झारखंड के आदिवासीय विद्रोह एवं आंदोलन

वर्ष 1765 के बाद झारखंड ( अविभाजित बिहार ) ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन हो गया। बिटिश शासन के दौरान यहाँ काफी अत्याचार हुए, जिस वजह से इस कालखंड में इस प्रदेश में ब्रिटिशों के खिलाफ बहुत से विद्रोह हुए ।

कुछ प्रमुख विद्रोह थे:-
1772-1780 पहाड़िया विद्रोह
1780-1785 तिलका मांझी के नेतृत्व में मांझी विद्रोह जिसमें भागलपुर में 1785 में तिलका मांझी को फांसी दी गयी थी।
1795-1800 तमाड़ विद्रोह
1795-1800 मुंडा विद्रोह विष्णु मानकी के नेतृत्व में
1800-1802 मुंडा विद्रोह तमाड़ के दुखन मानकी के नेतृत्व में
1819-1820 मुंडा विद्रोह पलामू के भूकन सिंह के नेतृत्व में
1832-1833 खेवर विद्रोह भागीरथ, दुबाई गोसाई, एवं पटेल सिंह के नेतृत्व में
1833-1834 भूमिज विद्रोह वीरभूम के गंगा नारायण के नेतृत्व में
1855 लार्ड कार्नवालिस के खिलाफ सांथालों का विद्रोह
1855-1860 सिद्धू कान्हू के नेतृत्व में सांथालों का विद्रोह
1856-1857 शहीदलाल, विश्वनाथ सहदेव, शेख भिखारी, गनपतराय एवं बुधु बीर का सिपाही विद्रोह के दौरान आंदोलन
1874 खेरवार आंदोलन भागीरथ मांझी के नेतृत्व में
1895-1900 बिरसा मुंडा के नेतृत्व में मुंडा विद्रोह
इन सभी विद्रोहों के भारतीय ब्रिटिश सेना द्वारा फौजों की भारी तादाद से निष्फल कर दिया गया था। इसके बाद 1914 में ताना भगत के नेतृत्व में लगभग छब्बीस हजार आदिवासियों ने फिर से ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ विद्रोह किया था जो बाद में महात्मा गांधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन का हिस्सा बन गया।


EmoticonEmoticon