गोंड़ जनजाति : छत्तीसगढ़

  • जनसंख्या की दृष्टि से ये छत्तीसगढ़ राज्य की सबसे बड़ी जनजाति समूह है। 
  • गोंड़ तेलगु भाषा का शब्द ( कोंड ) है, जिसका अर्थ पर्वतवासी मनुष्य है।
  • इनका समाज पितृसत्तात्मक है।
  • इनके गढ़ चिह्न को टोटा कहते है।
  • इनकी बोली गोंडी तथा डोरली है।
  • ये बस्तर, दंतेवाड़ा, नारायणपुर, कोंडागांव, कांकेर, सुकमा,जांजगीर-चंपा और दुर्ग जिले में पाये जाते है।
  • गोंड तथा उसकी उपजातिया स्वयं की पहचान ‘कोया’ या ‘कोयतोर शब्दों से करती है जिसका अर्थ ‘ मनुष्य’ या ‘पर्वतवासी मनुष्य’ है।
  • गोंड़ की करीब 41 उपजातियाँ पाई जाती है
  • उपजाति, माड़िया मुड़िया, डोरला, प्रधान आदि।
  • गोंड जनजाति में मदिरापान का काफी ज्यादा प्रचलन है। 
  • इनके मुख्य देवता ‘दूल्हा देव’ है।
  • इनके पर्व है, नवाखानी, छेरता, बिदरी, जावरा, मड़ई, लारूकाज।
  • लोक नृत्य करमा, भड़ौनी, सैला सुआ तथा बिरहोर।
  • इनमे विधवा, बहु विवाह, दूध लौटावा तथा पायसोतुर का प्रचलन पाया जाता है।
  • इनके घर की दीवारों पर नोहडेरा का अंकन होता है।
  • इनके मृतक संस्कार में तीसरे दिन कोज्जि तथा दसवे दिन कुंडा मिलन संस्कार होता है।

मेघनाथ पर्व 
फाल्गुन के पहले पक्ष में यह पर्व गोंड जनजतियो द्वारा मनाया जाता हैं। इस पर्व में, चार खंबों पर एक तख्त रखा जाता है जिसमें एक छेद कर पुन: एक खंभा लगाया जाता है और इस खंबे पर एक बल्ली आड़ी लगाई जाती है। यह बल्ली गोलाई में घूमती है। इस घूमती बल्ली पर आदिवासी रोमांचक करतब दिखाते हैं। नीचे बैठे लोग मंत्रोच्चारण या अन्य विधि से पूजा कर वातावरण बनाकर अनुष्ठान करते हैं। इस पर्व को कुछ स्थानों पर खंडेरा या खट्टा नाम से भी जाना जाता हैं।


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