मंदराजी - Mandraji

दाऊ दुलार सिंह मंदराजी का जन्म राजनांदगांव से 5 किलोमीटर दूर स्थित ग्राम रवेली में 1 अप्रैल, 1911 को एक संपन्न मालगुजार परिवार में हुआ था। उन्होंने प्राथमिक शिक्षा गांव की पाठशाला में ही प्राप्त की। उच्च शिक्षा की व्यवस्था गांव में नहीं होने के कारण वे आगे नहीं पढ़ सके। स्कूल का साथ छूटने के बाद वे गांव के कुछ लोक कलाकारों के संपर्क में आये और उन्हीं से चिकारा एवं तबला बजाना सीखा तथा गाने का भी अभ्यास किया।

मंदराजी का नाच- गान दाऊजी के पिता को बिल्कुल भी पसंद नहीं था लेकिन पिता के विरोध के बावजूद मंदराजी दाऊ गांव में होने वाले सामाजिक एवं धार्मिक कार्यक्रमों में बढ़- चढ़कर हिस्सा लेते थे।

मंदराजी ने सन् 1928-29 में कुछ लोक कलाकारों को एकत्रित कर अपने गांव में "रवेली नाचा पार्टी" की स्थापना की। रवेली नाचा पार्टी के 1928 से 1953 तक लगभग पच्चीस वर्षों के कार्यकाल में छत्तीसगढ़ के अनेक मूर्धन्य एवं नामी कलाकारों ने अपनी कला का प्रदर्शन किया।

रवेली नाच पार्टी के प्रारंभिक दिनों में खड़े साज का प्रचलन या यानि वादक पूरे कार्यक्रम के दौरान मशाल की रोशनी में खड़े होकर ही वादन करते थे। दाऊजी ने इसमें परिवर्तन किया और नाचा का वर्तमान स्वरूप दिया। इसके अलावा मध्यरात्रि को समाप्त हो जाने वाले नाचा के समय सीमा को उन्होंने प्रातः काल तक बढ़ा दिया। उसी प्रकार पूर्व में चिकारा नाचा का प्रमुख वाद्य था। उसके स्थान पर दाऊजी ने नाचा में हारमोनियम का प्रयोग शुरू किया। नाचा में हारमोनियम का प्रयोग सन् 1933-34 में हुआ। 1936 के आते- आते नाचा में मशाल के स्थान पर पेट्रोमैक्स का प्रयोग शुरू हो गया था। रवेली नाचा पार्टी में 1936 में एक पेट्रोमैक्स आ गया था।

वर्ष 1940 तक रवेली नाचा पार्टी ने समूचे छत्तीसगढ़ में प्रशिद्ध हो चुकी थी। उन दिनों इसके समकक्ष छत्तीसगढ़ में कोई भी पार्टी नहीं थी। सन 1940 से 1952 तक का समय रवेली नाचा पार्टी का स्वर्ण युग माना जाता है।

मंदराजी दाऊ ने रवेली नाचा पार्टी में अपने गम्मत के माध्यम से तत्कालीन सामाजिक बुराईयों पर जमकर प्रहार किया तथा जन जागरण लाने में अपनी सार्थक भूमिका निभायी। इसके साथ ही उन्होंने कुछ देश भक्ति के गीतों को भी नाचा में शामिल कर अंग्रेजी राज के खिलाफ जनजागरण का प्रयास किया।

रवेली नाचा पार्टी के उत्तरार्द्ध में 1948-49 में भिलाई के समीप स्थित ग्राम रिगनी में "रिगनी नाचा पार्टी" का जोर- शोर से अभ्युदय हुआ था। सन् 1951-52 तक यह पार्टी भी प्रसिद्ध के शिखर पर पहुंच चुकी थी। तब समूचे छत्तीसगढ़ में सिर्फ रवेली और रिंगनी नाचा पार्टी का डंका बज रहा था। लोककला मर्मज्ञ दाऊ रामचंद देशमुख ने फरवरी सन् 1952 में अपने गृहग्राम पिनकापार में दो दिवसीय मंड़ई का आयोजन किया। इस कार्यक्रम के बाद रवेली एवं रिगनी नाच पार्टी का एक - दूसरे में विलय हो गया। यही से रेवली नाचा पार्टी का स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त हो गया। बाद में रिगनी- रवेली नाचा पार्टी के प्रमुख कलाकार दाऊ रामचंद देशमुख की सांस्कृतिक संस्था "छत्तीसगढ़ देहाती कला विकास मंच" में शामिल हो गये।

आर्थिक प्रलोभनों के कारण मंदराजी के कलाकार धीरे- धीरे अलग होते चले गये और कुछ कलाकारों ने छत्तीसगढ़ से पलायन भी किया। इन बीते वर्षों में मंदराजी दाऊ अपनी सारी संपत्ति नाचा में लगा चुके थे। इस कारण वे अपनी नई टीम भी नहीं बना पाये, लेकिन कलाकरों के छोड़कर जाने के बाद भी नाचा के प्रति उनका मोह मृत्युपर्यन्त बना रहा।

मंदराजी की मृत्यु 24 सिंतबर, 1984 को हुई। बाद में छत्तीसगढ़ सरकार ने दाऊजी की स्मृति को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए उनके नाम पर दो लाख रूपये का दाऊ मंदराजी सम्मान देना शुरू किया है।

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