डेरी गड़ाई ( Deri Gadai ) दन्तेश्वरी शक्तिपीठ में आयुध स्थापना की प्राचीन परंपरा

Source : Facebook Bastar Bhushan


भारतीय मंदिर परंपरा में प्रधान देवता के आयुध की स्थापना का विशेष महत्व माना गया है। आयुध स्थापना के माध्यम से देवता की शक्ति, संरक्षण भाव तथा उत्सवकालीन ऊर्जा का आह्वान किया जाता है। इस परंपरा के अंतर्गत आयुध का अर्चन कर उसके पश्चात उत्सवों का प्रारंभ होता है। यह विधान आगम (शैव) तथा संहिता (वैष्णव) — दोनों परंपराओं में स्वीकार्य है।

दंतेवाड़ा स्थित दन्तेश्वरी माई शक्तिपीठ में प्रधान देवता के रूप में देवी भगवती महिषासुरमर्दिनी दन्तेश्वरी दाई, जिन्हें माणिक्य देवी भी कहा जाता है, की उपासना की जाती है। देवी का प्रमुख आयुध त्रिशूल है। पौराणिक मान्यता के अनुसार इसी त्रिशूल से महिषासुर का मर्दन हुआ था। इस कारण देवी के आयुध की स्थापना को विशेष आध्यात्मिक महत्व प्राप्त है।

दन्तेश्वरी शक्तिपीठ की विशिष्ट परंपरा यह है कि देवी की प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा से पूर्व उनके आयुध त्रिशूल की स्थापना की जाती है, इस आयुध स्थापना की परंपरा को “डेरी गड़ाई” कहा जाता है।
यह स्थापना पर्व बसंत पंचमी के अवसर पर संपन्न होता है और इसी के साथ देवी के वार्षिक अनुष्ठानों तथा फागुन मंडई उत्सव की प्रक्रिया आरंभ मानी जाती है। बस्तर अंचल में यह परंपरा सदियों से निरंतर चली आ रही है।

दक्षिण भारतीय मंदिर परंपराओं में भी आयुध स्थापना की समान विधियाँ दृष्टिगत होती हैं, जहाँ त्रिशूल, वेल आयुध एवं चक्र की स्थापना सुदर्शन अल्लवर परंपरा के अंतर्गत की जाती है। इन आयुधों को उत्सव काल में देवालय एवं क्षेत्र की रक्षा से जुड़ा माना जाता है।

बस्तर क्षेत्र में आयुध स्थापना की यह प्राचीन विधि आज भी सुरक्षित रूप में जीवंत है। यह न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि क्षेत्रीय संस्कृति और परंपरागत मंदिर विधानों की निरंतरता का भी प्रमाण प्रस्तुत करती है।

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