिया गया, परिणामस्वरूप गंगाधर गोपाल दीक्षित ने "नायाब तहसीलदार" का पद त्यागा।

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